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RBI की बैंक गारंटी सख्ती से सुरक्षित नहीं रहा MCX, मार्जिन बुक ने खोली असली तस्वीर

RBI के नए बैंक गारंटी नियमों ने यह स्पष्ट कर दिया है कि किसी एक्सचेंज पर असर केवल उसके प्रोडक्ट पोर्टफोलियो से नहीं, बल्कि उसकी मार्जिन संरचना और फंडिंग व्यवस्था से भी तय होता है.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 2 hours ago

पलक शाह

कमोडिटी एक्सचेंज MCX की क्लियरिंग कॉरपोरेशन में जमा कुल मार्जिन का लगभग 60% हिस्सा फिक्स्ड डिपॉजिट (FD) और बैंक गारंटी के रूप में है. इसके मुकाबले BSE की क्लियरिंग इकाई में यह हिस्सा लगभग 30% और NSE की क्लियरिंग इकाई में करीब 34% है. प्रीमियम वॉल्यूम में लगातार तीन कारोबारी सत्रों से आ रही गिरावट यह संकेत देती है कि बाजार को अब इस वास्तविकता का एहसास हुआ है.

जब भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के नए बैंक गारंटी नियम आखिरकार 1 जुलाई से लागू हुए और ब्रोकरों तथा प्रोप ट्रेडिंग डेस्क्स को लगातार दूसरी तिमाही में भी कोई राहत नहीं मिली, तब आम धारणा यह थी कि MCX इस बदलाव से सबसे कम प्रभावित रहने वाला एक्सचेंज होगा. तर्क यह दिया जा रहा था कि कमोडिटी डेरिवेटिव्स में फ्यूचर्स का दबदबा है. विश्लेषकों के अनुसार, विकल्प (ऑप्शंस) से जुड़ी इन्वेंट्री और मार्जिन की समस्या, जिसे नए नियमों का सबसे बड़ा असर माना जा रहा था, कच्चे तेल और सोने के फ्यूचर्स पर लागू नहीं होती. साथ ही, यह भी माना जा रहा था कि वर्षों से नियामकीय और कर संबंधी बदलावों के कारण इस सेगमेंट में पहले ही लीवरेज काफी कम हो चुका है. इस प्रकाशन ने भी पिछले सप्ताह इसी तरह का एक तर्क प्रस्तुत किया था.

लेकिन जुलाई के पहले तीन कारोबारी सत्रों ने इस धारणा को पूरी तरह बदल दिया. बुधवार को MCX का ऑप्शंस प्रीमियम कारोबार घटा, गुरुवार को इसमें और गिरावट आई तथा शुक्रवार को भी यह लगातार कम हुआ. बाजार सहभागियों का मानना है कि इसका सीधा कारण RBI के नए कोलेटरल नियम हैं, जिनका असर अनुमान से कहीं अधिक बड़ा साबित हो रहा है.

इक्विरस (Equirus) ने नए नियम लागू होने के बाद शुरुआती कारोबारी सत्रों की समीक्षा करते हुए कहा कि ऑप्शंस प्रीमियम कारोबार में गिरावट केवल BSE तक सीमित नहीं रही, जहां एक्सपायरी डे के वॉल्यूम जून की शुरुआत के स्तर से 24% से 37% तक कम रहे, बल्कि MCX में भी हाल के सत्रों में इसी तरह की गिरावट देखने को मिली. दिलचस्प बात यह है कि जुलाई की शुरुआत से पहले MCX का ऑप्शंस कारोबार मजबूत गति में था. जून में जहां फ्यूचर्स कारोबार घटा, वहीं ऑप्शंस का औसत दैनिक कारोबार (Average Daily Turnover) महीने-दर-महीने 8% बढ़ा था.

वह आंकड़ा जिस पर किसी की नजर नहीं गई: 60%

MCX पर असर अनुमान से अधिक क्यों पड़ा, इसका जवाब उसके प्रोडक्ट मिक्स में नहीं बल्कि उसकी क्लियरिंग व्यवस्था के आंकड़ों में छिपा है. RBI का नया नियम फ्यूचर्स और ऑप्शंस के बीच अंतर नहीं करता, बल्कि यह देखता है कि एक्सचेंज के सदस्य अपने मार्जिन की व्यवस्था किस तरह करते हैं. और इस पैमाने पर देखा जाए तो भारत में सबसे अधिक जोखिम MCX पर है, सबसे कम नहीं.

क्लियरिंग कॉरपोरेशनों ICCL, NCL और MCXCCL के आंकड़ों के अनुसार, दिसंबर 2025 तक इक्विटी और कमोडिटी बाजारों में कुल मार्जिन 9,750 अरब रुपये (करीब 9.75 लाख करोड़ रुपये) था, जो एक वर्ष पहले के 8,209 अरब रुपये की तुलना में लगभग 19% अधिक है.

इस कुल मार्जिन पूल में MCXCCL की हिस्सेदारी अपेक्षाकृत छोटी है. इसके पास 546.5 अरब रुपये का मार्जिन है, जो पूरे उद्योग के कुल मार्जिन का लगभग 6% है. इसके मुकाबले BSE की ICCL की हिस्सेदारी लगभग 9% और NSE की NCL की हिस्सेदारी करीब 86% है.

हालांकि, अब सबसे महत्वपूर्ण बात आकार नहीं बल्कि मार्जिन की संरचना (Composition) है. MCXCCL के 546.5 अरब रुपये के मार्जिन में से 324.2 अरब रुपये यानी 59.3% हिस्सा फिक्स्ड डिपॉजिट और बैंक गारंटी के रूप में है. यही वे दो बैंक-आधारित साधन हैं, जिन पर RBI के नए नियमों का सबसे अधिक प्रभाव पड़ रहा है.

BSE में यही अनुपात लगभग 30% (850.4 अरब रुपये में से 256.6 अरब रुपये) है, जबकि NSE की क्लियरिंग कॉरपोरेशन में यह लगभग 34% (8,353 अरब रुपये में से 2,838 अरब रुपये) है. यानी MCX की क्लियरिंग प्रणाली बैंक-आधारित कोलेटरल पर अपने दोनों प्रमुख प्रतिस्पर्धियों की तुलना में लगभग दोगुनी निर्भर है.

कमोडिटी ट्रेडिंग डेस्क बैंक गारंटी पर सबसे अधिक निर्भर क्यों थीं

MCX की मार्जिन बुक का बाकी हिस्सा भी बहुत अधिक राहत नहीं देता. ब्रोकरों से प्राप्त नकद मार्जिन केवल 56.9 अरब रुपये है, जो कुल मार्जिन का लगभग 10% है. सरकारी प्रतिभूतियां, जिन पर नए नियमों का कोई प्रभाव नहीं पड़ता कुल मार्जिन का 10% से भी कम हिस्सा हैं.

कोलेटरल के रूप में गिरवी रखे गए इक्विटी शेयरों (72.9 अरब रुपये, लगभग 13%) पर अब RBI के नए नियमों के तहत न्यूनतम 40% हेयरकट लागू होगा. इसी तरह, म्यूचुअल फंड यूनिट्स (27.8 अरब रुपये) पर भी समान नियम लागू होंगे.

यदि इन सभी आंकड़ों को जोड़कर देखा जाए, तो MCXCCL के कुल मार्जिन पूल का केवल लगभग एक-चौथाई हिस्सा, जिसमें नकद, सरकारी प्रतिभूतियां और गैर-नकद सोने (Non-Cash Gold) का 10.9 अरब रुपये का छोटा पोर्टफोलियो शामिल है, ऐसे साधनों में है, जिन पर नए नियमों का असर नहीं पड़ेगा. यानी कुल मार्जिन का लगभग तीन-चौथाई हिस्सा या तो सीधे नए प्रतिबंधों से प्रभावित होगा या उस पर अतिरिक्त हेयरकट लागू होगा.

कमोडिटी डेरिवेटिव्स में भारतीय बाजार के सबसे ऊंचे मार्जिन रेट्स में से कुछ लागू होते हैं. कच्चे तेल और प्राकृतिक गैस के कॉन्ट्रैक्ट्स में शुरुआती मार्जिन सामान्य तौर पर दो अंकों में होता है और बाजार में अस्थिरता बढ़ने पर यह और अधिक हो सकता है.

ऐसे में कमोडिटी बाजार में कारोबार करने वाली मध्यम आकार की प्रोप ट्रेडिंग फर्मों और ब्रोकरेज कंपनियों के लिए इतनी बड़ी राशि नकद मार्जिन के रूप में रखना आर्थिक रूप से व्यावहारिक नहीं था.

बैंक गारंटी, जो अक्सर किसी फिक्स्ड डिपॉजिट के आधार पर जारी की जाती थी, उन्हें कम पूंजी लगाकर अधिक मार्जिन उपलब्ध कराने का माध्यम बनती थी. उदाहरण के तौर पर, यदि किसी सदस्य के पास 50 रुपये की अपनी पूंजी होती, तो बैंक गारंटी के जरिए वह MCXCCL के पास 100 रुपये का कोलेटरल दिखा सकता था.

लेकिन अब Commercial Banks – Credit Facilities Amendment Directions, 2026 के तहत प्रत्येक बैंक गारंटी को 100% कोलेटरल से समर्थित होना अनिवार्य कर दिया गया है, जिसमें कम से कम आधा हिस्सा नकद होना चाहिए. इसका अर्थ है कि सस्ती लीवरेज की व्यवस्था समाप्त हो गई है, और इसका सबसे अधिक असर उसी बाजार पर पड़ा है जहां इसका सबसे अधिक उपयोग किया जाता था.

यही वह व्यवस्था है, जिसे ब्लूमबर्ग ने घरेलू प्रोप ट्रेडिंग उद्योग के लिए "बड़ा झटका" बताया था. कर्णा स्टॉक ब्रोकिंग के कार्तिक पी. के अनुसार, बैंक गारंटी पर निर्भर कंपनियों की प्रभावी ट्रेडिंग क्षमता लगभग आधी रह जाएगी. पहले जहां वे अपनी पूंजी का लगभग 1.7 गुना कारोबार कर सकती थीं, वहीं अब यह क्षमता घटकर लगभग 0.85 गुना रह जाएगी.

हालांकि, शुरुआती आकलनों में एक बड़ी चूक हुई. 1 जुलाई से पहले अधिकांश अनुमान इक्विटी इंडेक्स ऑप्शंस पर केंद्रित थे, जहां प्रोप ट्रेडिंग डेस्क का योगदान लगभग 40% माना जाता है. MCX को अपेक्षाकृत कम प्रभावित होने वाला एक्सचेंज माना गया था.

लेकिन क्लियरिंग आंकड़े इसके बिल्कुल विपरीत तस्वीर पेश करते हैं. अपने कुल मार्जिन पूल के अनुपात में देखा जाए तो किसी भी अन्य भारतीय एक्सचेंज की तुलना में MCX के सदस्यों की फंडिंग सबसे अधिक बैंक-आधारित है.

दोहरी चुनौती से जूझ रहा है MCX

MCX के सामने एक और बड़ी चुनौती यह है कि उसके पास वे "शॉक एब्जॉर्बर" नहीं हैं, जिनका लाभ इक्विटी बाजारों के बड़े एक्सचेंज उठा सकते हैं.

उदाहरण के लिए, NSE के ऑप्शंस बाजार में प्रतिभागियों का आधार काफी व्यापक और विविध है. इसमें विदेशी हाई-फ्रीक्वेंसी ट्रेडिंग (HFT) फर्म, FPI और GIFT City के माध्यम से आने वाले विदेशी निवेशक, संस्थागत निवेशक और बड़ी संख्या में खुदरा निवेशक शामिल हैं. यदि घरेलू प्रोप ट्रेडिंग डेस्क का कारोबार कम भी हो जाए, तो इन अन्य प्रतिभागियों के जरिए बाजार में लिक्विडिटी बनी रह सकती है.

BSE की स्थिति भी कुछ हद तक ऐसी ही है. भले ही उसका कारोबार मुख्य रूप से थोक निवेशकों पर आधारित हो, लेकिन उसे सेंसेक्स से जुड़े खुदरा निवेशकों का भी समर्थन प्राप्त है.

इसके विपरीत, MCX का कारोबार काफी हद तक उन्हीं घरेलू प्रोप ट्रेडिंग फर्मों और जॉबर्स पर निर्भर है, जो अब RBI के नए कोलेटरल नियमों से सबसे अधिक प्रभावित हो रहे हैं.

स्थिति को और कठिन यह तथ्य बनाता है कि विदेशी मार्केट मेकर्स आसानी से उनकी जगह नहीं ले सकते. बैंक, बीमा कंपनियां और अधिकांश विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPI) की कमोडिटी डेरिवेटिव्स में भागीदारी अब भी सीमित है. भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (SEBI) के अध्यक्ष भी पहले स्पष्ट कर चुके हैं कि RBI और IRDAI इस विषय पर अभी भी प्रतिबंधात्मक रुख बनाए हुए हैं.

इस प्रकार, एक ओर नए नियम MCX के प्रमुख लिक्विडिटी प्रदाताओं पर दबाव डाल रहे हैं, वहीं दूसरी ओर नियामकीय प्रतिबंध संभावित वैकल्पिक प्रतिभागियों को बाजार में आने से रोक रहे हैं. यही कारण है कि जिस एक्सचेंज को सबसे सुरक्षित माना जा रहा था, वहीं जुलाई के पहले तीन कारोबारी सत्रों में लगातार ऑप्शंस प्रीमियम वॉल्यूम में गिरावट दर्ज की गई.

आधिकारिक आंकड़ों में अभी नहीं दिखेगा पूरा असर

फिलहाल इन बदलावों का पूरा प्रभाव आधिकारिक आंकड़ों में दिखाई नहीं देगा. MCX जुलाई महीने के कारोबार के आंकड़े अपनी मासिक रिपोर्ट में जारी करेगा, जबकि क्लियरिंग कॉरपोरेशनों की अगली रिपोर्ट से यह स्पष्ट होगा कि नए नियम लागू होने के बाद मार्जिन के स्वरूप  में कितना बदलाव आया है.

फिर भी, बाजार में कारोबार के रुझानों से दिशा स्पष्ट दिखाई देने लगी है और दिसंबर 2025 की मार्जिन बुक यह समझने के लिए पर्याप्त संकेत देती है कि इसका असर किस तरह पड़ रहा है.

जून महीने में बाजार इस बात पर चर्चा कर रहा था कि RBI के नए नियमों से किस एक्सचेंज के ऑप्शंस कारोबार पर सबसे अधिक असर पड़ेगा. लेकिन संभव है कि यह सवाल ही गलत था.

असल मुद्दा कभी ऑप्शंस बनाम फ्यूचर्स नहीं था. वास्तविक सवाल यह था कि कौन-से बाजार प्रतिभागी अपनी बैलेंस शीट के लिए सबसे अधिक बैंक गारंटी और बैंक-आधारित कोलेटरल पर निर्भर थे. और इस पैमाने पर देखा जाए, तो MCX शुरुआत से ही सबसे आगे था.

दिसंबर 2025 तक के मार्जिन आंकड़ों का स्रोत: ICCL, NCL और MCXCCL.
BSE के नकद मार्जिन का अनुमान कुल मार्जिन के 2% के आधार पर लगाया गया है, क्योंकि ICCL नकद, फिक्स्ड डिपॉजिट और बैंक गारंटी को एक साथ दर्शाता है.
NSE के आंकड़े उद्योग के कुल आंकड़ों में से BSE और MCX के आंकड़े घटाकर निकाले गए हैं.

पलक शाह, BW रिपोर्टर्स

(पलक शाह एक अनुभवी खोजी पत्रकार हैं और The Market Mafia: Chronicle of India’s High-Tech Stock Market Scandal & The Cabal That Went Scot-Free के लेखक हैं. लगभग दो दशकों के अनुभव के साथ, उन्होंने मुंबई में जमीनी रिपोर्टिंग करते हुए पैसे, ताकत और नियमों के गठजोड़ को उजागर किया है. उनके लेख The Economic Times, Business Standard, The Financial Express और The Hindu Business Line जैसे प्रमुख प्रकाशनों में प्रकाशित हुए हैं. 19 साल की उम्र में अपराध पत्रकारिता से शुरुआत करने वाले पलक ने जल्द ही समझ लिया कि 1980 के दशक के गैंगवार अब कॉरपोरेट अपराध में बदल चुके हैं. इसी ने उन्हें वित्तीय पत्रकारिता की ओर मोड़ा, जहां उन्होंने बाजार हेरफेर और सिस्टम की खामियों को उजागर किया.)
 

 


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