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क्या हमारे विश्वविद्यालय सिर्फ प्रमाण-पत्र देने वाली मशीन बन रहे हैं?
लेखक के अनुसार कई एडटेक कंपनियाँ जैसे UpGrad, Coursera, Simplilearn, Unacademy और Vedantu पारंपरिक विश्वविद्यालय मॉडल को चुनौती दे रही हैं.
बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 1 month ago
आज विश्वविद्यालयों पर पहले से कहीं अधिक दबाव है. क्या उनकी प्रासंगिकता खतरे में है? क्या हमारी विश्वविद्यालयें वही बन जाएँगी, जो बाजार पहले से मान रहा है-एक पैकेजिंग और प्रमाणन उद्योग, जहाँ ब्रांडेड डिग्रियाँ ही मुख्य उत्पाद हों? ऐसी स्थिति में विश्वविद्यालयों को क्या करना चाहिए, क्या उन्हें लगातार पाठ्यक्रम और शिक्षण विधियों में नवाचार करते रहना चाहिए या बुनियादी कामकाज पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए?
एडटेक कंपनियों का चुनौतीपूर्ण प्रभाव
कई एडटेक कंपनियाँ जैसे UpGrad, Coursera, Simplilearn, Unacademy और Vedantu पारंपरिक विश्वविद्यालय मॉडल को चुनौती दे रही हैं. ये प्लेटफॉर्म उच्च गुणवत्ता वाली सामग्री के साथ-साथ प्रत्यक्ष, लाइव शिक्षण और मेंटरशिप भी प्रदान करते हैं, जिससे शिक्षा प्रदाता और शैक्षणिक संस्था की सीमाएं धुंधली हो गई हैं. ये कंपनियाँ अक्सर प्रमाणित कार्यक्रम और पूर्ण ऑनलाइन डिग्री भी पेश करती हैं, जो उन्हें आभासी विश्वविद्यालय की तरह कार्य करने में सक्षम बनाती हैं.
कुछ कंपनियाँ पेशेवर कौशल संवर्धन प्लेटफॉर्म के रूप में कार्य करती हैं, जहां AI, क्लाउड कंप्यूटिंग, साइबर सुरक्षा जैसी क्षेत्रों में बूटकैंप और स्नातकोत्तर कार्यक्रम उपलब्ध हैं. इन कंपनियों का सहयोग IBM, Google और Microsoft जैसी बड़ी कंपनियों के साथ भी है, ताकि उद्योग विशेषज्ञों द्वारा लाइव कक्षाओं के माध्यम से नौकरी-केंद्रित प्रशिक्षण प्रदान किया जा सके. AlmaBetter जैसी कंपनियाँ परिणाम आधारित कार्यक्रम और उद्योग-संगत पाठ्यक्रम के साथ ‘नो जॉब, नो फी’ हाइब्रिड मूल्य मॉडल भी पेश करती हैं.
क्या ये सभी गतिविधियाँ परंपरागत उच्च शिक्षा से जुड़ी मुख्य कार्यवाहियों की चुनौती नहीं हैं? क्या ये एडटेक कंपनियाँ विश्वविद्यालयों के परंपरागत खिलाड़ियों को उनके ही क्षेत्र में चुनौती नहीं दे रही हैं?
विश्वविद्यालयों के आउटसोर्सिंग की चुनौतियाँ
पुरानी कहावत है, “अगर आप उनका सामना नहीं कर सकते, तो उनसे जुड़ जाओ.” क्या अब समय आ गया है कि विश्वविद्यालय अपनी हर गतिविधि, यहां तक कि अकादमिक कार्य भी आउटसोर्स कर दें और केवल डिग्री प्रदान करना ही मूल कार्य बन जाए? कुछ ऑस्ट्रेलियाई विश्वविद्यालय पूरी पाठ्यक्रम डिलीवरी, प्रशासन और सामग्री प्रबंधन को थर्ड-पार्टी कंपनियों को सौंप चुके हैं.
परंपरागत सोच रखने वाले लोग तर्क देंगे कि विश्वविद्यालय सिर्फ डिग्री देने वाली मशीन नहीं है, बल्कि युवा छात्रों को शिक्षित करने और उनकी मानसिक क्षमताओं को विकसित करने का पवित्र स्थान है. फिर भी, क्या यह सच नहीं कि आज विश्वविद्यालय सिर्फ एक ब्रांड बन गए हैं जो किसी की दक्षता को प्रमाणित करता है?
गैर-अकादमिक कार्यों का आउटसोर्सिंग
आज कई गैर-अकादमिक कार्य जैसे हाउसकीपिंग, कैटरिंग, सुरक्षा और छात्र डेटा प्रबंधन पहले ही आउटसोर्स किए जा चुके हैं. तर्क दिया जा सकता है कि इससे विश्वविद्यालय को शिक्षा और अनुसंधान पर ध्यान केंद्रित करने का अवसर मिलता है. लेकिन अगर बाहरी विशेषज्ञ कैफेटेरिया और क्लाउड सर्वर संभाल सकते हैं, तो क्या वे सामग्री निर्माण, शिक्षण डिलीवरी या छात्र मार्गदर्शन भी संभाल नहीं सकते?
कुछ पुस्तकालयधारक मेटाडेटा आउटसोर्स करते हैं, कुछ विभाग लाइसेंस के तहत ऑटोमेटेड ग्रेडिंग सिस्टम का उपयोग करते हैं, और कुछ ऑनलाइन कार्यक्रम मुख्य रूप से बाहरी विक्रेताओं से खरीदी गई सामग्री द्वारा संचालित होते हैं. क्या यह आउटसोर्सिंग का विस्तार नहीं है?
विश्वविद्यालय की आर्थिक मूल्यांकन और शिक्षा का स्वरूप
यदि विश्वविद्यालय की मूल्यांकन क्षमता रोजगार योग्यतामापन, रैंकिंग और आर्थिक आउटपुट से की जाती है, तो क्या उनका अकादमिक कार्य आर्थिक रूप से विनिमेय नहीं बन जाता? बड़ी ऑनलाइन कंपनियाँ या कॉर्पोरेट समूह ‘पाठ्यक्रम स्टैक’ तैयार कर सकते हैं, जिसे छात्र खरीदते हैं और विश्वविद्यालय केवल प्रमाण-पत्र प्रदान करता है. क्या हम ऐसा दृश्य पहले ही नहीं देख रहे, जहां पेशेवर प्रबंधन कंपनियाँ ऑनलाइन कार्यक्रम तैयार करती हैं और अकादमिक केवल नोट्स प्रदान करते हैं?
इस परिदृश्य में क्या विश्वविद्यालय बौद्धिक भार को आउटसोर्स करते हुए केवल मानक का नकली आवरण नहीं बेच रहे हैं? क्या हम कई निजी विश्वविद्यालयों और संस्थानों की proliferation नहीं देख रहे, जो केवल सीट भरने और बजट संतुलन पर ध्यान देते हैं, शिक्षा की गुणवत्ता पर नहीं?
अनुसंधान और आउटसोर्सिंग
अनुसंधान विश्वविद्यालय का सबसे महत्वपूर्ण कार्य है. क्या इसे भी आउटसोर्स करना सही होगा? आज अनुसंधान आउटपुट कॉर्पोरेट फंडिंग, निजी उद्देश्यों और प्रभाव मीट्रिक पर आधारित हो रहा है. अनुसंधान लेखन, डेटा विश्लेषण और प्रकाशन उत्पादन का आउटसोर्सिंग कई विश्वविद्यालयों में पहले ही शुरू हो चुका है.
यदि अकादमिक केवल प्रमाण-पत्र देने वाली संस्था के रूप में जीवित रहते हैं, तो क्या हमें उन्हें विश्वविद्यालय कहना चाहिए? क्या हम उन्हें ‘डिग्री अलॉटिंग अथॉरिटी’ कह सकते हैं?
निष्कर्ष: विश्वविद्यालयों की पहचान बचाना
आउटसोर्सिंग की प्रक्रिया पहले ही कई हिस्सों में शुरू हो चुकी है. असली प्रश्न यह है कि क्या अकादमिक इस नियंत्रण को छोड़ देंगे या यह सुनिश्चित करेंगे कि ज्ञान का सृजन और प्रसारण विश्वविद्यालय के मूल स्वरूप को न खोए?
अगर हम आंतरिक अकादमिक कार्य की अनिवार्यता को स्पष्ट रूप से नहीं बता पाए, तो हमारी विश्वविद्यालयें सचमुच सर्टिफिकेट देने वाली मशीनें बन जाएँगी. इस स्थिति में विश्वविद्यालय केवल नाम के लिए मौजूद रहेंगे, जबकि शिक्षा की आत्मा खो चुकी होगी.
अस्वीकरण: इस लेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के हैं और जरूरी नहीं कि वे प्रकाशन के विचारों को दर्शाते हों.
अतिथि लेखक- डॉ एस एस मंथा व अशोक ठाकुर
(डॉ. एस एस मंथा, एआईसीटीई के पूर्व अध्यक्ष और आरबी विश्वविद्यालय, नागपुर के कुलपति हैं.)
(अशोक ठाकुर, भारत सरकार, मानव संसाधन विकास मंत्रालय के पूर्व शिक्षा सचिव हैं.)
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