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BW Auto: एक्सपर्ट्स ने बताया EV स्पेस को बेहतर बनाने के लिए क्या है जरूरी

BW Auto इवेंट में शामिल हस्तियों ने बताया कि EV स्पेस को बेहतर बनाने के लिए क्या कदम उठाए जाने चाहिए.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 2 years ago

BW Businessworld द्वारा दिल्ली में BW Auto NEW GEN OF TRAILBLAZERS इवेंट आयोजित किया जा रहा है. इवेंट में ऑटो इंडस्ट्री की दिग्गज हस्तियां शिरकत कर रही हैं और इंडस्ट्री की बेहतरी से जुड़े अपने सुझाव व्यक्त कर रही हैं. इस मौके पर Driving Green: Is the Indian Auto Industry Ready for Green Fuel Revolution? नामक विषय पर पैनल डिस्कशन भी हुआ, जिसमें Greaves Electric Mobility के 3 व्हीलर बिजनेस के सीईओ Nirmal NR, ElectroRide के को-फाउंडर Tanuj Jain, Kelwon Electronics & Appliances (DAEWOO INDIA) के एमडी H.S. Bhatia, IIT Kanpur के प्रोफ़ेसर ऑफ प्रैक्टिस, Epsilon Advanced Materials के निदेशक एवं Niti Aayog के पूर्व प्रिंसिपल एडवाइजर एवं डायरेक्टर जनरल Anil Srivastava और HOP Electric Mobility के को-फाउंडर एवं चीफ ऑपरेशन ऑफिसर Nikhil Bhatia ने हिस्सा लिया. जबकि BW Auto World के एडिटोरियल लीड Utkarsh Agarwal बतौर सेशन चेयर उपस्थित रहे.

अब बदल रही है स्थिति
पैनल डिस्कशन की शुरुआत उत्कर्ष अग्रवाल के इस सवाल के साथ हुई कि क्या भारत सस्टेनेबल फ्यूचर के लिए तैयार है, क्या हमारे इसके लिए पर्याप्त नीति, पर्याप्त इन्फ्रास्ट्रक्चर है? भारत की ऑटो इंडस्ट्री नई टेक्नोलॉजी, जैसे कि इलेक्ट्रिक और नए हाइड्रोजन व्हीकल, को अपनाने के लिए कितनी तैयार है? इसके जवाब में Nirmal NR ने कहा कि हमारी ऑटो इंडस्ट्री काफी पुरानी है. कुछ कंपनियां लंबे समय से इसे डोमिनेट कर रही हैं. इलेक्ट्रिक और नई पावर ट्रेन टेक्नोलॉजी के साथ इंडस्ट्री का लोकतांत्रिकरण हो रहा है. लिहाजा, स्टार्टअप और नई कंपनियों के लिए अब अवसर है, वर्तमान स्थिति को बदलने का. उन्होंने आगे कहा - मेरा मानना है कि कुछ पुरानी कंपनियां समय के साथ आगे नहीं बढ़ पाईं. अब कई नई कंपनियां न्यू टेक्नोलॉजी और क्षमते के साथ आ रही हैं, जिससे मौजूदा स्थिति बदलेगी.

बेहद सीमित हैं विकल्प
वहीं, Tanuj Jain ने कहा कि वर्तमान में ऑटो इंडस्ट्री, खासतौर पर EV स्पेस में, कई चुनौतियों का सामना कर रही है. जैसे कि चार्जिंग इन्फ्रास्ट्रक्चर. इसमें चार्जिंग और डीटेचेबल दोनों बैटरी शामिल हैं. हम चाहते हैं कि सरकार मानक ईको-सिस्टम के संबंध में बेहतर दिशानिर्देश प्रदान करे. उदाहरण के लिए, ICEs इंजन वाली कार में फ्यूल भरना हो, तो आपके पास BPCL, IOC, HPCL जैसे कई विकल्प हैं. इस इंजन की कारों में एक ही तरह का फ्यूल भरा जा सकता है, लेकिन EV स्पेस में ऐसा नहीं है. यदि बैटरी स्वैपिंग स्टेशन की बात करें, तो सन मोबेलिटी अपना अलग ईको-सिस्टम बना रही है, स्मार्ट बैटरी का अपना एक अलग ईको-सिस्टम है. सन मोबेलिटी की बैटरी केवल उसी में फिट होगी. जबकि जरूरत एक कॉमन प्लेटफार्म की है.

पुराने नामों पर ही निर्भरता
H.S. Bhatia ने कहा कि कैपिटल लागत और विनिर्माण के दृष्टिकोण से EV टूव्हीलर बनाना पैसेंजर व्हीकल बनाने की तुलना में काफी सस्ता है. यही वजह है कि EV पैसेंजर या कमर्शियल व्हीकल बनाने के लिए कोई नई कंपनी नहीं आई है. लिहाजा, पैसेंजर कार और कमर्शियल व्हीकल में EV एडॉप्शन के संदर्भ में हम पुराने नामों पर ही निर्भर रहेंगे, चाहे वह घरेलू निर्माता हों या टेस्ला या BYD जैसे विदेशी निर्माता. वहीं, Nikhil Bhatia ने कहा कि EV पर खरीदने के लिए कोई तभी कनवेंस हो सकता है, जब वो कुछ दिन इसका अनुभव ले. जहां तक EV टू-व्हीलर्स की बात है, तो उन्होंने अपनी जगह बना ली है. सब्सिडी, मूल्य निर्धारण आदि अलग मुद्दे हैं. आज आपको 70 हजार में EV स्कूटर मिल जाएगा, जो 60-65 किमी की रेंज देता है. इसी तरह, डेढ़ लाख में 150 किमी की रेंज देने वाला स्कूटर भी उपलब्ध है. मैं यही सलाह दूंगा कि सभी को कुछ दिनों तक EV आजमाना चाहिए, तभी वो समझ पाएंगे कि इसे अपनाना है या नहीं.

तेजी से कदम उठाने की जरूरत
Anil Srivastava ने कहा कि शुरुआत में सरकार ने इस दिशा में तेजी से कदम उठाए थे, लेकिन अभी भी काफी कुछ किया जाना बाकी है. EV एडॉप्शन को तेजी से अमल में लाने के लिए सरकारी प्रयासों की गति बढ़ाना जरूरी हो गया है. सरकार को कंज्यूमर को TCO यानी, टोटल कॉस्ट ऑफ ओनरशिप कांसेप्ट बताना चाहिए. अब गेंद विभिन्न मंत्रालयों, विभिन्न राज्यों और विभिन्न स्टेकहोल्डर्स के पाले में, लिहाजा चीजों को तेजी से बढ़ाना होगा. उन्होंने यह भी कहा कि निश्चित तौर पर सरकार ने EV को लेकर कई पहल की हैं, कई नीतियां स्थापित हैं, लेकिन बहुत कुछ किया जाना शेष है, हमें क्विक चार्जिंग, स्टैण्डर्ड चार्जिंग गन आदि पर ध्यान देना होगा.

रिटेल फाइनेंस भी है चुनौती
EV के संबंध में आने वाली परेशानियों का जिक्र करते हुए Tanuj Jain ने कहा कि EV स्पेस में सबसे बड़ी चुनौती है रिटेल फाइनेंस. ICEs स्पेस में ग्राहक शोरूम में जाता है, कुछ ही मिनट्स में फाइनेंस का काम पूरा हो जाता है और आधे घंटे में पेमेंट भी डीलर को कर दिया जाता है. लेकिन EV स्पेस में केवल कुछ ही फाइनेंसर हैं. मेरा मानना है कि रिटेल फाइनेंस की पूरी प्रक्रिया में बड़ी भूमिका है, लिहाजा इस पर फोकस होना चाहिए. EV की कीमत से जुड़े सवाल पर Nikhil Bhatia ने कहा कि घरेलू बिक्री के आंकड़े अभी बढ़ने की जरूरत है. निश्चित तौर पर सरकार ने कई कदम उठाए हैं. EV पर सब्सिडी मिल रही है, लेकिन मेरा मानना है कि चीजों में जल्दी-जल्दी बदलाव से बचना चाहिए. रिटेल फाइनेंस भी समस्या है, हमने तीन सालों तक इस परेशानी का सामना किया और फिर अपना NBFC बनाया. हम EV को प्रायोरिटी सेक्टर लैंडिंग स्टेटस देने की मांग कर रहे हैं, ताकि बैंक और NBFC EV वाहनों के फाइनेंस में भी ज्यादा दिलचस्पी दिखाएं. जहां तक बात बैटरी की लागत की है, तो यह पहले से ही कम हो गई है और आने वाले कुछ सालों में और नरमी आ सकती है.

इस पर फोकस की है जरूरत
H.S. Bhatia ने कहा कि EV में हम दो भागों की बात करते हैं, पहला इंजन औ दूसरा अन्य कॉम्पोनेन्ट. जैसे सभी मोबाइल फोन के लिए एक ही चार्जर की अवधारण अमल में आई है, हम इसी तरह के स्टैंडरलाइजेशन की बात कर रहे हों. जिसका मतलब है कि यदि आप नया फोन खरीद रहे हैं, तो आपको अलग से चार्जर खरीदने की जरूरत नहीं है. इससे एक तो आपके पैसे बचेंगे और ई-वेस्ट भी कम उत्पन्न होगा. यदि EV में ऐसा होता है, तो आपकी बैटरी कोई भी हो ईको-सिस्टम एक ही रहेगा. इससे बैटरी स्वैपिंग आसान हो जाएगी और कॉस्ट भी घटेगी. दूसरे कॉम्पोनेन्ट के लिए सरकार ने कई पहल की हैं, इसके कई निर्माता हैं, घरेलू स्तर पर भी इन्हें निर्मित किया जा रहा है. इससे भी वाहन की कीमत कम होगी. इससे EV एडॉप्शन रेश्यो भी बढ़ेगा और हम  2030 तक 50% EV वाहनों का लक्ष्य भी हासिल कर पाएंगे.
 


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