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स्मृति शेष- दिल्ली में मालवा की धड़कन और खुशबू की तरह महकते थे डॉ. हरीश भल्ला!
दिल्ला के सांस्कृतिक सम्राट डॉ. हरीश भल्ला का 10 जनवरी 2025 को निधन हो गया. ‘इंडिया न्यूज’ चैनल पर हरीश भल्ला का शो ‘एक कहानी विद डॉ. हरीश भल्ला काफी लोकप्रिय था.
बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 1 year ago
महानगर दिल्ली की निष्ठुर आत्मा में लगातार हलचल मचाए रखने वाली शानदार इंदौरी टीम से जुड़ी हुई एक और शख्सियत इस दुनिया को अलविदा कह गई. करीब दो साल पहले डॉ. वेदप्रताप वैदिक अचानक चले गए थे. अब हाल ही में दिल्ली के सांस्कृतिक सम्राट के रूप में पहचाने जाने वाले डॉ हरीश भल्ला भी हमें छोड़कर चले गए. राजेंद्र माथुर और प्रभाष जोशी के जाने का दुख खत्म ही नहीं हुआ था कि अब डॉ. भल्ला का निधन हो गया. दिल्ली की गुल्लक में बिना किसी ब्याज के जमा इंदौर के खरे सिक्के जैसे एक-एक करके नियति का शिकार हो रहे हैं. मध्य प्रदेश के रतलाम जिले के जावरा में जन्मे डॉ. भल्ला ने इंदौर के महात्मा गांधी मेमोरियल मेडिकल कॉलेज से चिकित्सा शिक्षा प्राप्त की. दिल्ली में चिकित्सक और नशामुक्ति विशेषज्ञ के रूप में अपनी सेवाएं देने के साथ-साथ, वे कला, संस्कृति, संगीत और थिएटर के प्रति अपने जुनून के लिए प्रसिद्ध थे.
डॉ भल्ला सिर्फ एक कुशल मनोचिकित्सक ही नहीं थे और भी बहुत कुछ थे. वे केंद्र की राजधानी में इंदौर-मालवा के स्वयं-नियुक्त सांस्कृतिक राजदूत थे. मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ से दिल्ली की यात्रा पर जाने वाली मालवी आत्माओं के लिए एक ठिकाना थे, आत्मीयता का खजाना थे, मदद का सहारा थे. साल 1971 में जब प्रभाष जोशी जी के साथ काम करने के लिए दिल्ली में राजघाट कॉलोनी स्थित गांधी स्मारक निधि को मैंने अपना ठिकाना बनाया तो सबसे नजदीक उपलब्ध जिस दूसरे परिचित व्यक्ति का ख्याल आया वे डॉ हरीश भल्ला थे. डॉ भल्ला तब राजघाट कॉलोनी से सिर्फ पंद्रह मिनिट की पैदल दूरी पर स्थित पंत हॉस्पिटल में कार्यरत थे. डॉ वैदिक तब दूर सफदरजंग एंक्लेव में रहते थे.
इंदौर मेडिकल कॉलेज के एक चर्चित छात्र नेता थे डॉ. भल्ला
डॉ भल्ला से जुड़ी यादों को 1971 से भी पीछे ले जाना हो तो इंदौर मेडिकल कॉलेज के एक ऐसे व्यक्तित्व के रूप में छवि मन में उभरती है, जो कलरफुल शर्ट्स पहने हुए घूमता था और एक चर्चित छात्र नेता के तौर पर कॉलेज और जिला प्रशासन की नाक में दम किए रहता था. मेडिकल कॉलेज में हरीश भल्ला की तूती बोलती थी. कॉलेज का प्रिंस हॉस्टल जिसकी रियासत थी. इंदौर के निकट रतलाम जिले के छोटे से शहर जावरा से निकलकर पहले इंदौर और फिर राजधानी में ‘दिल्ली के सांस्कृतिक जार ’(Cultural Czar of Delhi) के रूप में स्वयं को स्थापित करने वाले डॉ भल्ला ने अपने घर का नाम ही ‘जावरा हाउस’ रखा हुआ था. ‘हुसैन टैकरी’ के लिए मशहूर जावरा ब्रिटिश भारत में जावरा रियासत की राजधानी था.
डॉ भल्ला से जुड़ा जावरा का एक अन्य परिचय यह है कि पंडित जवाहर नेहरू के निकटस्थ रहे कश्मीरी राजनेता और 1957 से 1962 तक मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री रहे डॉ कैलाशनाथ काटजू का जन्म भी जावरा में ही हुआ था. जावरा से लगा मंदसौर डॉ काटजू का चुनाव क्षेत्र था. डॉ. काटजू के मुख्यमंत्रित्वकाल में पंडित नेहरू ने जावरा की यात्रा भी की थी. उस दौरान हुए एक कार्यक्रम में तब स्कूली छात्र हरीश भल्ला ने एक सराहनीय सांस्कृतिक प्रस्तुति भी दी थी. जावरा के कारण डॉ भल्ला काटजू परिवार के सभी सदस्यों के साथ अंत तक जुड़े रहे. सांसद विवेक तनखा के साथ तो वे कई संस्थाओं और गतिविधियों में संबद्ध थे.
डॉ. भल्ला से मिलने का ठिकाना था इंडिया इंटरनेशनल सेंटर
दिल्ली में प्रसाद नगर स्थित डॉ भल्ला का छोटा सा फ्लैट मालवा के लोगों के लिए सराय था और लोदी रोड स्थित प्रतिष्ठित इंडिया इंटरनेशनल सेंटर बाहर से मिलने पहुँचे लोगों से मिलने का ठिकाना. वे दिल्ली में मालवा की कला-संस्कृति और संगीत की धड़कन थे. मेडिकल, राजनीति और सांस्कृतिक क्षेत्रों से जुड़ा मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ का ऐसा कोई महत्वपूर्ण व्यक्ति नहीं था जो डॉ भल्ला के संपर्क में नहीं आया हो.
संगीत के क्षेत्र में नाम कमाने वाली भारत और पाकिस्तान की ऐसी कोई हस्ती नहीं थी, जिससे डॉ भल्ला के आत्मीय संबंध नहीं रहे हों. ग़ुलाम अली को मित्रों ने उनके घर की महफ़िलों में सुना है. चार दशक होने आए डॉ भल्ला के हवाले से लोक गायिका रेशमा के साथ मैंने खुद इंदौर में एक लंबी बातचीत अपने अंग्रेजी अखबार ‘फ्री प्रेस जर्नल’ के लिए की थी.
शास्त्रीय संगीत की प्रसिद्ध गायिका शुभ मुदगल तो डॉ भल्ला को बड़ा भाई मानती थीं और नवोदित कलाकारों को मंच और आवाज देने के लिए उनके साथ मिलकर ‘इंटरनेशनल मेलोडी फाउंडेशन’ की स्थापना की थी.
डॉ हरीश भल्ला और भी बहुत कुछ थे, बहुत कुछ करते थे, काफी कुछ करना चाहते थे. सब कुछ दूसरों के लिए, अपने लिए न तो किसी सम्मान की मांग की और न किसी पुरस्कार के लिए संघर्ष किया. जीवन भर दूसरों के लिए ही सिफारिशें करते रहे, लड़ते रहे. मेडिकल कौंसिल ऑफ इंडिया में भ्रष्टाचार के खिलाफ उनकी अदालती लड़ाई तो तब देश भर में चर्चा का विषय बन गई थी.
नशामुक्ति के लिए किया काम
डॉ भल्ला मूलतः एक मनोचिकित्सक थे. इस नाते वे एक बड़ी संख्या में ऐसे मरीजों के संपर्क में आए जो दिल्ली की गलियों में चलने वाले नशे के अवैध व्यापार के शिकार हो रहे थे. ऐसे लोगों की व्यथा का अध्ययन कर उन्होंने नशामुक्ति के लिए काम किया. इस दिशा में उनका सबसे बड़ा योगदान दूरदर्शन के लिए ‘ अंधी गलियाँ ‘ नामक शृंखला की प्रस्तुति था, जिसमें नशे के व्यापार और उससे पीड़ित लोगों की सच्ची कहानियों को उन्होंने देश के सामने उजागर किया.
ऐसे याद आएंगे डॉ. भल्ला
डॉ भल्ला की कमी उन तमाम स्नेहियों को अब खलने वाली है, जो राजधानी पहुँचते ही पहला फोन उन्हें करके कहते थे : ‘भैया मैं दिल्ली पहुँच गया हूँ. मुलाकात कब और कहाँ हो सकती है?’ शेर उर्दू का यह है कि शमा हर रंग में जलती है सहर होने तक, डॉ भल्ला ऐसे परवाने थे जो जिंदगी की शाम होने तक अपने आपको हर रंग में जलाते रहे. डॉ भल्ला के बिना दिल्ली में इंदौर और मालवा की सांस्कृतिक खुशबू की कल्पना नहीं की जा सकेगी.
लेखक-श्रवण गर्ग
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