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'क्लाइमेट जस्टिस' केवल कानूनी विश्लेषण नहीं, प्रकृति के प्रति हमारी जिम्मेदारी का दस्तावेज: राजीव

राजीव मलिक ने पुस्तक पर अपनी प्रतिक्रिया देते हुए कहा, यह पुस्तक अंतरात्मा की ऐसी कृति, जिसे कानून की भाषा में व्यक्त किया गया है.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 2 months ago

सुप्रीम कोर्ट के अधिवक्ता और ट्रस्ट लीगल, एडवोकेट्स एंड सॉलिसिटर्स के संस्थापक एवं मैनेजिंग पार्टनर सुधीर मिश्रा की बहुप्रतीक्षित पुस्तक ‘Climate Justice – Celebrating 75 Years of Supreme Court of India: 75 Judgments that Built Climate Jurisprudence in India’ का नई दिल्ली में भव्य विमोचन हुआ. इस पुस्तक विमोचन कार्यक्रम में बिजनेसवर्ल्ड के चेयरमैन व एडिटर इन चीफ डॉ. अनुराग बत्रा,  LG Electronics India (नोएडा मैन्युफैक्चरिंग) में लीगल लीडर व साइबर लॉ, मध्यस्थता, वाणिज्यिक विवाद और बौद्धिक संपदा अधिकारों के विशेषज्ञ राजीव मलिक सहित कई बड़ी हस्तियां शामल रहीं. पर्यावरणीय न्याय और जलवायु कानून पर केंद्रित इस पुस्तक को कानूनी और कॉर्पोरेट जगत से खूब सराहना मिल रही है. 

पुस्तक पर अपनी प्रतिक्रिया देते हुए राजीव मलिक ने कहा, यह पुस्तक अंतरात्मा की ऐसी कृति, जिसे कानून की भाषा में व्यक्त किया गया है. राजीव मलिक ने कहा कि पुस्तक के लेखक सुधीर मिश्रा ने इसमें केवल कानूनी विद्वता का प्रदर्शन नहीं किया है, बल्कि एक ऐसे विधि-व्यवसायी की समझ भी प्रस्तुत की है जो अदालत में उन तत्वों की ओर से खड़ा होता है जो स्वयं अपनी बात नहीं कह सकते. उनके अनुसार, पुस्तक में शामिल 75 फैसले केवल न्यायिक मील के पत्थर नहीं हैं, बल्कि ऐसे अवसर हैं जब कानून ने व्यापक नैतिक मूल्यों को अपने दायरे में समाहित किया.

उन्होंने कहा कि यह पुस्तक याद दिलाती है कि पर्यावरणीय न्याय केवल कानूनों और नजीरों का विषय नहीं है, बल्कि उस दुनिया के प्रति हमारी सामूहिक जिम्मेदारी का प्रश्न है, जिसे हम विरासत में प्राप्त करते हैं और आने वाली पीढ़ियों के लिए छोड़कर जाते हैं.

पर्यावरण न्याय को बताया नैतिक दायित्व

राजीव मलिक के अनुसार, पुस्तक का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष यह है कि यह पर्यावरण संरक्षण को केवल कानूनी विमर्श तक सीमित नहीं रखती, बल्कि उसे सामाजिक और नैतिक जिम्मेदारी के रूप में भी प्रस्तुत करती है. उन्होंने कहा कि किसी भी कानूनी लेखक के लिए इससे बड़ा सम्मान नहीं हो सकता कि उसकी रचना केवल विश्लेषण तक सीमित न रहकर व्यापक चिंतन का आधार बने.

कविता 'इम्तिहान' के माध्यम से की सराहना

पुस्तक से प्रेरित होकर राजीव मलिक ने "इम्तिहान" शीर्षक से एक कविता भी लिखी, जिसमें उन्होंने प्रकृति, न्याय और मानवीय जिम्मेदारी के संबंध को रेखांकित किया. कविता की कुछ प्रमुख पंक्तियां हैं-

जब हवाओं में जहर घुला,
जब नदियों ने नीर नहीं, नीरवता बहाई,
जब दरख़्तों को दुआओं की
जरूरत पड़ने लगी.

तब किसी ने शोर नहीं किया,
धीर रखा.

फिर एक विचार परवान चढ़ा.

कि मुक़दमे केवल इंसानों के नहीं होते,
कभी-कभी मौसम भी फरियादी होते हैं.

कभी कोई नदी
अपने किनारों की तरफ़ से अर्जी देती है.

कभी कोई जंगल
पत्तों की भाषा में पैरवी करता है.

कभी कोई पर्वत
अपनी खामोशी से गवाही देता है.

ये पचहत्तर फैसले.
महज फैसले नहीं,
जिनमें इंसान ने पहली बार
खुद से पूछा-

"धरती हमारी विरासत है,
या आने वाली नस्लों की अमानत?"

यही सवाल
इंसाफ को इबादत से जोड़ता है.

क्योंकि दरख़्त लगाना इंसानियत है,
पर नदी में माँ का स्वर सुनना रूहानियत है.

नदी की हिफाजत नीति है,
पर नदी से रिश्ता जोड़ना रूहानियत है.

और शायद इसीलिए,
कुछ लोग केस नहीं लड़ते,
वे करुणा को क़ानून की भाषा देते हैं.

वे दलील नहीं देते,
वे आने वाले कल की साँसों को
आवाज देते हैं.

आज जब यह सफर
एक किताब का रूप लेकर हमारे सामने है,
तो यह केवल फैसलों का संकलन नहीं,
कुदरत को बचाने की कवायद है.

यह स्मृति का संरक्षण है.
और स्मृति से बड़ा कोई न्याय नहीं.

"सु" का सुकून,
"धीर" का ध्यान,
जब दोनों मिल जाएँ,
तो जन्म लेता है
एक सुधीर,

जो केवल इंसान नहीं,
एक विचार बन जाता है.

अंत में बस इतना ही कहूँगा-

नदी ने न फरियाद लिखी,
न दरख्यो ने बयान दिया,
इंसान की खातिर कुदरत ने,
इंसान को इम्तिहान दिया.

और सुधीर भाई, इस इम्तिहान में आप सफल हुए.

मलिक ने कहा कि यह पुस्तक केवल न्यायिक फैसलों का संकलन नहीं है, बल्कि प्रकृति संरक्षण की दिशा में एक महत्वपूर्ण बौद्धिक प्रयास है. उनके अनुसार, यह कृति जलवायु न्याय, पर्यावरणीय अधिकारों और भविष्य की पीढ़ियों के प्रति हमारी जिम्मेदारियों पर गंभीर विमर्श को आगे बढ़ाने का काम करेगी.

बता दें, राजीव मलिक वर्तमान मेंतथा आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और विधि के क्षेत्र में भी सक्रिय रूप से विचार प्रस्तुत करते रहे हैं.


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