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SEBI का नया नियम: इक्विटी म्यूचुअल फंड अब गोल्ड और सिल्वर में भी लगा सकेंगे पैसा

नए नियम के तहत अब एक्टिवली मैनेज्ड इक्विटी म्यूचुअल फंड अपने पोर्टफोलियो का एक हिस्सा सोना और चांदी जैसी कीमती धातुओं में भी निवेश कर सकेंगे.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 6 months ago

भारतीय शेयर बाजार के नियामक भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (SEBI) ने म्यूचुअल फंड इंडस्ट्री से जुड़ा एक बड़ा बदलाव किया है. नए नियम के तहत अब एक्टिवली मैनेज्ड इक्विटी म्यूचुअल फंड अपने पोर्टफोलियो का एक हिस्सा सोना और चांदी जैसी कीमती धातुओं में भी निवेश कर सकेंगे. इस कदम का मकसद निवेशकों के पोर्टफोलियो को अधिक सुरक्षित, संतुलित और बाजार के उतार-चढ़ाव से बेहतर तरीके से बचाने लायक बनाना है. हालांकि इसके साथ कुछ संभावित जोखिम भी जुड़े हुए हैं, जिन पर निवेशकों को ध्यान देना जरूरी होगा.

इक्विटी फंड में आएगा नया निवेश विकल्प

अब तक इक्विटी म्यूचुअल फंड मुख्य रूप से कंपनियों के शेयरों में ही निवेश करते थे. निवेश का बचा हुआ हिस्सा आमतौर पर नकद, डेट इंस्ट्रूमेंट्स या अन्य सुरक्षित विकल्पों में रखा जाता था, लेकिन SEBI के संशोधित नियमों के बाद अब एक्टिवली मैनेज्ड इक्विटी फंड अपनी मुख्य इक्विटी निवेश सीमा पूरी करने के बाद शेष पोर्टफोलियो का अधिकतम 35% हिस्सा सोना, चांदी और इंफ्रास्ट्रक्चर इन्वेस्टमेंट ट्रस्ट (InvITs) में लगा सकेंगे. इस बदलाव से फंड मैनेजरों को बाजार की परिस्थितियों के अनुसार पोर्टफोलियो को अधिक लचीले ढंग से प्रबंधित करने का अवसर मिलेगा.

बाजार गिरने पर मिल सकता है सुरक्षा कवच

विशेषज्ञों का मानना है कि सोना और चांदी जैसे कमोडिटी एसेट्स शेयर बाजार के उतार-चढ़ाव के दौरान निवेश को संतुलित करने में मदद करते हैं. जब शेयर बाजार में गिरावट आती है, तब अक्सर सोने की कीमतों में मजबूती देखी जाती है. ऐसे में यदि फंड का एक हिस्सा कीमती धातुओं में निवेशित है, तो यह गिरते बाजार में नुकसान को कुछ हद तक कम करने में सहायक हो सकता है. इसी वजह से इस कदम को निवेश पोर्टफोलियो में “डाइवर्सिफिकेशन” बढ़ाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल माना जा रहा है.

क्या बदल जाएगी इक्विटी फंड की पहचान?

कुछ निवेशकों के मन में यह सवाल भी उठ रहा है कि अगर इक्विटी फंड कमोडिटी में निवेश करने लगेंगे तो क्या उनका स्वरूप हाइब्रिड फंड जैसा हो जाएगा. हालांकि विशेषज्ञों का कहना है कि ऐसा नहीं होगा. इक्विटी फंड का मूल ढांचा और निवेश का मुख्य फोकस कंपनियों के शेयर ही रहेंगे. सोना आमतौर पर एक “पोर्टफोलियो स्टेबलाइजर” की तरह काम करता है, जबकि चांदी को इलेक्ट्रॉनिक्स और सौर ऊर्जा जैसे औद्योगिक क्षेत्रों में बढ़ती मांग का फायदा मिलता है. इसलिए इन धातुओं में सीमित निवेश केवल जोखिम संतुलन के लिए किया जाएगा.

‘पोर्टफोलियो ओवरलैप’ का खतरा

जानकारी के अनुसार आजकल कई निवेशक पहले से ही सॉवरेन गोल्ड बॉन्ड, गोल्ड ETF या फिजिकल गोल्ड में निवेश करते हैं. ऐसी स्थिति में अगर उनके इक्विटी म्यूचुअल फंड भी सोना-चांदी में निवेश करने लगेंगे तो कुल पोर्टफोलियो में इन धातुओं की हिस्सेदारी जरूरत से ज्यादा बढ़ सकती है. विशेषज्ञ सलाह देते हैं कि निवेशकों को अपने कुल एसेट एलोकेशन की समय-समय पर समीक्षा करनी चाहिए ताकि निवेश का संतुलन बना रहे.

कमोडिटी निवेश में भी मौजूद हैं जोखिम

हालांकि सोना और चांदी पोर्टफोलियो में विविधता लाते हैं, लेकिन इनके अपने जोखिम भी हैं. कमोडिटी की कीमतें वैश्विक आर्थिक स्थिति, मुद्रा विनिमय दर और भू-राजनीतिक घटनाओं से तेजी से प्रभावित होती हैं. उदाहरण के तौर पर जनवरी 2026 में एक ही कारोबारी सत्र में गोल्ड ETF में लगभग 9–10% और सिल्वर ETF में 15–24% तक की गिरावट दर्ज की गई थी. विशेषज्ञों का मानना है कि अगर कमोडिटी में अत्यधिक निवेश किया जाए तो लंबे समय में इक्विटी फंड की संभावित ग्रोथ भी प्रभावित हो सकती है, क्योंकि ऐतिहासिक रूप से लंबी अवधि में इक्विटी का रिटर्न कमोडिटी से बेहतर रहा है.

निवेशकों के लिए क्या है सही रणनीति

विशेषज्ञों का मानना है कि म्यूचुअल फंड्स द्वारा सोना-चांदी में निवेश सीमित और रणनीतिक होगा. फंड मैनेजर इस विकल्प का इस्तेमाल मुख्य रूप से तब करेंगे जब बाजार में अस्थिरता, महंगाई या भू-राजनीतिक तनाव बढ़ेगा. इसलिए निवेशकों को घबराने की जरूरत नहीं है, लेकिन उन्हें अपने पूरे पोर्टफोलियो का संतुलन बनाए रखना चाहिए और जरूरत पड़ने पर वित्तीय सलाहकार से सलाह लेना बेहतर होगा.


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