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मीठा सौदा: फेयरफैक्स ने IDBI को सस्ते में खरीदा, अपनी कंपनियों की हिस्सेदारी पूरी कीमत पर बैंक में डाली

गणित चौंकाने वाला है. IDBI को 81 रुपये प्रति शेयर (बाजार भाव 90 रुपये के मुकाबले) पर हासिल करने के एक दिन बाद, प्रेम वत्स के समूह ने Go Digit और IIFL में अपनी हिस्सेदारी, जिसकी कीमत 18,500 करोड़ रुपये है, पूरी बाजार कीमत पर बैंक में डालने की योजना बनाई है. इसका भुगतान नकद में होगा या शेयरों के जरिए, यह अभी स्पष्ट नहीं है.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 1 hour ago

पलक शाह 

फेयरफैक्स ने सरकार और LIC से बैंक सस्ते में खरीदा.

अब अपनी हिस्सेदारी बैंक में पूरी कीमत पर डालने की तैयारी.

फेयरफैक्स को 6,100 करोड़ रुपये की छूट, क्या इसकी कीमत IDBI चुकाएगा?

फेयरफैक्स फाइनेंशियल होल्डिंग्स की योजना अपनी दो भारतीय वित्तीय कंपनियों में हिस्सेदारी को पूरी बाजार कीमत पर IDBI बैंक में स्थानांतरित करने की है. यह घोषणा सरकार द्वारा बैंक का नियंत्रण उसे बाजार मूल्यांकन से कम कीमत पर बेचने पर सहमति जताने के एक दिन बाद आई.

14 अक्टूबर को आर्थिक मामलों की कैबिनेट समिति ने फेयरफैक्स की एक सहायक कंपनी को IDBI बैंक की 60.72% हिस्सेदारी 81 रुपये प्रति शेयर के भाव पर बेचने की मंजूरी दी. इस सौदे का कुल मूल्य लगभग 52,878 करोड़ रुपये है. सरकार अपनी 30.48% हिस्सेदारी बेच रही है, जबकि भारतीय जीवन बीमा निगम (LIC) अपनी 30.24% हिस्सेदारी बेचेगा. इसके बाद सरकार के पास 15% और LIC के पास 19% हिस्सेदारी बच जाएगी.

उस दिन IDBI बैंक के शेयर 90.39 रुपये पर बंद हुए थे. इस लिहाज से बिक्री मूल्य बाजार भाव से लगभग 10% कम है. कुल 652.8 करोड़ शेयरों के आधार पर कीमत का यह अंतर लगभग 6,100 करोड़ रुपये बैठता है.

अगले दिन फेयरफैक्स के चेयरमैन प्रेम वत्स ने कहा कि समूह बीमा कंपनी Go Digit में अपनी लगभग 57% हिस्सेदारी और फेयरफैक्स इंडिया की ब्रोकिंग कंपनी IIFL Capital में 30.5% हिस्सेदारी IDBI बैंक में स्थानांतरित करेगा. इनका मूल्यांकन "उनकी संबंधित बाजार कीमतों" पर किया जाएगा. 19 अक्टूबर को बाजार बंद होने के भाव के अनुसार, इन हिस्सेदारियों का मूल्य लगभग 18,500 करोड़ रुपये था, जो फेयरफैक्स द्वारा बैंक खरीदने के लिए चुकाई जा रही रकम का लगभग एक-तिहाई है.

इस तरह फेयरफैक्स बैंक को छूट पर खरीद रहा है, जबकि अपनी कंपनियों की हिस्सेदारी उसी बैंक में पूरी कीमत पर डालने की योजना बना रहा है.

नकद या शेयर?

फेयरफैक्स ने यह नहीं बताया है कि IDBI बैंक इस हिस्सेदारी के लिए भुगतान कैसे करेगा. अभी तक कोई बाध्यकारी समझौता भी नहीं हुआ है.

अगर IDBI नकद भुगतान करता है, तो यह पैसा बैंक की पूंजी से आएगा, जिसका आधार आम जमाकर्ताओं की बचत है. फेयरफैक्स पहले ही कह चुका है कि वह IDBI को खरीदने के लिए "उपलब्ध नकदी, मौजूदा क्रेडिट सुविधाओं और संभावित परिसंपत्ति बिक्री" से धन जुटाएगा. IDBI से फेयरफैक्स के अपने कारोबारों के लिए मिलने वाला पैसा बैंक खरीदने की लागत चुकाने में उसकी मदद कर सकता है.

अगर IDBI नए शेयर जारी करके भुगतान करता है, तो फेयरफैक्स की हिस्सेदारी 60.72% से ऊपर चली जाएगी और सरकार तथा LIC की बची हुई कुल 34% हिस्सेदारी का अनुपात घट जाएगा.

इस योजना के लिए भारतीय रिजर्व बैंक (RBI), भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (SEBI) तथा बीमा नियामक IRDAI की मंजूरी जरूरी है. सरकार ने यह नहीं बताया है कि यह योजना फेयरफैक्स की बोली का हिस्सा थी या नहीं, और क्या सरकार के मूल्यांकनकर्ताओं ने इसे ध्यान में रखा था.

बोली के मुताबिक घटाई गई कीमत

2025-26 में बोली के पहले दौर के दौरान सरकार ने प्रति शेयर 94.42 रुपये का आरक्षित मूल्य तय किया था. बोलियां इस स्तर तक नहीं पहुंच सकीं और उन्हें मंजूरी नहीं दी गई.

अक्टूबर तक सरकार का बेंचमार्क घटकर 75.99 रुपये रह गया, जो पहले से लगभग 20% कम था. यह उन एजेंसियों के दो मूल्यांकनों का औसत था, जिनके नाम सरकार ने सार्वजनिक नहीं किए हैं. उनकी रिपोर्ट भी प्रकाशित नहीं की गई है. फेयरफैक्स की 81 रुपये प्रति शेयर की बोली इस बार तय सीमा से ऊपर रही.

इस सौदे में प्रतिस्पर्धा भी बहुत कम रह गई थी. कोटक महिंद्रा बैंक ने कहा है कि उसने कभी वित्तीय बोली लगाई ही नहीं थी. जुलाई में रॉयटर्स ने खबर दी थी कि एमिरेट्स NBD "सौदे को सक्रिय रूप से आगे नहीं बढ़ा रहा था" और सबसे आगे चल रहा फेयरफैक्स "सरकार के साथ बातचीत कर रहा था".

8 सितंबर को फेयरफैक्स की 81 रुपये प्रति शेयर की पेशकश की खबरें सामने आई थीं, जबकि किसी फैसले की घोषणा होने में अभी कई सप्ताह बाकी थे. उस दिन IDBI के शेयर 10.56% गिरकर 81.12 रुपये पर आ गए थे.

2003 का वादा

बैंक यूनियनें दिसंबर 2003 की ओर ध्यान दिलाती हैं, जब IDBI एक कंपनी बना था. द वायर के मुताबिक, तत्कालीन वित्त मंत्री जसवंत सिंह ने संसद में कहा था कि सरकार "हर परिस्थिति में" बैंक में कम से कम 51% हिस्सेदारी बनाए रखेगी. 2019 में LIC के नियंत्रण संभालने के बाद सरकार की अपनी हिस्सेदारी 51% से नीचे आ गई थी. मौजूदा बिक्री से बैंक पर सार्वजनिक क्षेत्र का नियंत्रण पूरी तरह समाप्त हो जाएगा.

वत्स का प्रभाव

नवंबर 2014 में प्रेम वत्स ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात की थी. यह मुलाकात फेयरफैक्स इंडिया की शुरुआत से कुछ समय पहले हुई थी. उसी महीने एक साक्षात्कार में उन्होंने कहा था, "श्री मोदी भारत के ली कुआन यू हैं." बिक्री को मंजूरी देने वाली समिति की अध्यक्षता प्रधानमंत्री करते हैं. हालांकि, ऐसा कोई सार्वजनिक साक्ष्य नहीं है कि इस मुलाकात का फैसले पर कोई असर पड़ा. आलोचकों का कहना है कि इस वजह से पूरी जानकारी सार्वजनिक करना और भी महत्वपूर्ण हो जाता है.

सरकार का पक्ष

सरकार का कहना है कि 81 रुपये प्रति शेयर की कीमत दोनों मूल्यांकनों से अधिक थी. एक मूल्यांकन में IDBI की तुलना दूसरे बैंकों से की गई थी, जबकि दूसरे में जमीन और संपत्ति सहित उसकी परिसंपत्तियों का मूल्यांकन किया गया था. सरकार का कहना है कि उसने बाजार मूल्य को अलग रखा, क्योंकि शेयर की कीमत में उतार-चढ़ाव बैंक के वास्तविक मूल्य को नहीं दर्शाता था. IDBI के केवल लगभग 5% शेयरों का ही सार्वजनिक बाजार में कारोबार होता है.

अधिकारियों ने इसे भारत के वित्तीय क्षेत्र में अब तक का सबसे बड़ा विदेशी निवेश बताया है. फेयरफैक्स का कहना है कि वह "भारत से दुनिया का बेहतरीन वित्तीय संस्थान" बनाना चाहता है.

16 अक्टूबर को बैंक यूनियनों ने काली पट्टी बांधकर विरोध प्रदर्शन किया था. मंजूरी मिलने के बाद के दो दिनों में IDBI के शेयर 7% से अधिक गिर गए.

वे सवाल जिनके जवाब अभी बाकी हैं

- क्या Go Digit और IIFL में हिस्सेदारी स्थानांतरित करने की योजना फेयरफैक्स की बोली का हिस्सा थी और क्या कैबिनेट को इसकी जानकारी थी?
- IDBI भुगतान नकद में करेगा या शेयरों के जरिए?
- फेयरफैक्स की कंपनियों का मूल्यांकन कौन करेगा और क्या सरकार तथा LIC को इस पर मतदान करने का अधिकार मिलेगा?
- क्या सौदा पूरा होने से पहले मूल्यांकन रिपोर्ट संसद के सामने रखी जाएंगी?

पलक शाह, BW रिपोर्टर्स

(BW रिपोर्टर्स पलक शाह एक अनुभवी खोजी पत्रकार और The Market Mafia: Chronicle of India’s High-Tech Stock Market Scandal & The Cabal That Went Scot-Free की लेखिका हैं. यह एक तीखा खुलासा है, जिसने भारत के वित्तीय बाजारों के छिपे हुए पक्ष को सामने लाया. मुंबई में करीब दो दशकों की जमीनी रिपोर्टिंग के साथ पलक ने पैसे, सत्ता और नियमन के बीच के गठजोड़ की गहराई से पड़ताल करने वाले पत्रकार के रूप में पहचान बनाई है. उनके लेख भारत के प्रतिष्ठित वित्तीय दैनिकों, जिनमें The Economic Times, Business Standard, The Financial Express और The Hindu Business Line शामिल हैं, में प्रकाशित हुए हैं.

19 वर्ष की उम्र में अपराध रिपोर्टिंग की ओर आकर्षित हुईं पलक ने जल्द ही महसूस किया कि 1980 के दशक के मुंबई के गैंग युद्धों की जगह अब कॉरपोरेट टावरों में चलने वाली सफेदपोश योजनाओं ने ले ली है. इस समझ ने उन्हें वित्तीय पत्रकारिता की ओर मोड़ा, जहां उन्होंने भारत की ‘व्हाइट मनी’ अर्थव्यवस्था की जटिल गतिविधियों को समझने में वर्षों बिताए हैं. शेयर बाजार में हेरफेर से लेकर नियामकीय खामियों तक, उनका काम हाई फाइनेंस की चमकदार सतह के पीछे छिपे उन समूहों को सामने लाता है जो पर्दे के पीछे से फैसलों को प्रभावित करते हैं. सच्चाई सामने लाने का उनका जुनून और उन कड़ियों को जोड़ने की क्षमता, जिन्हें दूसरे नजरअंदाज कर देते हैं, उन्हें एक मजबूत पत्रकार बनाती है, जो यथास्थिति को चुनौती देने और उन खिलाड़ियों को बेनकाब करने से नहीं डरतीं जो खुद को कानून से ऊपर समझते हैं.)
 

 


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