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सुरक्षा जाल से आर्थिक शक्ति केंद्रों तक: VB-G-RAM-G की ओर बदलाव की दिशा

इस बदलाव का सबसे आशाजनक पहलू एसेट-टू-लाइवलीहुड कन्वर्जेंस है. केवल कृषि तालाब जैसे परिसंपत्तियों का निर्माण करने के बजाय, जो अक्सर कम उपयोग में आती हैं, नया मॉडल यह सुनिश्चित करने का अवसर प्रदान करता है कि परिसंपत्तियों का निर्माण सीधे आजीविका सृजन और आय वृद्धि से जुड़ा हो.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 1 month ago

भारत की ग्रामीण विकास व्यवस्था एक निर्णायक नए दौर में प्रवेश कर रही है. जुलाई 2026 से लंबे समय से लागू महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (MGNREGA) की जगह विकसित भारत–गारंटी फॉर रोजगार एंड आजीविका मिशन (ग्रामीण) (VB-G-RAM-G) लागू किए जाने की अधिसूचना के साथ देश यह संकेत दे रहा है कि वह केवल रोजगार सुरक्षा प्रदान करने वाले मॉडल से आगे बढ़कर आजीविका-आधारित विकास मॉडल की ओर बढ़ रहा है. यदि इसे प्रभावी ढंग से लागू किया जाता है, तो यह परिवर्तन हाल के दशकों में ग्रामीण विकास के सबसे महत्वपूर्ण सुधारों में से एक साबित हो सकता है. यह राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन (NRLM) और राज्य ग्रामीण आजीविका मिशनों (SRLMs) की भूमिका को मूल रूप से बदल देगा, जिससे वे ग्रामीण भारत में आर्थिक अवसर, बुनियादी ढांचे के निर्माण और दीर्घकालिक समृद्धि को नई दिशा देंगे.

नई आर्थिक सोच: आउटपुट से वैल्यू क्रिएशन तक

दशकों तक महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (MGNREGA) भारत की सामाजिक सुरक्षा प्रणाली का एक महत्वपूर्ण आधार रहा. हालांकि, इसकी सफलता का आकलन मुख्य रूप से इनपुट और तत्काल परिणामों के आधार पर किया जाता था, जैसे खर्च की गई राशि, उपयोग किए गए श्रमिक, सृजित मानव-दिवस (Person-days) और वितरित मजदूरी. यद्यपि इस कार्यक्रम ने तालाबों और सड़कों जैसी कई उपयोगी ग्रामीण परिसंपत्तियों का निर्माण किया, लेकिन यह सवाल हमेशा बना रहा कि क्या इन निवेशों ने वास्तव में दीर्घकालिक आर्थिक उत्पादकता को बढ़ाया.

VB-G-RAM-G इसी कमी को दूर करने का प्रयास करता है और ग्रामीण विकास के केंद्र में आर्थिक मूल्य सृजन (Economic Value Creation) को स्थापित करता है. यह नया मॉडल सार्वजनिक निवेश और सामुदायिक संगठनों का उपयोग करके टिकाऊ आजीविका और उत्पादक परिसंपत्तियां विकसित करता है, जो स्थानीय आर्थिक विकास को गति देती हैं. यदि यह बदलाव सफलतापूर्वक लागू होता है, तो इसकी सफलता केवल रोजगार पाने वाले परिवारों की संख्या से नहीं, बल्कि परिवारों की आय में वास्तविक वृद्धि, नए उद्यमों की स्थापना और स्थानीय आर्थिक उत्पादकता में सुधार से मापी जाएगी.

अंतर को पाटना: NRLM और SRLM क्यों हैं अपरिहार्य

ऐतिहासिक रूप से MGNREGA और NRLM अलग-अलग ढंग से कार्य करते रहे हैं. एक ओर MGNREGA पंचायतों के माध्यम से मजदूरी आधारित रोजगार और सार्वजनिक परिसंपत्तियां उपलब्ध कराता था, जबकि दूसरी ओर NRLM स्वयं सहायता समूहों (SHGs) के माध्यम से आजीविका संवर्धन और उद्यम विकास पर केंद्रित था. VB-G-RAM-G इन दोनों के बीच की सीमाओं को धुंधला कर देता है. जब नया ढांचा डेयरी अवसंरचना, सिंचाई प्रणालियों और ग्रामीण प्रोसेसिंग इकाइयों के लिए वित्त उपलब्ध कराना शुरू करेगा, तब वह उन क्षेत्रों में प्रवेश करेगा, जिनका संचालन परंपरागत रूप से NRLM करता रहा है.

हालांकि, यह ओवरलैप एक बड़ा अवसर भी प्रदान करता है. जहां पंचायतें परिसंपत्तियों के निर्माण में दक्ष हैं, वहीं SRLM लोगों को संगठित करने में विशेषज्ञ हैं. स्वयं सहायता समूहों (SHGs), ग्राम संगठनों और उत्पादक समूहों की सामाजिक एवं संस्थागत संरचना के बिना बड़े पैमाने पर बनाई गई सार्वजनिक परिसंपत्तियां अक्सर रखरखाव की कमी या उपयोग के स्पष्ट अधिकार न होने के कारण अपेक्षित परिणाम नहीं दे पातीं. ऐसे में SRLM एक "लास्ट-माइल इकोनॉमिक इंस्टीट्यूशन" के रूप में उभर सकते हैं, जो यह सुनिश्चित करेंगे कि सार्वजनिक निवेश वास्तव में निजी समृद्धि में बदल सके.

एसेट-टू-लाइवलीहुड कन्वर्जेंस मॉडल

इस परिवर्तन का सबसे आशाजनक पहलू एसेट-टू-लाइवलीहुड कन्वर्जेंस (Asset-to-Livelihood Convergence) है. केवल कृषि तालाब जैसी परिसंपत्तियां बनाने के बजाय, जो अक्सर कम उपयोग में आती हैं, नया मॉडल यह सुनिश्चित करने का अवसर देता है कि परिसंपत्तियों का निर्माण सीधे आजीविका सृजन और आय वृद्धि से जुड़ा हो.

इस मॉडल के तहत VB-G-RAM-G कृषि तालाबों और सिंचाई ढांचे जैसी उत्पादक परिसंपत्तियां तैयार करता है, जबकि राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन (NRLM) और राज्य ग्रामीण आजीविका मिशन (SRLMs) महिलाओं के स्वयं सहायता समूहों और स्थानीय समुदायों को इनका प्रभावी उपयोग करने के लिए संगठित करते हैं. इसके बाद ये संस्थाएं ऋण सुविधा, तकनीकी सहायता और आजीविका योजना जैसी महत्वपूर्ण सेवाएं प्रदान करती हैं, जिससे लाभार्थी सब्जी उत्पादन, मत्स्य पालन और पशुपालन जैसी आय बढ़ाने वाली गतिविधियां शुरू कर सकें. परिणामस्वरूप, परिसंपत्तियां केवल बुनियादी ढांचे की परियोजनाएं नहीं रह जातीं, बल्कि दीर्घकालिक आजीविका और ग्रामीण आर्थिक विकास की आधारशिला बन जाती हैं.

इस पूरे तंत्र में स्वयं सहायता समूहों (SHGs) का नेटवर्क ग्रामीण आर्थिक परिवर्तन के ऑपरेटिंग सिस्टम की भूमिका निभाता है.

राज्य ग्रामीण आजीविका मिशन (SRLM) का विकास: सामाजिक संगठन से आर्थिक एजेंसी तक

इस नए परिवेश में सफल होने के लिए राज्य ग्रामीण आजीविका मिशन (SRLM) को केवल "SHG कार्यक्रम" तक सीमित रहने के बजाय राज्य स्तर के ग्रामीण आर्थिक परिवर्तन मंच के रूप में विकसित होना होगा.

इसका अर्थ है कि उन्हें स्वयं सहायता समूहों के गठन और उनके पोषण से आगे बढ़कर डेयरी, पोल्ट्री और गैर-काष्ठ वन उत्पादों जैसे क्षेत्रों में आर्थिक क्लस्टर विकसित करने होंगे. मोटे अनाज (मिलेट्स) और सब्जियों जैसी वस्तुओं की मूल्य श्रृंखला (Value Chain) को मजबूत करना होगा तथा उत्पादक उद्यमों और ग्रामीण स्टार्टअप्स को सहयोग देना होगा. साथ ही, डिजिटल तकनीकों और AI आधारित उपकरणों का उपयोग योजना निर्माण, परिसंपत्तियों की निगरानी और वित्तीय जोखिम प्रबंधन को बेहतर बनाने में किया जा सकता है. इस परिवर्तन के लिए SRLM को सामाजिक संगठन और वित्तीय समावेशन से आगे बढ़कर बाजार विकास, वैल्यू चेन फाइनेंसिंग और दीर्घकालिक आर्थिक योजना जैसी क्षमताओं का विकास करना होगा.

अनुसंधान एवं तकनीकी साझेदारों के लिए नया अवसर

VB-G-RAM-G की शुरुआत तकनीकी सहायता इकाइयों (Technical Support Units-TSUs) और अनुसंधान संस्थानों की भूमिका को भी बदल देगी. अब उनका कार्य केवल कार्यक्रमों की निगरानी और प्रक्रियाओं का दस्तावेजीकरण करना नहीं रहेगा. उन्हें ग्रामीण आर्थिक परिवर्तन के वास्तविक वास्तुकार (Architects) की भूमिका निभानी होगी. उनकी जिम्मेदारियां टिकाऊ आजीविका प्रणालियों की रूपरेखा तैयार करने, वैल्यू चेन को मजबूत करने और कृषि, बागवानी, बैंकिंग संस्थानों तथा NABARD जैसे विभागों के बीच समन्वय स्थापित कर राज्य स्तरीय ग्रामीण परिवर्तन रोडमैप तैयार करने तक विस्तारित होंगी. साथ ही, उन्हें ऐसे ढांचे विकसित करने होंगे जो यह माप सकें कि सार्वजनिक निवेश किस प्रकार आय वृद्धि में बदल रहा है तथा अधिक उन्नत निगरानी और प्रभाव मूल्यांकन प्रणाली को समर्थन प्रदान कर सकें.

केवल कार्यक्रमों के आउटपुट पर ध्यान देने के बजाय, मॉनिटरिंग, इवैल्यूएशन एंड लर्निंग (MEL) प्रणालियों को आय वृद्धि, संपत्ति निर्माण और जलवायु लचीलापन जैसे दीर्घकालिक परिणामों पर नजर रखनी चाहिए. साथ ही, तकनीकी साझेदार निजी क्षेत्र के साथ साझेदारी विकसित करके और ग्रामीण उत्पादकों को बाजार संबंधी जानकारी उपलब्ध कराकर बाजार संपर्क (Market Linkages) मजबूत करने में भी मदद कर सकते हैं. AI और डिजिटल तकनीकों का उपयोग बेहतर योजना, परिसंपत्तियों की पूर्वानुमान आधारित निगरानी तथा कृषि और पशुपालन आधारित आजीविका के लिए समय पर सलाह उपलब्ध कराने में सहायक होगा.

निष्कर्ष: ग्रामीण समृद्धि का प्रबंधन

राज्यों के सामने सबसे बड़ा रणनीतिक जोखिम यह है कि यदि VB-G-RAM-G और NRLM का प्रभावी एकीकरण नहीं हुआ, तो समानांतर फील्ड कैडर और लाभार्थी डेटाबेस विकसित हो सकते हैं, जिससे दोहराव की स्थिति पैदा होगी. हालांकि, जो राज्य सार्वजनिक परिसंपत्तियों, सामुदायिक संस्थाओं, बैंक ऋण और बाजार संपर्कों के बीच सफल समन्वय स्थापित कर पाएंगे, वे एक मजबूत ग्रामीण विकास ढांचा तैयार करने में सक्षम होंगे.

SRLM और उनके साझेदारों के लिए अंतिम लक्ष्य केवल गतिविधियों को मापना नहीं, बल्कि ग्रामीण समृद्धि का प्रबंधन होना चाहिए. यदि अनुसंधान एवं सलाहकार संस्थाएं स्वयं को इस पूरे तंत्र के "ब्रेन ऑफ द इकोसिस्टम" के रूप में स्थापित करती हैं, तो वे सरकारों को आने वाले दशक के सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न का उत्तर देने में मदद कर सकती हैं: ग्रामीण गरीबों के लिए सबसे अधिक और सबसे टिकाऊ आय वृद्धि सुनिश्चित करने वाले निवेश कौन से होंगे?

अतिथि लेखक: डॉ. अमित गुप्ता, निदेशक, कैटेलिस्ट मैनेजमेंट सर्विसेज


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