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शिकायत, गुस्सा और सलाह: इस तरह खुद को रखें खुश

जब कोई हमारी बात न माने, हमें चिढ़ा दे, हमारा अपमान कर दे या हमारा कोई नुकसान कर दे तो हमें गुस्सा आ जाता है.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 3 years ago

  • पीके खुराना, हैपीनेस गुरु 

मैं कई ऐसे ग्रुप्स में शामिल हूं, जिसके सदस्य वरिष्ठ पदों पर विराजमान हैं, या कंपनियों के मालिक हैं. मेरा अनुभव है कि ये वरिष्ठ, सफल और प्रतिष्ठित लोग भी तीन समस्याओं से परेशान हैं और वे समस्याएं हैं अपने जीवन से शिकायत, अचानक गुस्से का लावा फूट पड़ना और किसी प्रियजन को उसके लाभ की सलाह देने के बावजूद उसकी उपेक्षा या नाराज़गी मोल लेना.

बाकी सब भूल जाते हैं
अगर कभी हमारे किसी दांत में कीड़ा लगने के कारण जब वह दांत दर्द करने लगे तो मानो दिल, दिमाग और शरीर उसी दांत में सिमट जाते हैं. दर्द दे रहा दांत याद रहता है और हम बाकी सब कुछ भूल जाते हैं. तब हमें याद रखना चाहिए कि हमारे सभी दांत दर्द नहीं कर रहे और हमारा बाकी शरीर भी स्वस्थ है. जीवन की किसी एक समस्या से परेशान हों तो भी जीवन की दूसरी खुशियों को न भूलें और उन खुशियों का भरपूर आनंद लें.

गुस्सा आना स्वाभाविक है
हमारे गुस्से का भी यही हाल है. जब कोई हमारी बात न माने, हमें चिढ़ा दे, हमारा अपमान कर दे या हमारा कोई नुकसान कर दे तो हमें गुस्सा आ जाता है, पर बहुत बार ऐसा भी होता है कि हमें गुस्सा आया लेकिन हम अपना गुस्सा प्रकट नहीं कर पाते और चुपचाप गुस्सा पी जाते हैं. ऐसा जाने-अनजाने कई बार होता है. इसके विपरीत कई बार ऐसा भी होता है कि हमें गुस्सा आया, हम फट पड़े और बाद में हमें पछताना पड़ा. कोई हमारा अपमान कर दे या नुकसान कर दे तो गुस्सा आना स्वाभाविक है, लेकिन क्या हमने कभी सोचा है कि गुस्सा आना और गुस्सा दिखाना दो अलग-अलग बातें हैं, दो अलग-अलग क्रियाएं हैं? 

गुस्सा होने की एक्टिंग
गुस्सा आया, इसका मतलब है कि हम गुस्से में हैं और गुस्सा हमें नियंत्रित कर रहा है. गुस्सा दिखाया, इसका मतलब है कि हमें गुस्सा आया या नहीं आया, आया भी तो हमने उसका विश्लेषण किया और अपने गुस्से पर काबू पाकर ऐसा अभिनय किया मानो हम गुस्से में हों. ऐसी स्थिति में हम अपने कंट्रोल में हैं, हम गुस्सा होने की एक्टिंग कर रहे हैं ताकि सामने वाले से मनचाहा काम करवा सकें. “गुस्सा आया” और “गुस्सा दिखाया” में यही अंतर है.

बेवजह की सलाह
इसी तरह कभी जब हमारा कोई प्रियजन किसी समस्या से दो-चार होता है तो हमारा बहुत मन होता है कि हम उसे सलाह दें ताकि वह उस समस्या से मुक्ति पा सके. इस उत्साह में कई बार हम पूरी पृष्ठभूमि जाने बिना सलाह दे डालते हैं, या बिना मांगे ही सलाह दे डालते हैं. अगर सचमुच किसी ने हमसे सलाह मांगी तो भी हमारा रुख क्या होता है? अक्सर हम पूरी स्थिति समझे बिना फटाफट सलाह दे डालते हैं और उससे बात बिगड़ जाती है. हम सामने वाले का भला चाहते हैं लेकिन हम इस ढंग से काम नहीं करते कि हमारा रुख उसे पसंद आये. यही स्थिति तब होती है जब हम अपनी कोई बात किसी को समझाना चाहें, मनवाना चाहें तो हमारा रुख क्या होना चाहिए? यह एक आम समस्या है जिससे हम रोज़ ही दो-चार होते हैं. इस समस्या से पार पाने का तरीका यह है कि हम सवाल पूछें, ज्यादा सवाल पूछें और अंतत: सवालों के ही माध्यम से सामने वाले को उस स्थिति तक ले आएं, जहां या तो उसे अपनी समस्या का समाधान मिल जाए या वह हमारी बात से सहमत हो जाए. 

ये है आदर्श स्थिति
जब हम बिना कोई सुझाव दिये सिर्फ सवाल पूछते चलते हैं और सामने वाले को इस स्थिति पर ले आते हैं कि उसे ही हल सूझ जाए तो वह आदर्श स्थिति है क्योंकि सामने वाले को यह नहीं लगता कि हमने उस पर कोई निर्णय या हल थोप दिया, बल्कि उसे लगता है कि वह हल उसने खुद ढूंढ़ा. ऐसे किसी हल को जीवन में उतारना उनके लिए आसान हो जाता है. सफलता के इन तीनों मंत्रों को अपना लें तो हमारा जीवन सुखमय हो जाता है.


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