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इस गर्मी बिजली देगी झटके, महंगा आयातित कोयला बढ़ाएगा संकट!

सरकार ने कोयला ढुलाई के वैकल्पिक नए मार्ग बनाये हैं, जिसमें रेल और समुद्र दोनों के मार्ग शामिल हैं. पनबिजली के साथ ही गैस पर आधारित बिजली के क्षेत्र में भी संभावना तलाशी जा रही है.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 3 years ago

  • अजय शुक्ला, वरिष्ठ पत्रकार

केंद्र सरकार की नीतियों और नियमों के चलते देश में आने वाली गर्मी लोगों को रुलाने वाली है. जहां बिजली संकट बढ़ने और आपकी जेब कटने से बचना मुश्किल होने वाला है. बिजली के परंपरागत उत्पादन स्रोतों के अतिरिक्त अन्य स्रोत तमाम दावों के बाद भी तैयार नहीं हो पाये हैं. हालात ये हैं कि अपरंपरागत ऊर्जा स्रोतों से बिजली आपूर्ति में 10 फीसदी मदद भी नहीं मिल पा रही है. केंद्र सरकार के क्षमता बढ़ाने की तमाम कोशिशों के दावे सरकारी आंकड़ों में ही दम तोड़ गये, जिससे अक्षय ऊर्जा यानी सौर और पवन ऊर्जा की कुल बिजली आपूर्ति में हिस्सेदारी बेहद निराशाजनक है. दूसरी तरफ बिजली की मांग लगातार बढ़ती जा रही है. मौसम विभाग के अनुमान बताते हैं कि इस बार गर्मी रिकॉर्ड तोड़ सकती है. ऐसी स्थिति में स्वाभाविक तौर पर बिजली की मांग बहुत बढ़ेगी. बिजली उत्पादन कोयले की उपलब्धता पर निर्भर करता है. आयातित कोयला घरेलू कोयले के मुकाबले बहुत अधिक महंगा होने से इन गर्मियों में बिजली वितरण कंपनियों को बिजली काफी महंगी पड़ने वाली है. इसका एक बड़ा कारण केंद्र सरकार का वो फैसला है जिसमें वितरण कंपनियां बिजली के दाम बढ़ाने को लेकर पूरी तरह स्वतंत्र कर दी गई हैं.

15 से 30 फीसदी बढ़ सकती हैं दरें
उत्पादन लागत बढ़ने और फिर उसकी खरीद महंगी होने से कंपनियों की लागत लगातार बढ़ रही है. इस वजह से वितरण कंपनियों ने बिजली के दाम बढ़ाने पर जोर देना शुरू कर दिया है. मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, गुजरात जैसे राज्यों ने 15 से 30 फीसदी दरें बढ़ाने का प्रस्ताव तैयार कर लिया है. जल्द ही इसको मंजूरी मिलने की संभावना है. ये कंपनियां पहले से ही घाटा झेल रही हैं, जिससे वितरण कंपनियों पर लागत का दबाव बहुत बढ़ गया है. वो और सरकार दोनों ही इसके जरिए दाम बढ़ाने को न्यायोचित ठहराना चाहते हैं. इसका असर घरेलू बिजली से अधिक व्यवसायिक और औद्योगिक क्षेत्र के साथ ही कृषि क्षेत्र में भी पड़ना लाजिमी है. जो न सिर्फ महंगाई बढ़ाएगा बल्कि आम जनता पर भारी बोझ डालेगा. हमें पता है कि पिछले साल किस तरह से कोयले की कमी के चलते गंभीर बिजली संकट भी पैदा हुआ था और उद्योगों का उत्पादन काफी गिर गया था. व्यवसाय भी काफी प्रभावित हुआ था. पिछले साल तमाम राज्यों में कम कोयले की आपूर्ति से केंद्र सरकार कटघरे में आई थी. इस बार ऐसी स्थिति पैदा न हो, इससे इस बार केंद्र सरकार ने गर्मी बढ़ने के पहले ही जरूरी उपाय करने शुरू कर दिये हैं मगर महंगाई कैसे काबू होगी, इसकी कोई रणनीति नहीं है.

कोयले की मांग में आई तेजी 
सरकार ने कोयला ढुलाई के वैकल्पिक नए मार्ग बनाये हैं, जिसमें रेल और समुद्र दोनों के मार्ग शामिल हैं. पनबिजली के साथ ही गैस पर आधारित बिजली के क्षेत्र में भी संभावना तलाशी जा रही है. मांग बढ़ने की संभावनाओं के बीच डिस्कॉम ने बिजली खरीद बढ़ाई है, जिससे कोयले की मांग बढ़ेगी. अब जेनको महंगा कोयला आयात कर रही है. हाइड्रो और गैस भी महंगी है. इससे कुछ बिजली कंपनियों की बिजली लागत पिछले दो साल की तुलना में दोगुनी से अधिक जाएगी. इक्रा के मुताबिक वित्त वर्ष 22 के पहले 10 महीनों की तुलना में वित्त वर्ष 23 के पहले 10 महीनों में बिजली इकाइयों का कोयला आयात 110 फीसदी अधिक है. इस दौरान थर्मल पीएलएफ पिछले साल की तुलना में 64 फीसदी बढ़ा है, जिससे कोयले की भी मांग बढ़ी है. कोयले की आपूर्ति में दो अंकों की बढ़ोतरी हुई है, लेकिन घरेलू कोयला आपूर्ति की अपनी सीमाएं हैं. देर से भुगतान के अधिभार (एलपीएस) नियमों के माध्यम से भुगतान को लेकर अनुशासन और आरडीएसएस के कारण डिस्कॉम पर सख्ती बढ़ गई है. केंद्र सरकार ने आदेश दिया है कि अगर डिस्कॉम उत्पादन कंपनियों को वक्त पर भुगतान नहीं करेंगी तो उनकी आपूर्ति रोक दी जाएगी. इससे साफ है कि डिस्कॉम को अधिक वित्त की जरूरत पड़ेगी, जो उनके पास नहीं है.

बैंकों में तरलता का संकट
आरबीआई के ताजा आंकड़े बताते हैं कि हमारी बैंकों में तरलता का संकट लगातार बना हुआ है. इस प्रकार, तरलता जोखिम इन दायित्वों को पूरा करने में बैंक की अक्षमता को संदर्भित करता है, जिससे इसकी वित्तीय स्थिति या अस्तित्व के खिलाफ खतरा होता है. वहीं, अमेरिका में बैंकिंग संकट बढ़ता जा रहा है. अमेरिकी बैंक एक के बाद एक मुश्किल से घिर रहे हैं. पहले सिलिकॉन वाली बैंक और फिर सिग्नेचर बैंक की मुश्किलें बढ़ी. अमेरिकी बैंकों का संकट दुनियाभर के बैंकों के लिए खतरा बनता जा रहा है. ऐसे में जरूरी वित्त की मांग कितने बैंक पूरी कर पाएंगे और पहले से ही घाटे में खड़ी वितरण कंपनियों को जरूरी फंड कैसे उपलब्ध करा पाएंगे. ऐसे में सरकार का यह निर्देश बिजली वितरण कंपनियों के लिए भारी संकट पैदा करने वाला है. वक्त पर भुगतान न होने पर बिजली संकट पैदा होना भी लाजिमी है. इस संकट से निपटने के लिए सरकार और कंपनियों के पास फिलहाल कोई रास्ता नहीं है. केंद्र सरकार पहले ही राज्यों के राजस्व के हिस्से का भुगतान वक्त पर नहीं कर पा रही है.

यह किया जाना चाहिए
आरबीआई महंगाई कम करने के लिए लगातार रिपो रेट बढ़ाती जा रही है मगर वो काबू में नहीं आ पा रही है. ऐसे में बिजली की लागत और वितरण शुल्क बढ़ने का मतलब है कि कोर सेक्टर के साथ ही रोजमर्रा की वस्तुओं के उत्पादन की लागत बढ़ना. ऐसा हुआ तो बहुत से अन्य संकट भी खड़े हो जाएंगे. हालांकि यह चुनावी साल है, ऐसे में निश्चित रूप से सरकार कोई ऐसा जोखिम नहीं लेना चाहेगी, जिससे उसको चुनावी संकट पैदा हो. इसका सबसे अच्छा उपाय घरेलू कोयले की उपलब्धता सुनिश्चित कराने के साथ ही गैर परंपरागत विद्युत उत्पादन पर जोर देने की जरूरत है. विदेशी कोयला आयात करने से चंद पूंजीपतियों को लाभ तो होगा मगर देश को नुकसान ही होगा.


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