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2,900 करोड़ रुपये की राहत से अंबानी और निप्पॉन के खिलाफ SEBI की बड़ी कार्रवाई का आधार कमजोर
यस बैंक के AT-1 बॉन्ड को बहाल करने के सुप्रीम कोर्ट के फैसले से SEBI की रिलायंस म्यूचुअल फंड जांच की मुख्य धारणा कमजोर पड़ गई है. इस मामले में यह माना गया था कि रिलायंस म्यूचुअल फंड ने जिन बॉन्ड में निवेश किया था, वे बेकार हो चुके थे.
बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 1 hour ago
पलक शाह
सुप्रीम कोर्ट के यस बैंक के 8,415 करोड़ रुपये के अतिरिक्त टियर-1 (AT-1) बॉन्ड को बहाल करने के फैसले ने SEBI के म्यूचुअल फंड से जुड़े सबसे महत्वपूर्ण मामलों में से एक की मुख्य धारणा को कमजोर कर दिया है. इस मामले में माना गया था कि रिलायंस म्यूचुअल फंड द्वारा खरीदे गए बॉन्ड बेकार हो चुके थे.
15 अक्टूबर को जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की पीठ ने यस बैंक, उसके पूर्व प्रशासक, भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) और भारत सरकार की उन अपीलों को खारिज कर दिया, जो मार्च 2020 में बॉन्ड की रकम को बट्टे खाते में डालने के फैसले को रद्द करने वाले बॉम्बे हाई कोर्ट के 2023 के आदेश के खिलाफ दायर की गई थीं. सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि बॉन्ड की रकम को बट्टे खाते में डालने का फैसला अधिकार क्षेत्र से बाहर था. अदालत ने प्रशासक की कार्रवाई को "पूरी तरह अवैध और अमान्य" बताया और निर्देश दिया कि बॉन्ड की मूल शर्तों के अनुसार कूपन भुगतान किया जाए.
अदालत ने पाया कि 13 मार्च, 2020 को अधिसूचित अंतिम पुनर्गठन योजना में जानबूझकर उस प्रावधान को हटा दिया गया था, जो मसौदा योजना में बॉन्ड की रकम को बट्टे खाते में डालने की अनुमति देता था. इसके बावजूद प्रशासक ने अगले ही दिन बॉन्ड की रकम को बट्टे खाते में डाल दिया. यह कार्रवाई बहुत देर से की गई, क्योंकि नियमों के अनुसार योजना लागू होने से पहले ऐसा करना जरूरी था. इसके अलावा, यह प्रशासक के अधिकार क्षेत्र से भी बाहर था, क्योंकि यह विकल्प RBI के पास था और उसने इसका इस्तेमाल नहीं किया था. अदालत ने RBI, प्रशासक और यस बैंक के आचरण को "संदेहास्पद" बताया.
इस फैसले का सीधा असर SEBI की 30 अगस्त, 2024 की कारण बताओ नोटिस पर पड़ता है. इस नोटिस में आरोप लगाया गया है कि रिलायंस म्यूचुअल फंड ने 2016 और 2017 में यस बैंक के AT-1 बॉन्ड में 2,150 करोड़ रुपये का निवेश किया था, जबकि यस बैंक ने रिलायंस कैपिटल समूह की कंपनियों को लगभग 3,400 करोड़ रुपये का कर्ज दिया था. SEBI का कहना है कि यह लेनदेन बदले में लाभ पहुंचाने की व्यवस्था थी, जिसके जरिए फंड के अपने प्रायोजक समूह की कंपनियों की निजी तौर पर जारी प्रतिभूतियों में निवेश पर लगी रोक को दरकिनार किया गया.
इस नोटिस में अनिल अंबानी, जय अनमोल अंबानी, राणा कपूर, एसेट मैनेजमेंट कंपनी (AMC), जो अब निप्पॉन लाइफ इंडिया एसेट मैनेजमेंट है, इसके पूर्व CEO संदीप सिक्का, फिक्स्ड इनकम प्रमुख अमित त्रिपाठी और मुख्य जोखिम अधिकारी मिलिंद नेसरिकर के नाम शामिल हैं. इन आरोपों को चुनौती दी गई है और अभी तक कोई निष्कर्ष नहीं निकाला गया है.
नोटिस में छह योजनाओं के पास बचे बॉन्ड का मूल्य शून्य आंका गया था, क्योंकि ये बॉन्ड "पूरी तरह बट्टे खाते में डाल दिए गए थे". इसमें निवेशकों को 1,828.70 करोड़ रुपये का नुकसान होने का अनुमान लगाया गया था. SEBI ने प्रमोटरों से यह रकम वापस योजनाओं में जमा कराने और AMC से प्रबंधन शुल्क के रूप में प्राप्त 88.59 करोड़ रुपये लौटाने की मांग की थी.
सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद इन बॉन्ड की पूरी कीमत बहाल हो जाती है. छह से सात वर्षों के 9% से 9.5% की दर से बकाया कूपन भुगतान से लगभग 1,040 करोड़ से 1,150 करोड़ रुपये अतिरिक्त मिल सकते हैं. इस तरह संबंधित योजनाएं SEBI द्वारा आंके गए नुकसान की तुलना में लगभग 2,900 करोड़ रुपये की वसूली कर सकती हैं. हालांकि, अदालत ने देरी से किए जाने वाले कूपन भुगतान पर ब्याज देने का आदेश नहीं दिया है. जिन यूनिटधारकों ने बॉन्ड की रकम बट्टे खाते में डाले जाने के बाद अपनी यूनिट भुना ली थीं, उन्हें इसका लाभ शायद नहीं मिले.
नोटिस पाने वाले पक्षों के वकीलों से यह तर्क देने की उम्मीद है कि इस फैसले के बाद नोटिस का मूल आधार समाप्त हो गया है. उनका कहना होगा कि जिन योजनाओं को पूरा पैसा वापस मिल रहा है, उनमें 1,828.70 करोड़ रुपये दोबारा जमा कराने का निर्देश दोहरी वसूली के समान होगा. वे यह भी तर्क दे सकते हैं कि SEBI पूरक नोटिस जारी किए बिना नुकसान के किसी नए सिद्धांत पर भरोसा नहीं कर सकता.
हालांकि, SEBI के पास भी अपने तर्क हैं. उसके धोखाधड़ी रोधी नियम ऐसे आचरण पर लागू होते हैं, "चाहे कोई गलत लाभ हुआ हो या किसी नुकसान से बचा गया हो या नहीं". सुप्रीम कोर्ट ने इन नियमों की व्यापक व्याख्या की है. इस दृष्टिकोण के अनुसार, बॉन्ड के साथ आगे क्या हुआ, इससे अलग कथित व्यवस्था नियमों का उल्लंघन हो सकती है. फैसले में यह भी कहा गया है कि अदालत की टिप्पणियों का लंबित कार्यवाहियों पर प्रभाव नहीं पड़ना चाहिए. नोटिस में AMC पर अपनी आंतरिक निवेश सीमा का उल्लंघन करने का अलग आरोप भी है. यह सीमा एक समय 88.92% तक पहुंच गई थी. यह आरोप नुकसान होने या न होने पर निर्भर नहीं करता.
समय भी महत्वपूर्ण है. SEBI के नए निपटान नियम नवंबर में लागू होंगे. इनके तहत उन पक्षों को एक बार 90 दिन का अवसर मिलेगा, जिनके पहले के निपटान आवेदन खारिज कर दिए गए थे, ताकि वे दोबारा आवेदन कर सकें. हालांकि, इन नियमों के तहत जानबूझकर कर्ज न चुकाने वालों और आर्थिक अपराध कर फरार हुए लोगों के लिए निपटान की अनुमति नहीं है.
SEBI, निप्पॉन लाइफ इंडिया AMC और नोटिस में नामित व्यक्तियों ने टिप्पणी के अनुरोधों का जवाब नहीं दिया.
पलक शाह, BW रिपोर्टर्स
(पलक शाह एक अनुभवी खोजी पत्रकार हैं और द मार्केट माफिया: क्रॉनिकल ऑफ इंडियाज हाई-टेक स्टॉक मार्केट स्कैंडल एंड द कैबल दैट वेंट स्कॉट-फ्री पुस्तक के लेखक हैं. यह पुस्तक भारत के शेयर बाजार घोटाले और उन लोगों के गठजोड़ को उजागर करती है, जो कथित तौर पर बिना किसी कार्रवाई के बच निकले. मुंबई में लगभग दो दशक की जमीनी रिपोर्टिंग के दौरान पलक ने वित्तीय बाजारों में धन, सत्ता और नियमन के बीच संबंधों की पड़ताल की है. उनके लेख द इकोनॉमिक टाइम्स, बिजनेस स्टैंडर्ड, द फाइनेंशियल एक्सप्रेस और द हिंदू बिजनेसलाइन जैसे प्रमुख वित्तीय समाचार पत्रों में प्रकाशित हुए हैं.
19 वर्ष की उम्र में अपराध पत्रकारिता की ओर आकर्षित होने के बाद पलक ने महसूस किया कि 1980 के दशक में मुंबई के गैंगवार की जगह कॉरपोरेट कार्यालयों में संचालित सफेदपोश अपराधों ने ले ली है. इसके बाद उन्होंने वित्तीय पत्रकारिता की ओर रुख किया और शेयर बाजार में हेरफेर से लेकर नियामकीय खामियों तक के मामलों की पड़ताल की. उनका काम वित्तीय बाजारों की चमकदार सतह के पीछे छिपे गठजोड़ को सामने लाने पर केंद्रित है.)
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