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आपकी पॉकेट में जो कुछ बचा है, उस पर भी है सरकार की नजर!

सरकार आमजन की जेब को खाली करके अपने वित्तीय हालात सुधारने की नाकाम कोशिशें कर रही है.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 4 years ago

अजय शुक्ला
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)

लेखा महानियंत्रक ने 31 अक्टूबर को जारी आकड़ों से स्पष्ट कर दिया कि चालू वित्तवर्ष की पहली छमाही (अप्रैल से सितंबर) के बीच सरकार ने 18.24 ट्रिलियन रुपए खर्च किए हैं, एक साल पहले ये आंकड़ा 16.26 ट्रिलियन रुपए था. सरकार ने चालू वित्तवर्ष में लगभग 40 ट्रिलियन रुपए खर्च करने का लक्ष्य रखा है, जो पिछले साल की तुलना में तकरीबन 4 फीसदी अधिक है. नतीजतन भारत का राजस्व घाटा अधिक कर संग्रह के बावजूद बहुत अधिक बढ़ा है, जो वित्तीय हालात को और भी चिंताजनक बना रहा है. यह अकुशल वित्तीय प्रबंधन को दर्शाता है.

राजकोषीय घाट बढ़ रहा
लेखा महानियंत्रक की रिपोर्ट से पता चलता है कि अप्रैल से सितंबर दो तिमाही में भारत का राजकोषीय घाटा बढ़कर 6.20 लाख करोड़ रुपए हो गया है, जो पूरे साल के घाटे के लक्ष्य का 37.3 फीसदी है. चालू वित्तवर्ष 2022-23 की पहली छमाही अप्रैल-सितंबर 2022 के दौरान केंद्रीय राजकोषीय घाटे में तेज बढ़ोतरी को दर्शा रहा है. सरकार को पिछले महीने सितंबर में 78,248 करोड़ रुपए का राजकोषीय घाटा हुआ है, जो एक साल पहले की तुलना में 33 फीसदी अधिक है. हालांकि कर संग्रह में अच्छी बढ़ोतरी हुई थी. अप्रैल-सितंबर के दौरान कर संग्रह 10.12 ट्रिलियन रुपए रहा, जो एक साल पहले की तुलना में लगभग 10 फीसदी अधिक है. अर्थशास्त्रियों के मुताबिक, इस वित्तीय वर्ष 2022-23 में सरकार के खर्च में लगभग 2 ट्रिलियन रुपए से अधिक की बढ़ोतरी होगी, जिससे आने वाले समय में यह घाटा और अधिक बढ़ सकता है, जिसकी भरपाई के लिए आपकी पॉकेट से कुछ और कटौती भी होना तय है.

विकास दर में सुधार की उम्मीद कम 
राजकोषीय घाटे के परिणाम, भविष्य में आने वाले वित्तीय बोझ को दर्शाते हैं. अगर खर्च को नियंत्रित नहीं किया जाता है, तो पिछड़ रही अर्थव्यवस्था, भविष्य के कर और दूसरे उपकरों में तब्दील हो जाते हैं. आने वाले वक्त में देश में कई चुनाव हैं, जिन पर बड़ा खर्च होना तय है. नतीजतन सकल घरेलू उत्पाद की विकास दर में सुधार की उम्मीद कम दिख रही है. सकल घरेलू उत्पाद का एक बड़ा हिस्सा देश पर लद चुके बड़ी कर्ज की रकम का ब्याज और किश्त चुकाने पर खर्च करना पड़ेगा. इसके साथ ही बढ़े राजकोषीय घाटे के कारण, अंतर्राष्ट्रीय और घरेलू मुद्रा बाजार में सरकार की विश्वसनीयता लगातार कम हो जा रही है, जो अर्थव्यवस्था की क्रेडिट रेटिंग को भी खराब करेगी. विदेशी निवेशकों की पहले ही हमारी अर्थव्यवस्था में अरुचि हो चुकी है. घाटे के नए आंकड़े के बाद हालात सुधरते नहीं दिखते हैं. आयात लगातार महंगा हो रहा है. डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपए की हालत पतली है, मगर उसे सुधारने की दिशा में हमारी वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण कुछ भी करने को तैयार नहीं हैं. उलट, वो खुद वाशिंगटन के वैश्विक मंच पर कहती हैं कि डॉलर मजबूत हो रहा है, न कि रुपया कमजोर. बहराल इन हालात से भुगतान संतुलन का घाटा भी बढ़ने लगा है. मौजूदा स्थिति कर्ज के चक्र को और भी बढ़ाने वाली है.

कम हो रहा विदेशी मुद्रा भंडार 
पिछले सप्ताह ही वित्त मंत्री ने दावा किया था कि भारतीय अर्थव्यवस्था की बुनियाद मजबूत है. दुनिया के अन्य हिस्सों की तुलना में भारत में मुद्रास्फीति कम है. हालांकि अमेरिकी डॉलर के मुकाबले इस वर्ष रुपए में 8 फीसदी से अधिक की गिरावट आई है. रुपए की गिरती साख और बढ़ता व्यापार घाटा भारत के भविष्य के आर्थिक संकट को स्पष्ट करता है. वित्तमंत्री के दावों के विपरीत भारत के विदेशी मुद्रा भंडार में और भी गिरावट आई है. रिजर्व बैंक के ताजा आंकड़े बताते हैं कि 21 अक्टूबर के सप्ताह में विदेशी मुद्रा भंडार 3.8 अरब डॉलर घटकर 524.5 अरब डॉलर रह गया. जुलाई 2020 के मुकाबले तकरीबन 28 माह बाद विदेशी मुद्रा भंडार अपने सबसे निचले स्तर पर है. पिछले साल के मुकाबले में इसमें 115 अरब डॉलर की गिरावट दर्ज की गई है.

इस मामले में कुछ राहत
भारत लगातार तमाम वैश्विक इंडेक्स में नीचे के पायदान पर पहुंचता जा रहा है. सामाजिक आर्थिक दायरा भी नागरिकों के बीच काफी बढ़ता जा रहा है. इससे हालात सुधरते नहीं दिख रहे हैं, मगर राहत भरी खबर यह है कि 8 कोर सेक्टर उद्योगों का आउटपुट सितंबर में 7.9 फीसदी बढ़ा है, जो पिछले साल इसी दौरान 5.4 फीसदी था. वाणिज्य मंत्रालय के सोमवार को जारी किए गए ताजा आंकड़ों के मुताबिक, अगस्त में इन्हीं 8 कोर ढांचागत सेक्टर्स की ग्रोथ 3.3 फीसदी थी. सितंबर 2022 में सीमेंट, कोल, फर्टिलाइजर्स, इलेक्ट्रिसिटी, स्टील और रिफाइनरी प्रॉडक्ट्स इंडस्ट्रीज का उत्पादन बढ़ा है. इंडेक्स में शामिल 8 कोर सेक्टर्स- कोल, क्रूड ऑयल, नेचुरल गैस, रिफाइनरी प्रॉडक्ट्स, फर्टिलाइजर्स, स्टील, सीमेंट और इलेक्ट्रिसिटी हैं. सितंबर 2022 में पिछले साल की समान अवधि के मुकाबले स्टील आउटपुट 6.7 फीसदी और सीमेंट उत्पादन 12.1 फीसदी बढ़ा है. क्रूड ऑयल आउटपुट 2.3 फीसदी और नेचुरल गैस आउटपुट 1.7 फीसदी घटा है. अर्थशास्त्री यह भी मानते हैं कि यह बढ़त स्थाई नहीं बल्कि त्योहारी सीजन की मांग के अनुरूप थी. ऐसे में बहुत बढ़त की उम्मीद नजर नहीं आती है.

क्या डिजिटल करेंसी से सुधरेगी सेहत
रिजर्व बैंक ने एक नवंबर को देश की पहली डिजिटल करेंसी लॉन्च की है. फिलहाल, पायलट प्रोजेक्ट के तौर पर सेंट्रल बैंक डिजिटल करेंसी जारी की गई है. एसबीआई, बैंक ऑफ बड़ौदा, यूनियन बैंक ऑफ इंडिया, एचडीएफसी बैंक, आईसीआईसीआई बैंक, कोटक महिंद्रा बैंक, यस बैंक, आईडीएफसी फर्स्ट बैंक और एचएसबीसी को चुना गया है. डिजिटल करेंसी दो तरह की सीबीडीसी होलसेल और सीबीडीसी रिटेल हैं. सीबीडीसी होलसेल बड़े वित्तीय संस्थानों जैसे बैंक, बड़ी नॉन बैंकिंग फाइनेंस कंपनियां और दूसरे बड़े सौदे करने वाले संस्थान करेंगे. सीबीडीसी रिटेल का प्रयोग रोजमर्रा के लेनदेन के लिए होगा. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को डिजिटल करेंसी से बड़ी उम्मीदें हैं मगर वो अर्थव्यवस्था को कैसे तंदरुस्त करेगी, यह बड़ा सवाल है. आपको याद होगा, नोटबंदी के वक्त भी बड़ी उम्मीदें प्रधानमंत्री ने दिखाई थीं. नतीजे भले ही उनको चुनावी जीत के रूप में मिले हों, अर्थव्यवस्था अब तक बदतर हालात में है.

इस पर करना होगा चिंतन
वैश्विक खाद्य संकट के बीच भारत के कृषि उत्पादन में आई गिरावट निश्चित रूप से चिंताजन है. रोजगार का संकट पहले ही विकराल है और इसमें सुधार होता नहीं दिख रहा है. अगले कुछ माह चुनावों के दौरान सरकार की लोकलुभावन योजनाओं का नकारात्मक असर अंततः आम करदाताओं पर पड़ना लाजमी है. यह हालात अर्थव्यवस्था को समृद्ध नहीं कर सकते हैं. ऐसे में मजबूत अर्थव्यवस्था का दावा सच्चाई से इतर है. बहराल, अब सरकार और अर्थशास्त्रियों को इस बात का चिंतन करना है कि वो कैसे अर्थव्यवस्था को दुरुस्त करते हैं? कैसे राजकीय खर्च को कम करते हैं और कर्ज का बोझ घटाते हैं? आमजन पर वित्तीय बोझ डाले बिना ही कैसे वित्तीय प्रबंधन को सुधारा जाए? मगर सरकार इस दिशा में काम करने के बजाय आमजन की जेब को खाली करके अपने वित्तीय हालात सुधारने की नाकाम कोशिशें कर रही है, जो सही नतीजों से भटक जाते हैं. वास्तविकता यह है कि इलाज जिस बीमारी का करना है, उसका न करके नकारात्मक रास्तों के बूते वो अर्थव्यवस्था सुधारना चाहते हैं, जो बोझ बढ़ाने वाला है, न कि घटाने वाला.


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