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Gen Z का F&O प्रेम पड़ रहा भारी, 89% युवा ट्रेडर्स को हुआ नुकसान: SEBI

डेरिवेटिव्स मार्केट में युवाओं की बढ़ती हिस्सेदारी के साथ नुकसान का आंकड़ा भी चौंकाने वाला, 30 साल से कम उम्र के ट्रेडर्स सबसे ज्यादा प्रभावित

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 2 months ago

शेयर बाजार में निवेश को लेकर युवाओं की दिलचस्पी तेजी से बढ़ रही है, लेकिन फ्यूचर्स एंड ऑप्शंस यानी F&O ट्रेडिंग में बढ़ती भागीदारी उनके लिए महंगी साबित हो रही है. सोशल मीडिया पर जल्दी पैसा कमाने के दावे, ट्रेडिंग ऐप्स की आसान उपलब्धता और कम समय में ज्यादा रिटर्न की उम्मीद युवाओं को डेरिवेटिव्स बाजार की ओर खींच रही है. हालांकि, भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (SEBI) के ताजा आंकड़े इस ट्रेंड की दूसरी तस्वीर दिखाते हैं. वित्त वर्ष 2026 में 30 साल से कम उम्र के करीब 89 फीसदी F&O ट्रेडर्स को नुकसान हुआ. वहीं, इस उम्र वर्ग की डेरिवेटिव्स मार्केट में हिस्सेदारी भी चार साल में 31 फीसदी से बढ़कर 43 फीसदी हो गई है.

F&O में युवाओं की बढ़ी हिस्सेदारी

SEBI की स्टडी के मुताबिक, वित्त वर्ष 2026 में 30 साल से कम उम्र के ट्रेडर्स व्यक्तिगत डेरिवेटिव्स पार्टिसिपेंट्स का करीब 43 फीसदी रहे. चार साल पहले यह हिस्सेदारी 31 फीसदी थी. यानी कम उम्र के निवेशकों की F&O मार्केट में भागीदारी तेजी से बढ़ी है. हालांकि, इसी वर्ग में नुकसान उठाने वाले ट्रेडर्स की संख्या भी सबसे ज्यादा रही. वित्त वर्ष 2026 में 30 साल से कम उम्र के करीब 89 फीसदी ट्रेडर्स को नुकसान हुआ. इसके मुकाबले 60 साल से ज्यादा उम्र वाले पार्टिसिपेंट्स में नुकसान उठाने वालों की हिस्सेदारी 81 फीसदी रही. इससे साफ है कि कम उम्र के ट्रेडर्स की बढ़ती भागीदारी के साथ जोखिम और नुकसान का स्तर भी चिंता का विषय बना हुआ है.

कम आय वाले ट्रेडर्स पर ज्यादा मार

SEBI के आंकड़ों में आय के आधार पर भी F&O ट्रेडिंग की तस्वीर चिंताजनक है. व्यक्तिगत डेरिवेटिव्स ट्रेडर्स में करीब तीन-चौथाई ऐसे थे, जिनकी सालाना आय 5 लाख रुपये से कम थी. इस समूह का डेरिवेटिव्स टर्नओवर में करीब 43 फीसदी हिस्सा था, लेकिन कुल नुकसान में इनकी हिस्सेदारी 53 फीसदी रही. इस आय वर्ग में करीब 88 फीसदी ट्रेडर्स को नुकसान हुआ. वहीं, सालाना 1 करोड़ रुपये से ज्यादा कमाने वाले निवेशकों में नुकसान उठाने वालों की हिस्सेदारी 81 फीसदी रही.

छोटे शहरों के निवेशक भी F&O में बढ़ा रहे दांव

डेरिवेटिव्स ट्रेडिंग का विस्तार सिर्फ बड़े शहरों तक सीमित नहीं रहा है. SEBI के मुताबिक, वित्त वर्ष 2026 में B30 यानी बड़े शहरों के बाहर के इलाकों के निवेशक व्यक्तिगत ट्रेडर्स का करीब दो-तिहाई हिस्सा थे. डेरिवेटिव्स के कुल टर्नओवर में भी उनका हिस्सा करीब आधा रहा. खास बात यह है कि B30 निवेशकों की हिस्सेदारी व्यक्तिगत म्यूचुअल फंड एसेट्स में करीब एक-चौथाई है. इससे संकेत मिलता है कि छोटे शहरों के निवेशक पारंपरिक निवेश की तुलना में डेरिवेटिव्स जैसे ज्यादा जोखिम वाले विकल्पों में अपेक्षाकृत ज्यादा सक्रिय हैं.

1 लाख रुपये से कम पोर्टफोलियो वालों का सबसे ज्यादा नुकसान

SEBI की स्टडी में निवेशकों के इक्विटी पोर्टफोलियो और F&O ट्रेडिंग के बीच संबंध भी सामने आया है. वित्त वर्ष 2025-26 में करीब 95 लाख यानी 78 फीसदी व्यक्तिगत डेरिवेटिव्स ट्रेडर्स का इक्विटी पोर्टफोलियो 1 लाख रुपये से कम था. इस समूह की डेरिवेटिव्स टर्नओवर में हिस्सेदारी करीब 51 फीसदी थी, लेकिन कुल नुकसान में इनकी हिस्सेदारी 70 फीसदी तक पहुंच गई. यानी कम पूंजी वाले निवेशकों ने F&O में अपेक्षाकृत बड़ा जोखिम उठाया और नुकसान का बोझ भी ज्यादा झेला.

छोटा पोर्टफोलियो, बड़ा F&O दांव

स्टडी के मुताबिक, ऐसे ट्रेडर्स जिनका इक्विटी पोर्टफोलियो 1 लाख रुपये से कम था, लेकिन डेरिवेटिव्स में उनका टर्नओवर 1 करोड़ रुपये से ज्यादा था, उनकी संख्या कुल ट्रेडर्स की करीब 13 फीसदी थी. हालांकि, कुल नुकसान में उनकी हिस्सेदारी 52 फीसदी रही. यह आंकड़ा बताता है कि सीमित इक्विटी पूंजी वाले कई निवेशक डेरिवेटिव्स में अपने उपलब्ध संसाधनों की तुलना में काफी बड़ा दांव लगा रहे थे.

बिना इक्विटी पोर्टफोलियो के भी F&O ट्रेडिंग

SEBI के अनुसार, वित्त वर्ष 2025-26 में करीब 43 लाख ट्रेडर्स यानी व्यक्तिगत डेरिवेटिव्स पार्टिसिपेंट्स का लगभग 35 फीसदी हिस्सा ऐसा था, जिसके पास वित्त वर्ष 2026 के अंत में कोई अंडरलाइंग इक्विटी पोर्टफोलियो नहीं था. इससे पता चलता है कि बड़ी संख्या में लोग बिना कैश इक्विटी होल्डिंग के भी डेरिवेटिव्स में ट्रेडिंग कर रहे थे. ऐसे में F&O उनके लिए निवेश के बजाय सीधे सट्टेबाजी जैसे जोखिम वाला विकल्प बन सकता है.

कुल ट्रेडर्स की संख्या घटी, लेकिन जोखिम बना रहा

SEBI की स्टडी के मुताबिक, व्यक्तिगत डेरिवेटिव्स ट्रेडर्स की कुल संख्या में भी गिरावट आई है. वित्त वर्ष 2025 में करीब 1.06 करोड़ व्यक्तिगत ट्रेडर्स थे, जो वित्त वर्ष 2026 में घटकर करीब 87.5 लाख रह गए. यानी ट्रेडर्स की संख्या में करीब 18 फीसदी की कमी आई. इसके बावजूद युवा निवेशकों की हिस्सेदारी बढ़ना और छोटे पोर्टफोलियो वाले ट्रेडर्स का भारी नुकसान उठाना बाजार नियामक के लिए चिंता का विषय है.

सोशल मीडिया और आसान ट्रेडिंग से बढ़ा आकर्षण

F&O ट्रेडिंग की बढ़ती लोकप्रियता के पीछे सोशल मीडिया पर मौजूद फिनफ्लुएंसर्स, ट्रेडिंग से जल्दी पैसा कमाने की उम्मीद और मोबाइल ऐप्स के जरिए बाजार तक आसान पहुंच जैसे कई कारण हैं. हालांकि, SEBI के आंकड़े बताते हैं कि डेरिवेटिव्स में तेजी से पैसा बनाने की कोशिश बड़े नुकसान में बदल सकती है.

SEBI ने अपनी स्टडी में उम्र, आय, भौगोलिक स्थिति, ट्रेडिंग गतिविधि और पोर्टफोलियो के आकार के आधार पर ट्रेडिंग के नतीजों का विश्लेषण किया है. हालांकि, नियामक ने यह भी स्पष्ट किया है कि इन संबंधों को सीधे कारण और प्रभाव के प्रमाण के तौर पर नहीं देखा जाना चाहिए.
 


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