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एक बराबर है जनसंख्या, फिर लग्जरी में चीन से क्यों पीछे है भारत?

1.4 बिलियन की बराबर जनसंख्या के बावजूद चीन की तुलना में भारत में लग्जरी वस्तुओं की मौजूदगी कम क्यों है?

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 3 years ago

Vikram Limsay, an entrepreneur and a policy-business consultant.

दो दशकों पहले भारत में Apple की एंट्री के बाद हाल ही में मुंबई में देश का पहला Apple स्टोर खुला, संयुक्त राष्ट्रसंघ की जनसंख्या रिपोर्ट में पहली बार भारत को चीन से ऊपर स्थान मिला और LVMH के CEO और लग्जरी क्षेत्र के प्रमुख Bernard Arnault ने Elon Musk को पीछे छोड़कर दुनिया के सबसे अमीर आदमी के ताज को अपने नाम किया. हाल ही में हुई इन घटनाओं और उपलब्धियों के बाद ही मैंने यह आर्टिकल लिखने का फैसला किया. 

भारत में कम क्यों है लग्जरी ब्रैंड्स का उपभोग?
देश-विदेश में मौजूद मेरे दोस्त खासकर वह जो लग्जरी इंडस्ट्री में मौजूद हैं, अक्सर यह सवाल करते हैं कि 1.4 बिलियन की बराबर जनसंख्या के बावजूद चीन की तुलना में भारत में लग्जरी वस्तुओं की मौजूदगी कम क्यों है? पॉलिसी बनाने वालों के लेवल पर भी यह एक जरूरी है सवाल है कि आखिर एक संवैधानिक, मुक्त मार्केट, मिक्स्ड इकॉनमी वाले देश की लग्जरी वस्तुओं का उपभोग एक ऐसे देश की तुलना में कम क्यों है जो देंग शियाओ पिंग के राज से मुक्त हुआ है और जिसका इकॉनोमिक मॉडल कैपिटलिस्ट है. साथ ही यह सवाल भी जरूरी है कि क्या सिर्फ GDP (सकल घरेलु उत्पाद) और GDP Per Capita (GDP प्रति व्यक्ति आय) ही लग्जरी वस्तुओं की सेल्स दर्शाते हैं? 

भारत और चीन
हालांकि यह सच है कि 3.5 ट्रिलियन डॉलर्स की भारतीय इकॉनमी चीन की इकॉनमी के छठे भाग से भी कम है लेकिन अगर दोनों देशों की GNI (सकल राष्ट्रीय आय) और प्रति व्यक्ति आय की तुलना की जाए तो यह अंतर बहुत कम रह जाता है. GNI और प्रति व्यक्ति आय दो ऐसे कारक हैं जो वाकई उपभोग को दर्शाते हैं. PPP (Purchasing Power Parity) के मायनों में बात करें तो भारत की PPP, 7000 डॉलर्स है जो लगभग चीन की PPP का एक तिहाई है. लेकिन इस सबके बावजूद लग्जरी सेगमेंट में चीन, भारत से मीलों आगे है. चीन के लग्जरी सेगमेंट में 350 बिलियन डॉलर्स की एक ग्लोबल केटेगरी है जिसमें स्विस घड़ियां, कपड़े, परफ्यूम, बैग्स जैसे प्रोडक्ट्स शामिल हैं और ज्यादातर लोगों को LVMH, Hermes, Kering जैसे ब्रैंड्स पसंद हैं.  

चीन का लग्जरी सेगमेंट 
चीन के लग्जरी सेगमेंट की शुरुआत स्विस घड़ियों से करते हैं. हर साल चीन 2.5 बिलियन डॉलर्स की स्विस घड़ियों का इम्पोर्ट करता है जबकि भारत हर साल सिर्फ 200 मिलियन डॉलर्स की घड़ियां ही इम्पोर्ट करता है. अगर इस आंकड़े की तुलना घड़ियों की संख्या में करें तो हर साल चीन में 17 लाख घड़ियां इम्पोर्ट की जाती हैं जबकि भारत में सिर्फ 1.25 लाख घड़ियां ही इम्पोर्ट की जाती हैं. लग्जरी रिटेल भी चीन और भारत के लग्जरी सेगमेंट के अंतर को दर्शाने का एक अच्छा उदाहरण हैं. चीन में Louis Vuitton के लगभग 30 स्टोर्स हैं जबकि भारत में कंपनी के सिर्फ 3 ही स्टोर्स हैं. इतना ही नहीं जिस Apple को भारत में अपना पहला स्टोर खोलने में 25 साल लग गए, उसके भी चीन में लगभग 40 स्टोर्स हैं. हर साल चीन में लगभग 60 मिलियन Iphone खरीदे जाते हैं जबकि भारत में यह आंकड़ा सिर्फ 6 मिलियन है. लग्जरी कारों की बात करें तो Mercedes Benz, BMW, Audi जैसी नामी लग्जरी कार कंपनियों की कुल 30,000 गाड़ियां ही एक साल में भारत में बिक पाती हैं जबकि चीन में यह आंकड़ा 3 लाख के पार है. चीन में हर साल लगभग 2 करोड़ 40 लाख गाड़ियां बेचीं जाती हैं और चीन भारत की तुलना में 6 गुना बड़ी कार मार्केट है. 

इस क्षेत्र में आगे है भारत
लेकिन एक लग्जरी सेगमेंट में एक क्षेत्र ऐसा है जहां भारत चीन को  पछाड़ देता है. यह क्षेत्र है स्कॉच व्हिस्की का. साल 2022 में भारत में 350 मिलियन डॉलर्स की कीमत की स्कॉच व्हिस्की इम्पोर्ट की गयी थी जबकि चीन में इम्पोर्ट की गयी स्कॉच व्हिस्की की कीमत 290 मिलियन डॉलर्स के आस पास थी. ऊपर बताये गए आंकड़ों से साफ हो जाता है कि प्रति व्यक्ति आय के मामले में चीन, भारत से सिर्फ 2.6 गुना ही आगे है लेकिन एक बराबर जनसंख्या के बावजूद चीन लग्जरी वस्तुओं के उपभोग में हर क्षेत्र में भारत को पीछे छोड़ देता है. आपकी जानकारी के लिए बता दें कि ये हालत तब है जब इस तुलना में अभी हांग-कांग को शामिल नहीं किया गया है. 

क्या है पिछड़ने की वजह? 
GDP और GNI बेशक किसी देश और उसके नागरिक की एवरेज सम्पन्नता बताने के लिए अच्छे मानक हैं लेकिन अन्य कुछ क्षेत्र भी हैं जिनसे सेल्स खासकर लग्जरी क्षेत्र की सेल्स निर्धारित होती हैं. डेमोग्राफी, साइकोग्राफी, पॉलिसी, संस्कृति जैसे बहुत से क्षेत्र हैं जिनकी बदौलत किसी देश की सेल्स पर प्रभाव पड़ता है. हालांकि इन सभी को एक ही आर्टिकल में कवर कर पाना बहुत मुश्किल है लेकिन मैं ज्यादा से ज्यादा को कवर करने की कोशिश करूंगा. इससे लग्जरी ब्रैंड्स के बेचैन मालिकों को जल्दबाजी में लिए गए फैसलों से निजात मिलेगी. 

शहरीकरण और आबादी
लग्जरी शहरीकरण का एक हिस्सा होती है. भारत की कुल आबादी का लगभग 35% हिस्सा (490 मिलियन लोग) ही शहरों में रहता है जबकि चीन का 63% हिस्सा (882 मिलियन लोग) शहरों में रहते हैं. भारत के पास 3 लाख से ज्यादा आबादी वाले लगभग 180 शहरी समूह ही हैं जबकि चीन के पास ऐसे 423 समूह हैं. अगर दिल्ली को छोड़कर दोनों देशों के टॉप 12 शहरों की बात करें तो मुंबई से लेकर मदुरै तक सभी शहरों में Beijing से लेकर Dongguan की तुलना में बहुत ही कम आबादी रहती है. केवल दिल्ली ही एक ऐसा शहर है जिसमें चीन की राजधानी शंघाई से ज्यादा जनसंख्या निवास करती है. लग्जरी में उम्र का भी बहुत बड़ा हाथ होता है. एक बार अगर उनकी सभी जरूरतों को पूरा कर दिया जाए तो वृद्ध लोग लग्जरी की तरफ ज्यादा बढ़ते हैं. 38 साल की उम्र के भारतीय नागरिक की मीडियन उम्र 38 साल के एक चाइनीज नागरिक के मुकाबले 10 साल कम है. 

रिटेल स्टोर्स की कीमतें
किसी भी लग्जरी ब्रैंड की रणनीति में रिटेल का अनुभव बहुत जरूरी होता है और यहीं रेंटल की कीमतों की भूमिका शुरू होती है. एक छोटी इकॉनमी होने के बावजूद भी भारत में रिटेल का किराया बहुत ज्यादा है. अगर आपको प्रीमियम जगहों पर स्टोर खोलना हो तो हर महीने प्रतिस्क्वायर आपको औसतन लगभग 7 से 10 डॉलर्स का खर्च करना होगा और इसमें अतिरिक्त मूल्य भी शामिल है और चीन में औसतन इतने ही पैसों में आप एक मॉल को किराए पर ले सकते हैं. इतना  ही नहीं चीन में रिटेल जगहों की भरमार है और प्रमुख ब्रैंड्स का ध्यान खींचने के लिए अलग-अलग प्रदेश सब्सिडी भी देते हैं. कुछ मामलों में दिल्ली के Connaught Place में एक रिटेल स्टोर की कीमत चीन के Wangfujing से कहीं ज्यादा हो सकती है. 

इस वजह से भारत में हैं कम स्टोर्स
लग्जरी ब्रैंड्स को अपने रिटेल ऑपरेशंस पर पूरा नियंत्रण चाहिए होता है फिर चाहे वह सीधे तौर पर हो या फिर अपनी किसी सब्सिडियरी के माध्यम से. भारत में किसी भी एक ब्रैंड के रिटेल पर 100% का नियंत्रण तब तक प्रतिबंधित है जब तक ब्रैंड अपने स्त्रोतों के इनपुट का 30% हिस्सा लोकल मार्केट से नहीं लेता. आपकी जानकारी के लिए बता दें कि भारत में Apple ने भी अपना स्टोर तभी खोला जब कंपनी की लोकल मैन्युफैक्चरिंग में वृद्धि हुई थी. हालांकि एक अलग ऑप्शन के तौर पर ब्रैंड्स अपने रिटेल में 51% तक का नियंत्रण प्राप्त कर सकते हैं. जिसका मतलब ये है कि एक ब्रैंड को लोकल पार्टनर्स का सहारा लेना पड़ेगा जिनके पास पैसा तो होता है लेकिन वो ब्रैंड के जैसा ही विजन और जज्बा रखते हों यह जरूरी नहीं है. लेकिन चीन में ऐसी कोई भी मुश्किल नहीं है. इसके साथ ही लोकल सौर्सिंग और पूरी तरह से अपने नियंत्रण वाले रिटेल की बदौलत स्टॉक पर कम दबाव होता है जिससे स्टॉक के बदलने के मौके कम हो जाते हैं. 

लग्जरी वस्तुओं पर ज्यादा टैक्स
इसके बाद लिस्ट में फंडिंग कॉस्ट, ड्यूटी चार्जेज, शिपिंग का खर्चा, टैक्स, एक्सचेंज रेट जैसे कारक भी शामिल हैं जिनकी बदौलत किसी भी ब्रैंड के लिए चीन के मुकाबले भारतीय मार्केट में ऑपरेट करना काफी मुश्किल हो जाता है. भारत में बैंक द्वारा दिए जाने वाले लोन्स पर 11% से ज्यादा का इंटरेस्ट वसूला जाता है जो चीन के मुकाबले लगभग दोगुना है. अगर लोकल सोर्स के बिना चीन में लग्जरी वस्तुओं को पहुंचाना हो तो उसके लिए एक यूनिट फ्रेट की कीमत भारत के मुकाबले काफी कम है. चीनी RMB एक ज्यादा मजबूत करेंसी है जिसकी बदौलत इम्पोर्ट्स सस्ते हो जाते हैं और भारत में लग्जरी वस्तुओं पर लगने वाले GST और कस्टम ड्यूटी शुल्क चीन के मुकाबले कहीं ज्यादा हैं. भारत में लग्जरी वस्तुओं पर सबसे ज्यादा, लगभग 28% की दर से टैक्स लगाया जाता है जबकि चीन में स्टैण्डर्ड VAT रेट इसकी तुलना में मात्र 13% ही है. 

साइकोग्राफी का असर
ऑपरेशंस के हिसाब से किसी भी ब्रैंड के लिए चीन के मुकाबले भारत में काम करना ज्यादा मुश्किल है और इसकी वजह सिर्फ GDP या GNI नहीं है. साइकोग्राफी के हिसाब से भी देखें तो अमीर भारतीय लोग आज भी कीमत को लेकर कॉन्शियस हैं और इनके द्वारा लग्जरी ब्रैंड्स का इस्तेमाल न करना लग्जरी ब्रैंड्स के लिए मुश्किलों को और ज्यादा बढ़ा देता है. साथ ही चीन, भारत की तुलना में पश्चिम सभ्यता की तरफ ज्यादा झुका हुआ है और वह पश्चिमी लाइफस्टाइल की भी ज्यादा नकल करता है.
 

यह भी पढ़ें: WIPRO में आखिर कम सैलरी में क्‍यों ज्‍वॉइन कर रहे हैं कर्मचारी

 


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