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सेबी का ‘डीमैट 2.0’ पायलट प्रोजेक्ट शुरू, डिजिटल टोकन में बदलेंगे कॉरपोरेट बॉन्ड
सेबी ने स्पष्ट किया है कि टोकनाइजेशन से बॉन्ड की कानूनी प्रकृति में कोई बदलाव नहीं होगा. कंपनी की भुगतान संबंधी जिम्मेदारी और निवेशकों के अधिकार पहले की तरह ही रहेंगे.
बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 3 hours ago
भारतीय प्रतिभूति और विनियम बोर्ड (SEBI) ने कॉरपोरेट बॉन्ड के लिए ‘डीमैट 2.0’ का पायलट प्रोजेक्ट शुरू किया है. इसके तहत बॉन्ड को डिस्ट्रिब्यूटेड लेजर टेक्नोलॉजी (डDLT) के जरिए डिजिटल टोकन के रूप में रखा और ट्रांसफर किया जा सकेगा. यह व्यवस्था भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) की होलसेल सेंट्रल बैंक डिजिटल करेंसी यानी डिजिटल रुपये से जुड़ी होगी, जिससे बॉन्ड और भुगतान का एक साथ और तुरंत निपटान संभव होगा.
तीन कंपनियों ने जारी किए 1,025 करोड़ रुपये के टोकनाइज्ड बॉन्ड
सेबी के अनुसार, पायलट प्रोजेक्ट के तहत अब तक तीन कंपनियां कुल 1,025 करोड़ रुपये के टोकनाइज्ड कॉरपोरेट बॉन्ड जारी कर चुकी हैं. आरईसी ने 7 सितंबर को 18 निवेशकों से 500 करोड़ रुपये जुटाए. इसके बाद 9 सितंबर को एलऐंडटी ने चार निवेशकों से 500 करोड़ रुपये जुटाए, जबकि आईआईएफएल ने 25 करोड़ रुपये के बॉन्ड जारी किए. यह पहल ग्लोबल फिनटेक फेस्ट में आरबीआई गवर्नर संजय मल्होत्रा और सेबी चेयरमैन तुहिन कांत पांडेय ने शुरू की.
क्या है डीमैट 2.0?
डीमैट 2.0 के तहत कॉरपोरेट बॉन्ड को डिस्ट्रिब्यूटेड लेजर पर डिजिटल टोकन के रूप में दर्ज किया जाएगा. यह एक साझा इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड होता है, जिसे डिस्ट्रिब्यूटेड लेजर टेक्नोलॉजी के जरिए मार्केट इन्फ्रास्ट्रक्चर संस्थानों द्वारा बनाए रखा जाता है. इस लेजर का स्वामित्व डिपॉजिटरी के पास रहेगा.
सेबी ने स्पष्ट किया है कि टोकनाइजेशन से बॉन्ड की कानूनी प्रकृति में कोई बदलाव नहीं होगा. कंपनी की भुगतान संबंधी जिम्मेदारी और निवेशकों के अधिकार पहले की तरह ही रहेंगे. क्रेडिट रेटिंग, डिबेंचर ट्रस्टी, लिस्टिंग और डिस्क्लोजर से जुड़ी मौजूदा आवश्यकताएं भी लागू रहेंगी.
डिजिटल रुपये से होगा तुरंत निपटान
इस व्यवस्था की एक अहम खासियत बॉन्ड और भुगतान का एक साथ निपटान है. सेबी का डीमैट 2.0 सिस्टम यूनिफाइड मार्केट इंटरफेस (यूएमआई) के जरिए आरबीआई की होलसेल सेंट्रल बैंक डिजिटल करेंसी (सीबीडीसी) यानी डिजिटल रुपये से जुड़ा है.
इससे ‘एटॉमिक सेटलमेंट’ की सुविधा मिलेगी. यानी बॉन्ड का ट्रांसफर और उसके बदले भुगतान एक ही समय पर पूरा हो सकेगा. इससे लेनदेन में देरी और निपटान से जुड़े जोखिम कम करने में मदद मिल सकती है.
ब्याज और रिडेम्पशन का काम भी हो सकता है स्वचालित
सेबी के अनुसार, डीएलटी आधारित व्यवस्था से कॉरपोरेट बॉन्ड जारी करने, निपटान और उनकी सर्विसिंग की प्रक्रिया ज्यादा तेज और कुशल हो सकती है. तकनीक के इस्तेमाल से परिचालन संबंधी गलतियों को कम करने में भी मदद मिलेगी. स्मार्ट कॉन्ट्रैक्ट के जरिए ब्याज भुगतान और बॉन्ड के रिडेम्पशन जैसी प्रक्रियाओं को स्वचालित किया जा सकता है.
अगले चरण में सेकंडरी मार्केट ट्रेडिंग
सेबी चेयरमैन तुहिन कांत पांडेय ने कहा कि पायलट के लिए कॉरपोरेट बॉन्ड को इसलिए चुना गया क्योंकि इसमें मुख्य रूप से संस्थागत निवेशक होते हैं और ट्रेडिंग की आवृत्ति अपेक्षाकृत कम रहती है. उन्होंने बताया कि परियोजना का अगला चरण सेकंडरी मार्केट में बॉन्ड की ट्रेडिंग से जुड़ा होगा. यानी जिन निवेशकों के पास टोकनाइज्ड बॉन्ड होंगे, वे उन्हें दूसरे निवेशकों को ट्रांसफर कर सकेंगे. इसके लिए ट्रांसफर की एक व्यवस्था तैयार की गई है, जिसका फिलहाल परीक्षण चल रहा है.
चरणबद्ध तरीके से बढ़ेगा दायरा
डीमैट 2.0 को चरणबद्ध तरीके से लागू किया जा रहा है. शुरुआती चरण में नए जारी होने वाले कॉरपोरेट बॉन्ड को शामिल किया गया है. आगे चलकर मौजूदा रिक्वेस्ट-फॉर-कोट (आरएफक्यू) प्लेटफॉर्म के जरिए बॉन्ड की खरीद-बिक्री और खुदरा निवेशकों की पहुंच को भी इस व्यवस्था में शामिल करने की योजना है. निवेशकों के लिए सबसे अहम बात यह है कि टोकनाइज्ड बॉन्ड उनके मौजूदा डीमैट खाते में ही रखे जाएंगे. इसके लिए अलग डीमैट खाता या नया केवाईसी कराने की जरूरत नहीं होगी.
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