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फर्जी बीमा पॉलिसी मामले में सुप्रीम कोर्ट सख्त, NIC के CMD समेत कर्मचारियों को आरोपी बनाने का आदेश

यह फैसला बीमा क्षेत्र में जवाबदेही तय करने और फर्जीवाड़े पर रोक लगाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 5 months ago

सुप्रीम कोर्ट ने फर्जी बीमा पॉलिसी से जुड़े एक गंभीर मामले में कड़ा रुख अपनाते हुए नेशनल इंश्योरेंस कंपनी (NIC) के चेयरमैन एवं मैनेजिंग डायरेक्टर (CMD) को आपराधिक मामले में आरोपी बनाए जाने का आदेश दिया है. इसके साथ ही कोर्ट ने पूरे मामले की जांच के लिए स्पेशल इन्वेस्टिगेशन टीम (SIT) गठित करने का आदेश भी दिया.

यह मामला मोटर दुर्घटना से जुड़े एक क्लेम में कथित रूप से फर्जी बीमा पॉलिसी के इस्तेमाल से संबंधित है. जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह और जस्टिस आर. महादेवन की बेंच ने यह आदेश देते हुए बीमा कंपनी की कार्यप्रणाली पर कड़ी नाराजगी जताई.

कंपनी की लापरवाही पर सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जब कंपनी खुद यह दावा कर रही थी कि बीमा पॉलिसी फर्जी है, तब भी उसने कोई आपराधिक शिकायत दर्ज नहीं कराई, जो गंभीर लापरवाही को दर्शाता है. कोर्ट ने इसे “जिम्मेदारी की घोर कमी” बताया.

कोर्ट ने टिप्पणी की कि अब समय आ गया है कि बीमा कंपनियां अपनी जिम्मेदारियों को गंभीरता से निभाएं, क्योंकि वे जो भुगतान करती हैं, वह आम जनता के पैसे से होता है.

SIT को सौंपी गई जांच

सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले को “राष्ट्रीय महत्व का टेस्ट केस” बताते हुए SIT को निर्देश दिया कि वह नया केस दर्ज करे, जिसमें NIC के CMD से लेकर स्थानीय शाखा प्रबंधक तक सभी संबंधित कर्मचारियों को आरोपी बनाया जाए. साथ ही बस के मालिक को भी आरोपी के रूप में शामिल करने को कहा गया है.

कोर्ट ने SIT को निर्देश दिया कि जांच तेजी और गंभीरता से की जाए तथा फर्जी बीमा दस्तावेज तैयार करने की साजिश की गहराई से पड़ताल की जाए.

DGP ने कोर्ट में मांगी माफी

इस मामले में पहले तमिलनाडु के पुलिस महानिदेशक (DGP) को भी कोर्ट में पेश होने का आदेश दिया गया था. उनके हलफनामे में कहा गया था कि मोटर दुर्घटना मामलों में पुलिस बीमा दस्तावेजों की सत्यता की जांच नहीं करती.

इस पर कोर्ट ने कड़ी आपत्ति जताई. शुक्रवार को DGP ने कोर्ट में पेश होकर बिना शर्त माफी मांगी, जिसे बेंच ने स्वीकार कर लिया. उन्होंने बताया कि अब E-DAR और वाहन पोर्टल के जरिए बीमा विवरण का तुरंत और स्वचालित सत्यापन संभव हो गया है.

पीड़ित को जल्द मुआवजा देने के निर्देश

सुप्रीम कोर्ट ने यह भी सुनिश्चित किया कि दुर्घटना पीड़ित को मुआवजा मिलने में और देरी न हो. कोर्ट ने बीमा कंपनी को चार सप्ताह के भीतर सीधे पीड़ित को मुआवजा देने का आदेश दिया. हालांकि, कंपनी को यह राशि बाद में वाहन के नियंत्रण में रहे व्यक्ति (लीजधारक) से वसूलने की अनुमति दी गई है.

मामला कैसे शुरू हुआ

यह मामला के. सरवनन नामक एक सड़क दुर्घटना पीड़ित से जुड़ा है, जो बस हादसे में घायल हो गए थे. लंबा इलाज और सर्जरी के बाद उन्हें नौकरी छोड़नी पड़ी. उन्होंने मोटर दुर्घटना दावा अधिकरण (MACT) में मुआवजे के लिए याचिका दायर की थी.

बीमा कंपनी ने दावा पूरी तरह खारिज करते हुए पॉलिसी को अमान्य बताया, लेकिन MACT और बाद में मद्रास हाईकोर्ट ने कंपनी की दलीलें खारिज कर दीं और मुआवजा देने का आदेश दिया. इसके बाद मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा.

 


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