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टाटा संस से 25,000 करोड़ रुपये के शेयर बायबैक पर विचार करने की मांग, कर्ज चुकाने के लिए SP ग्रुप को फंड की जरूरत
SP ग्रुप की टाटा संस में करीब 18.4 फीसदी हिस्सेदारी है, जो स्टर्लिंग इन्वेस्टमेंट्स कॉरपोरेशन और साइरस इन्वेस्टमेंट्स के माध्यम से रखी गई है. ग्रुप अपनी हिस्सेदारी के एक हिस्से को भुनाकर वित्तीय स्थिति मजबूत करना चाहता है.
बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 1 hour ago
कर्ज के बोझ से जूझ रहा शापूरजी पल्लोनजी (SP) ग्रुप टाटा संस में अपनी करीब 18.4 फीसदी हिस्सेदारी के एक हिस्से को भुनाकर फंड जुटाना चाहता है. इसके लिए ग्रुप ने टाटा संस से लगभग 25,000 करोड़ रुपये के शेयर बायबैक प्रस्ताव को अगली बोर्ड बैठक में प्राथमिकता देने की मांग की है. भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के टाटा संस की लिस्टिंग से जुड़े रुख के बीच यह प्रस्ताव अहम हो गया है.
कर्ज के बोझ से जूझ रहे शापूरजी पल्लोनजी (SP) ग्रुप ने टाटा संस से करीब 25,000 करोड़ रुपये के शेयर बायबैक प्रस्ताव पर जल्द विचार करने का आग्रह किया है. मामले की जानकारी रखने वाले लोगों के अनुसार, ग्रुप चाहता है कि टाटा संस की अगली बोर्ड बैठक में इस प्रस्ताव को प्राथमिकता दी जाए. इससे मिलने वाली रकम का इस्तेमाल कर्ज चुकाने के लिए किया जा सकता है.
इस प्रस्ताव को टाटा ट्रस्ट्स के चेयरमैन नोएल टाटा ने टाटा संस की पिछली बोर्ड बैठक में रखा था. फिलहाल यह प्रस्ताव विचाराधीन है. SP ग्रुप की टाटा संस में करीब 18.4 फीसदी हिस्सेदारी है, जो स्टर्लिंग इन्वेस्टमेंट्स कॉरपोरेशन और साइरस इन्वेस्टमेंट्स के माध्यम से रखी गई है. ग्रुप अपनी हिस्सेदारी के एक हिस्से को भुनाकर वित्तीय स्थिति मजबूत करना चाहता है.
SP ग्रुप को फंड की तत्काल जरूरत
प्रस्तावित लेनदेन के तहत 18 महीने की अवधि में टाटा संस की शेयर पूंजी में चुनिंदा कटौती की योजना पर विचार किया जा रहा है. इससे SP ग्रुप को कम से कम 25,000 करोड़ रुपये की कुल रकम मिल सकती है. शेयरों का मूल्यांकन लागू आयकर नियमों के तहत निर्धारित उचित बाजार मूल्य के आधार पर किए जाने का प्रस्ताव है.
SP ग्रुप लंबे समय से टाटा संस में अपने निवेश को भुनाने के विकल्प तलाश रहा है. इसका उद्देश्य बैलेंस शीट को मजबूत करना और कर्ज का बोझ कम करना है. टाटा संस में ग्रुप की हिस्सेदारी कर्ज के बदले गिरवी रखी गई है, इसलिए यह निवेश उसके लिए फंड जुटाने का एक अहम संभावित स्रोत है.
ग्रुप ने जुलाई में 21,500 करोड़ रुपये की रीफाइनेंसिंग प्रक्रिया पूरी की थी. इसके बाद करीब 3,500 करोड़ रुपये के बॉन्ड का भुगतान भी किया गया, जिससे तत्काल नकदी संबंधी दबाव कुछ कम हुआ. हालांकि, कर्ज की अन्य देनदारियों को पूरा करने और वित्तीय स्थिति सुधारने के लिए ग्रुप को अतिरिक्त फंड की जरूरत बनी हुई है.
शेयर पूंजी में चुनिंदा कटौती का प्रस्ताव इसी दिशा में एक विकल्प है. हालांकि, इस लेनदेन की अंतिम संरचना, शेयरों का मूल्यांकन और फंड जुटाने का तरीका अभी चर्चा और जरूरी मंजूरियों पर निर्भर करेगा.
RBI के लिस्टिंग निर्देश से बढ़ी चुनौती
यह घटनाक्रम टाटा संस के भविष्य के स्वामित्व ढांचे को लेकर जारी अनिश्चितता के बीच सामने आया है. भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने टाटा संस के अपर-लेयर नॉन-बैंकिंग फाइनेंशियल कंपनी (NBFC) के रूप में अपना रजिस्ट्रेशन सरेंडर करने के आवेदन को खारिज कर दिया था.
RBI के नियमों के तहत अपर-लेयर NBFC को निर्धारित समयसीमा के भीतर अपने इक्विटी शेयर किसी मान्यता प्राप्त स्टॉक एक्सचेंज में लिस्ट कराने होते हैं. इस निर्देश के बाद टाटा संस की लिस्टिंग को लेकर बहस तेज हो गई है. अब सवाल यह है कि कंपनी निजी स्वामित्व में बनी रहेगी या शेयर बाजार में लिस्टिंग की दिशा में आगे बढ़ेगी.
SP ग्रुप ने टाटा संस की लिस्टिंग को लेकर RBI के रुख का समर्थन किया है. ग्रुप के चेयरमैन शापूर मिस्त्री पहले भी पारदर्शिता और सार्वजनिक जवाबदेही के लिहाज से लिस्टिंग के पक्ष में अपनी राय रख चुके हैं.
हालांकि, ग्रुप की तत्काल वित्तीय जरूरतों के कारण वह लिस्टिंग का इंतजार किए बिना अपनी हिस्सेदारी के एक हिस्से को भुनाने का विकल्प भी तलाश रहा है.
दूसरी ओर, टाटा संस में बहुमत हिस्सेदारी रखने वाले टाटा ट्रस्ट्स सार्वजनिक लिस्टिंग का विरोध करते रहे हैं. उनका तर्क है कि मौजूदा स्वामित्व ढांचे को बनाए रखने से समूह की परोपकारी गतिविधियों को जारी रखने में मदद मिलेगी. इन गतिविधियों के लिए कुछ हद तक टाटा कंपनियों से मिलने वाले डिविडेंड का इस्तेमाल किया जाता है.
शेयर बायबैक प्रस्ताव के सामने कानूनी अड़चनें
प्रस्ताव को लागू करने के लिए कानूनी और नियामकीय प्रावधानों पर विचार करना होगा. कंपनी के शेयरों की चुनिंदा पूंजी कटौती सामान्य शेयर बायबैक से अलग प्रक्रिया है. कंपनी अधिनियम, 2013 की धारा 66 के तहत इस तरह की चुनिंदा पूंजी कटौती के लिए राष्ट्रीय कंपनी कानून न्यायाधिकरण (NCLT) की मंजूरी जरूरी होती है.
इसके अलावा, शेयरों के मूल्यांकन, सभी शेयरधारकों के हितों की निष्पक्षता और टाटा संस के फंड के इस्तेमाल को लेकर भी सवाल उठ सकते हैं. कंपनी को अपनी भविष्य की निवेश जरूरतों और संभावित लिस्टिंग को ध्यान में रखते हुए इस प्रस्ताव का आकलन करना होगा.
टाटा संस को इस प्रस्ताव पर फैसला लेते समय अपनी पूंजी संबंधी जरूरतों, शेयरधारकों के हितों और नियामकीय दायित्वों के बीच संतुलन बनाना होगा. लेनदेन की संरचना और समयसीमा को लेकर होने वाला फैसला SP ग्रुप की वित्तीय स्थिति के साथ-साथ टाटा संस के दीर्घकालिक स्वामित्व ढांचे को भी प्रभावित कर सकता है.
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