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कंपनी के दावे से मेल नहीं खाया गाड़ी का माइलेज, अब करनी होगी जेब ढीली

राष्ट्रीय उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग ने शिकायतकर्ता के पक्ष में फैसला सुनाया है.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 2 years ago

कंपनियां अक्सर अपनी गाड़ियों के माइलेज (Mileage) को लेकर बड़े-बड़े दावे करती हैं. लेकिन इन दावों के सच न होने पर क्या कंपनी को दोषी ठहराया जा सकता है? इस सवाल का जवाब राष्ट्रीय उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग (NCDRC) के एक फैसले से मिल गया है. मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, NCDRC ने एक महत्वपूर्ण फैसले में माना है कि यदि निर्माता कंपनी द्वारा किए गए वादे के मुताबिक वाहन माइलेज नहीं दे रहा है, तो यह निर्माण संबंधी कमी है. इसके साथ ही उपभोक्ता अदालत ने वाहन निर्माता कंपनी की अपील को खारिज कर दिया.

पहले का आदेश बरकरार
वाहन निर्माता कंपनी व अन्य ने राज्य उपभोक्ता आयोग और जिला उपभोक्ता आयोग के फैसले को NCDRC में चुनौती दी थी. आयोग के सदस्य डॉक्टर इंदरजीत सिंह ने पूर्व के फैसले में दखल देने से इंकार करते हुए कहा कि इसमें किसी तरह की कोई खामी नहीं है, लिहाजा इसे बहाल रखा जाता है. आयोग ने वाहन बनाने वाली कंपनी की उन दलीलों को ठुकरा दिया, जिसमें कहा गया था कि शिकायकर्ता ऑटो चालक ने करीब साढ़े चार साल गाड़ी चलाने के बाद उपभोक्ता फोरम में माइलेज सहित कई खामियों के बारे में ‌शिकायत की थी. 

काम नहीं आई दलील
कंपनी ने अपने बचाव में यह दलील भी दी कि शिकायतकर्ता ने ऑटो का रखरखाव सही से नहीं किया और नि:शुल्क सर्विस भी नहीं कराई. कंपनी ने राज्य उपभोक्ता आयोग व जिला उपभोक्ता फोरम द्वारा पारित आदेशों को रद्द करने की मांग के साथ NCDRC का दरवाजा खटखटाया था. सभी तथ्यों पर विचार करने के बाद शीर्ष उपभोक्ता आयोग ने शिकायतकर्ता के पक्ष में फैसला सुनाया. साथ ही राज्य उपभोक्ता आयोग के उस तर्क पर सहमति जताई, जिसमें कहा गया कि कंपनी के वादे के मुताबिक माइलेज नहीं देना, गाड़ी के विनिर्माण में कमी है. 

अब देना होगा हर्जाना
केरल निवासी रविंद्रन ने सितंबर 2006 में फोर्स मोटर लिमिटेड से लाख 68 हजार रुपए में एक ऑटो खरीदा था. 2011 में उन्होंने जिला उपभोक्ता फोरम में शिकायत दाखिल कर आरोप लगाया कि ऑटो कंपनी द्वारा किए गए वादे के मुताबिक माइलेज नहीं दे रहा है. शिकायतकर्ता ने कहा कि कंपनी ने 2006 मॉडल ऑटोरिक्शा का 35 किलोमीटर प्रति लीटर का माइलेज देने का वादा किया था, जबकि माइलेज इससे काफी कम है. रविंद्रन‌ ने यह भी कहा कि कंपनी का अधिकृत डीलर कई प्रयास के बाद भी खामी को दूर नहीं कर पाया. विनिर्माण में कमी होने के चलते उन्हें वित्तीय हानि और मानसिक परेशानी का सामना करना पड़ा. इस मामले में जिला उपभोक्ता फोरम ने ऑटो चालक के पक्ष में फैसला देते हुए कंपनी से 84 हजार रुपए हर्जाना और 3000 रुपए मुकदमा खर्च देने को कहा था. राज्य उपभोक्ता आयोग ने भी यह फैसला बरकरार रखा और अब कंपनी को NCDRC से भी झटका लगा है.


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