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Fiscal Deficit क्या होता है, इसका आप पर क्या असर है, आसान भाषा में समझिए

Fiscal Deficit दो शब्दों से बना है, Fiscal और Deficit. Fiscal का मतलब होता है सालाना, यानी कोई आंकड़ा जो एक साल की अवधि के दौरान का हो.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 3 years ago

Fiscal Deficit क्या होता है
केंद्र सरकार के बजट के भाषणों में या फिर रिजर्व बैंक की क्रेडिट पॉलिसी में आपने अक्सर Fiscal Deficit का जिक्र सुना होगा. आप में से कई लोगों को इसकी जानकारी जरूर होगी, लेकिन कई लोग ऐसे भी हैं जो इसे भारी भरकम आर्थिक शब्द मानकर समझने का प्रयास भी नहीं करते हैं. तो चलिए हम आपको बताते हैं बिल्कुल आसान भाषा में कि Fiscal Deficit क्या होता है. 

हम सभी लोग या तो कोई नौकरी करते हैं या बिजनेस करते हैं. मान लीजिए आप हर महीने 10,000 रुपये कमाते हैं, लेकिन आपके घर और ट्रांसपोर्टेशन समेत सभी तमाम खर्चे 12,000 रुपये हैं तो, जो 2,000 रुपये का अतिरिक्त खर्चा है, उसे ही Fiscal Deficit या वित्तीय घाटा या राजकोषीय घाटा कहते हैं. ऐसे ही सरकारों के साथ भी होता है, सरकार जब अपनी कुल इनकम से ज्यादा खर्च करने लगती है तो उसका Fiscal Deficit बढ़ने लगता है. वित्तीय घाटे के GDP के आधार पर कैलकुलेट किया जाता है. मतलब कि वित्तीय घाटा GDP का कितना परसेंट है. 

वित्तीय घाटा कैसे कैलकुलेट होता है
Fiscal Deficit दो शब्दों से बना है, Fiscal और Deficit. Fiscal का मतलब होता है सालाना, यानी कोई आंकड़ा जो एक साल की अवधि के दौरान का हो. और Deficit का मतलब होता है घाटा. अगर आप एक वित्त वर्ष के दौरान हुए कुल खर्चों (Total Expenditure) में से इसी अवधि के दौरान कुल आमदनी (Total Revenue) को घटा देंगे तो आपको वित्तीय घाटा मिल जाएगा. सबसे पहले हम कुल रेवेन्यू (Total Revenue) की बात करते हैं. ये दो तरह की होती है, रेवेन्यू रिसीट (Revenue Receipts) और कैपिटल रिसीट (Capital Receipts).   

रेवेन्यू रिसीट (Revenue Receipts)
ये वो इनकम होती है जो सरकार को टैक्स और नॉन-टैक्स रेवेन्यू से रेगुलर मिलती है, इस रेवेन्यू से सरकार के ऊपर न तो कोई लायबिलिटी बनती है और न तो किसी असेट को बेचना पड़ता है. जितने भी तरह के टैक्स होते हैं वो इस कैटेगरी में आते हैं. जैसे GST, डायरेक्ट टैक्स, निवेश पर ब्याज, डिविडेंड और सर्विसेज से होने वाली कमाई भी इसके तहत आती है. 

कैपिटल रिसीट (Capital Receipts)
इस तरह के रेवेन्यू सरकार के लिए लायबिलिटी पैदा करते हैं. EPF/PPF/NPS में निवेश सरकार के लिए रेवेन्यू जेनरेट तो करते हैं लेकिन लायबिलिटी भी बनाते हैं. विनिवेश के जरिए भी सरकारें रेवेन्यू जेनरेट करती हैं, इसमें वो किसी सरकारी संपत्ति को बेचती हैं और उससे कमाई करती हैं. इसके अलावा राज्य सरकारों के दिए गए कर्जों की रिकवरी से भी केंद्र सरकारों को आमदनी होती है. 

खर्चे (Expenditure)
रेवेन्यू के बाद अब खर्चों की करते हैं, खर्चे (Expenditure) भी दो तरह के होते हैं. 

1. Revenue Expenditure - ये वो खर्चे होते हैं जो सरकार के लिए रेगुलर होते हैं, मतलब इनको हर साल खर्च करना ही पड़ता है. जैसे कर्मचारियों को सैलरी, सब्सिडी, कार्यालयों पर होने वाला खर्च, अगर सरकार ने कोई लोन लिया है तो उसका ब्याज, लोगों की पेंशन, इसे एडमिनिस्ट्रेटिव खर्चे कहा जाता है चाहे सरकार की कमाई हो या न हो. 

2. Capital Expenditure - ये आमतौर पर लंबी अवधि के खर्च होते हैं, ये रिकरिंग नहीं होते मतलब हर साल आपको इन पर खर्च नहीं करना पड़ता, ये लंबी अवधि में सरकार के लिए असेट का निर्माण करते हैं, और लायबिलिटी को कम करते हैं. जैसे- जब सरकार इंफ्रास्ट्रक्चर पर खर्च करती है, पुल, सड़क, बांध और एयरपोर्ट बनाती है, जो आगे चलकर सरकार के लिए असेट बनते हैं. साथ ही राज्य सरकारों को लोन की रिकवरी से केंद्र सरकार को कमाई होती है, इसे भी  Capital Expenditure में गिना जाता है, विदेश कर्जों का भुगतान भी इसी में गिना जाता है. 

सरकार वित्तीय घाटे को कैसे बैलेंस करती है
FY22 में सरकार का वित्तीय घाटा GDP का 6.7 परसेंट था, सरकार FY23 में वित्तीय घाटे को GDP के 6.4 परसेंट पर लाना चाहती है. अब सरकार वित्तीय घाटे को कम कैसे करेगी. वित्तीय घाटा कम करने के लिए सरकार बैंकों के जरिए बॉन्ड जारी करके उधार उठाती है, बैंक इन बॉन्ड्स को खरीदते हैं और निवेशकों को बेचते हैं. सरकार बॉन्ड हमेशा ही एक सुरक्षित निवेश माना जाता है. इसके अलावा सरकार अपने खर्चों में कटौती करती है और टैक्स बढ़ाती है, जिससे उसकी आमदनी बढ़ती है. इसके अलावा सरकार ऐसी सरकारी संपत्तियों को बेचती हैं जिसका इस्तेमाल नहीं हो रहा है, या फिर उन्हें घाटा हो रहा है. सब्सिडी में कटौती भी एक रास्ता है वित्तीय घाटे को नियंत्रित करने का. 

Fiscal Deficit से आम आदमी पर असर 
जब वित्तीय घाटा बढ़ता है तो सरकार की उधारी बढ़ती है, इस उधार को चुकाने के लिए सरकार को ब्याज भी देना होगा. सरकार वित्तीय घाटे की भरपाई करने के लिए टैक्स बढ़ाएगी जिससे महंगाई बढ़ेगी और आम आदमी के लिए रोजमर्रा की चीजें भी महंगी हो जाएंगी. 

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