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ग्रामीण भारत, सांस्कृतिक विरासत और राष्ट्र निर्माण की नई कथा ‘उड़ चल अपने देस’

रक्षा मंत्रालय में निदेशक अभिषेक चौहान ने अपनी नई पुस्तक 'उड़ चल अपने देस' के माध्यम से अपने अनुभवों, सामाजिक अवलोकनों और सांस्कृतिक सरोकारों को अभिव्यक्त करने का प्रयास किया है.

रितु राणा 2 hours ago

ग्रामीण भारत की बदलती तस्वीर, इतिहास और सांस्कृतिक विरासत के प्रति बढ़ती उदासीनता, पर्यावरण संरक्षण की आवश्यकता, मानसिक स्वास्थ्य की चुनौतियाँ और राष्ट्र निर्माण में आम नागरिक की भूमिका, ये सभी विषय अभिषेक चौहान की पुस्तक ‘उड़ चल अपने देस’ के केंद्र में हैं. भारतीय राजस्व सेवा (IRS) के आयुक्त स्तर के अधिकारी तथा वर्तमान में रक्षा मंत्रालय में निदेशक की भूमिका निभा रहे अभिषेक चौहान ने अपने अनुभवों, सामाजिक अवलोकनों और सांस्कृतिक सरोकारों को इस पुस्तक के माध्यम से अभिव्यक्त करने का प्रयास किया है.

मध्य प्रदेश के भिंड जिले में पालन-पोषण व प्रारंभिक शिक्षा प्राप्त करने वाले अभिषेक चौहान का बचपन चंबल-यमुना दोआब के सामाजिक और सांस्कृतिक परिवेश में बीता. प्रकृति, भारतीय दर्शन, ग्रामीण जीवन और सामाजिक चेतना उनकी इस पुस्तक के प्रमुख विषय हैं. उनकी नई पुस्तक ‘उड़ चल अपने देस’ पर BW हिन्दी की वरिष्ठ संवाददाता रितु राणा ने उनसे विस्तार से बातचीत की. इस चर्चा में पुस्तक की प्रेरणा, इतिहास और साहित्य के संबंध, युवा पीढ़ी के लिए संदेश, पर्यावरण संरक्षण, मानसिक स्वास्थ्य, राष्ट्र निर्माण और लेखन की यात्रा जैसे कई महत्वपूर्ण विषयों पर खुलकर संवाद हुआ. प्रस्तुत हैं बातचीत के प्रमुख अंश:

प्रश्न: आपकी पुस्तक ‘उड़ चल अपने देश’ लिखने की प्रेरणा क्या थी? क्या इसके पीछे कोई व्यक्तिगत अनुभव या ऐतिहासिक घटना रही है?

अभिषेक चौहान: इस प्रश्न का उत्तर कई स्तरों पर मौजूद है. यदि संक्षेप में कहूँ तो इस पुस्तक की प्रेरणा मेरे व्यक्तिगत अनुभवों, अपने क्षेत्र के प्रति गहरे लगाव और इतिहास व संस्कृति के प्रति मेरी स्वाभाविक रुचि से मिली है.

मेरा बचपन ब्रज-बुंदेलखंड क्षेत्र में बीता है. उस क्षेत्र की मिट्टी, वहां के लोकजीवन, लोगों की सोच, उनकी जीवनशैली और सांस्कृतिक परंपराओं ने मेरे व्यक्तित्व के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है. एक सरकारी सेवक के रूप में मैं देश की सेवा कर रहा हूँ, लेकिन मेरे मन में हमेशा यह प्रश्न उठता रहा कि जिस भूमि ने मुझे संस्कार दिए, जिस समाज ने मुझे गढ़ा, उसके प्रति मेरा योगदान क्या है.

यही विचार धीरे-धीरे इस पुस्तक की प्रेरणा बन गया. बचपन में सुनी हुई कहानियाँ, लोककथाएँ, लोगों के संघर्ष, उनकी संवेदनाएँ और समय के साथ देखे गए सामाजिक परिवर्तन मेरे मन में लगातार जमा होते रहे. जब मैंने इन अनुभवों को एक व्यापक दृष्टिकोण से देखना शुरू किया, तब लगा कि इन्हें केवल स्मृतियों तक सीमित नहीं रखना चाहिए, बल्कि आने वाली पीढ़ियों तक भी पहुँचाना चाहिए.

जहाँ तक ऐतिहासिक संदर्भों की बात है, इतिहास ने भी इस पुस्तक की संरचना में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है. मेरा मानना है कि किसी भी समाज को समझने के लिए उसकी ऐतिहासिक स्मृतियों और सांस्कृतिक विरासत को समझना आवश्यक है. इसलिए पुस्तक में इतिहास, लोकविश्वास और समकालीन यथार्थ को एक साथ पिरोने का प्रयास किया गया है.

मेरा उद्देश्य केवल एक कथा लिखना नहीं था, बल्कि उस सांस्कृतिक चेतना को संरक्षित करना था जो धीरे-धीरे आधुनिक जीवन की गति में कहीं पीछे छूटती जा रही है.

पुस्तक में कई पात्र ऐसे हैं जिनमें एक नहीं, बल्कि अनेक वास्तविक व्यक्तियों की विशेषताओं को समाहित किया गया है. मेरा उद्देश्य किसी व्यक्ति विशेष का चित्रण करना नहीं था, बल्कि समाज के विभिन्न चरित्रों और प्रवृत्तियों को सामने लाना था. इसलिए पुस्तक में पाठकों को यथार्थ भी मिलेगा और साहित्यिक कल्पना का विस्तार भी.

प्रश्न: पुस्तक के पात्र और घटनाएँ वास्तविकता से कितनी प्रेरित हैं और इसमें कल्पना का कितना विस्तार है?

अभिषेक चौहान: किसी भी लेखक की सबसे बड़ी पूंजी उसके अनुभव होते हैं. व्यक्ति अपने आसपास के लोगों, परिस्थितियों और समाज से जो कुछ सीखता है, वही उसके लेखन का आधार बनता है. इसलिए इस पुस्तक के अधिकांश भाव, परिस्थितियाँ और अनुभव वास्तविक जीवन से प्रेरित हैं. हालाँकि साहित्य केवल दस्तावेजीकरण नहीं होता. यदि लेखक हर व्यक्ति और घटना को ज्यों-का-त्यों लिख दे तो वह साहित्य नहीं, बल्कि विवरण मात्र रह जाएगा. इसलिए रचनात्मक स्वतंत्रता की भी आवश्यकता होती है.

इस पुस्तक में कई पात्र ऐसे हैं जिनमें एक से अधिक वास्तविक व्यक्तियों के गुणों का समावेश किया गया है. किसी पात्र की संवेदनशीलता एक व्यक्ति से प्रेरित हो सकती है, उसकी जीवन-दृष्टि किसी दूसरे से और उसका संघर्ष किसी तीसरे व्यक्ति से. इस प्रकार कई वास्तविक अनुभवों को एक पात्र या एक घटना में समेटा गया है.

मैं कहूँगा कि पुस्तक का भाव और उसकी आत्मा पूरी तरह वास्तविक है, लेकिन उसे साहित्यिक रूप देने के लिए कल्पना और रचनात्मक संरचना का सहारा लिया गया है. यही कारण है कि पाठकों को इसमें अपने जीवन और अपने आसपास के समाज की झलक दिखाई दे सकती है.

प्रश्न: आपने पुस्तक के कुछ अंशों को AI आधारित वीडियो के रूप में प्रस्तुत किया है. क्या आपको लगता है कि AI साहित्य को नई पीढ़ी तक पहुँचाने का प्रभावी माध्यम बन सकता है?

अभिषेक चौहान: बिल्कुल. मैं मानता हूँ कि समय के साथ संवाद के माध्यम बदलते हैं और साहित्य को भी बदलते समय के अनुरूप नए माध्यमों को अपनाना चाहिए. आज की पीढ़ी सूचना और तकनीक के ऐसे दौर में जी रही है जहाँ दृश्य और श्रव्य माध्यमों का प्रभाव अत्यधिक बढ़ गया है. पुस्तक पढ़ने की आदत अभी भी मौजूद है, लेकिन उसकी प्रकृति बदल रही है. युवा वर्ग कम समय में अधिक सामग्री ग्रहण करना चाहता है.

मैंने अपने आसपास भी देखा है कि हिंदी भाषी परिवारों में पले-बढ़े बच्चे भी धीरे-धीरे हिंदी साहित्य से दूर होते जा रहे हैं. इसका अर्थ यह नहीं है कि उनकी रुचि समाप्त हो गई है, बल्कि माध्यम बदल गए हैं. ऐसे में यदि साहित्य को ऑडियो-विज़ुअल स्वरूप में प्रस्तुत किया जाए तो वह अधिक सहजता से लोगों तक पहुँच सकता है.

AI इस दिशा में एक महत्वपूर्ण साधन बन सकता है. यदि किसी पुस्तक के विचार, पात्र और भावनाएँ दृश्य माध्यम के जरिए पाठकों तक पहुँचें तो वे उसे अधिक आसानी से समझ सकते हैं और उससे जुड़ाव महसूस कर सकते हैं. मेरा मानना है कि AI साहित्य का विकल्प नहीं, बल्कि उसका विस्तार है. यह नई पीढ़ी को पुस्तक तक लाने का एक प्रभावी पुल बन सकता है.

प्रश्न: ‘उड़ चल अपने देश’ शीर्षक अपने आप में भावनात्मक और देशभक्ति की भावना जगाता है. पाठकों के लिए इसका मूल संदेश क्या है?

अभिषेक चौहान: मेरे लिए ‘देश’ केवल एक भौगोलिक सीमा नहीं है. देश उन लोगों, संस्कृतियों, मूल्यों और स्मृतियों का समुच्चय है जो हमें हमारी पहचान देते हैं. आज अक्सर युवाओं के मन में यह प्रश्न होता है कि वे देश की सेवा कैसे कर सकते हैं. बहुत से लोग यह मान लेते हैं कि राष्ट्र निर्माण केवल राजनेताओं, बड़े उद्योगपतियों, सैन्य अधिकारियों या आर्थिक रूप से सक्षम लोगों की जिम्मेदारी है. मैं इस धारणा से सहमत नहीं हूँ.

मेरा मानना है कि राष्ट्र निर्माण का आरंभ व्यक्ति से होता है. यदि कोई शिक्षक ईमानदारी से पढ़ाता है, कोई किसान पूरी निष्ठा से खेती करता है, कोई सरकारी कर्मचारी अपने दायित्वों का पालन करता है और कोई नागरिक अपने सामाजिक कर्तव्यों को समझता है, तो वह भी उतनी ही महत्वपूर्ण राष्ट्र सेवा कर रहा है.

इस पुस्तक के माध्यम से मैं यही संदेश देना चाहता हूँ कि देशभक्ति केवल भावनात्मक नारा नहीं, बल्कि दैनिक जीवन में किए जाने वाले छोटे-छोटे जिम्मेदार कार्यों का नाम है. जब प्रत्येक व्यक्ति अपने हिस्से की जिम्मेदारी समझेगा, तभी एक मजबूत और विकसित राष्ट्र का निर्माण संभव होगा.

प्रश्न: आपने पुस्तक में इतिहास के अनेक संदर्भों का उल्लेख किया है. इसके पीछे क्या उद्देश्य रहा?

अभिषेक चौहान: मेरा मानना है कि इतिहास केवल अतीत की घटनाओं का संग्रह नहीं, बल्कि किसी समाज की सामूहिक स्मृति और उसकी सांस्कृतिक चेतना का आधार होता है. इसी सोच के साथ मैंने पुस्तक में विभिन्न ऐतिहासिक संदर्भों, पात्रों और प्रसंगों का उल्लेख किया है.

पुस्तक में जहाँ-जहाँ आवश्यकता महसूस हुई, वहाँ बुद्धकाल, महाभारतकाल, कालिदास के युग तथा भारतीय सांस्कृतिक परंपरा से जुड़े अनेक संदर्भों को कथा के भीतर स्वाभाविक रूप से पिरोने का प्रयास किया गया है. मैंने 'वंदे मातरम्' और उससे जुड़े साहित्यिक स्रोतों का भी उल्लेख किया है, क्योंकि अक्सर हम कुछ ऐतिहासिक तथ्यों को सामान्य ज्ञान के रूप में तो जानते हैं, लेकिन उनके पीछे की पूरी कहानी जानने का प्रयास नहीं करते.

दरअसल मेरा उद्देश्य पाठकों को इतिहास पढ़ाना नहीं था, बल्कि उनकी जिज्ञासा को जागृत करना था. यदि कोई पाठक कहानी पढ़ते समय किसी ऐतिहासिक पात्र, घटना या ग्रंथ का उल्लेख देखकर उसके बारे में आगे जानने की इच्छा महसूस करे, तो मैं इसे अपनी सफलता मानूँगा. आज AI, इंटरनेट और डिजिटल संसाधनों के दौर में जानकारी तक पहुँचना पहले से कहीं अधिक आसान है. ऐसे में साहित्य पाठकों को इतिहास और संस्कृति की ओर प्रेरित करने का एक प्रभावी माध्यम बन सकता है.

मैंने यह भी महसूस किया है कि नई पीढ़ी के एक वर्ग में इतिहास के प्रति उदासीनता बढ़ रही है. अक्सर यह तर्क सुनने को मिलता है कि जो बीत गया, उसके बारे में जानकर क्या लाभ. लेकिन मेरा मानना है कि इतिहास कभी निरर्थक नहीं होता. वह हमें बताता है कि किन परिस्थितियों में कौन-से निर्णय लिए गए, उनके परिणाम क्या रहे, और उनसे वर्तमान के लिए क्या सीख ली जा सकती है. इतिहास हमें केवल अतीत नहीं बताता, बल्कि भविष्य के प्रति भी सजग बनाता है.

इसीलिए मैंने इतिहास को पुस्तक में अलग विषय की तरह प्रस्तुत नहीं किया, बल्कि उसे कथा का स्वाभाविक हिस्सा बनाया है, ताकि पाठक मनोरंजन के साथ-साथ अपनी सांस्कृतिक विरासत से भी जुड़ सकें. यदि इस पुस्तक के माध्यम से पाठकों में इतिहास, साहित्य और अपनी जड़ों को जानने की थोड़ी-सी भी रुचि पैदा होती है, तो मैं अपने प्रयास को सार्थक मानूँगा.

प्रश्न: क्या पुस्तक के ऐतिहासिक संदर्भ पूरी तरह तथ्यात्मक हैं या उनमें साहित्यिक कल्पना का भी समावेश है?

अभिषेक चौहान: इतिहास से जुड़े सभी संदर्भों का आधार वास्तविक घटनाएँ, पात्र और परंपराएँ हैं. हालाँकि यह कोई इतिहास की पुस्तक नहीं है, बल्कि एक साहित्यिक कृति है. इसलिए कथा की आवश्यकता के अनुसार कुछ प्रसंगों को प्रतीकात्मक और साहित्यिक रूप में प्रस्तुत किया गया है. मैंने यथार्थ, लोकस्मृतियों, सुनी-सुनाई बातों और अपनी कल्पना, इन सभी का संतुलित उपयोग किया है, ताकि कहानी प्रभावी भी बने और उसका मूल संदेश भी पाठकों तक पहुँच सके.

प्रश्न: आपकी पुस्तक में ग्रामीण भारत का चित्रण काफी प्रमुख दिखाई देता है. इसके पीछे क्या सोच रही?

अभिषेक चौहान: मेरी परवरिश जिस सामाजिक और सांस्कृतिक परिवेश में हुई, उसका प्रभाव स्वाभाविक रूप से मेरे लेखन में दिखाई देता है. मैंने ग्रामीण भारत के उन अनुभवों, मान्यताओं, संघर्षों और विशेषताओं को सहेजने का प्रयास किया है, जिन्हें मैंने स्वयं देखा, सुना और महसूस किया है.

मेरा विश्वास है कि बदलते समय में बहुत-सी सामाजिक स्मृतियाँ धीरे-धीरे विलुप्त हो जाती हैं. साहित्य उन्हें संरक्षित करने का एक महत्वपूर्ण माध्यम है. इसलिए मैंने ग्रामीण जीवन के कुछ ऐसे पहलुओं को कथा में स्थान दिया है, जो आने वाली पीढ़ियों के लिए उस दौर का एक सांस्कृतिक दस्तावेज बन सकें.

प्रश्न: क्या आप अपनी पुस्तक को केवल एक उपन्यास मानते हैं या सामाजिक दस्तावेज भी?

अभिषेक चौहान: मेरे लिए यह केवल एक कहानी नहीं है. मैं इसे अपने समय, समाज और परिवेश के कुछ महत्वपूर्ण अनुभवों को दर्ज करने का प्रयास मानता हूँ. निश्चित रूप से यह एक साहित्यिक कृति है, लेकिन इसके भीतर सामाजिक यथार्थ, सांस्कृतिक स्मृतियाँ और सामुदायिक अनुभव भी मौजूद हैं.

मैं यह दावा नहीं करूँगा कि यह किसी कालखंड का संपूर्ण दस्तावेज है, क्योंकि ऐसा कोई भी लेखक नहीं कर सकता. लेकिन मैंने अपने सीमित अनुभवों और समझ के आधार पर उस समय और समाज की कुछ महत्वपूर्ण झलकियों को सहेजने का ईमानदार प्रयास अवश्य किया है.

प्रश्न: आप रक्षा मंत्रालय में निदेशक जैसे महत्वपूर्ण पद पर कार्यरत हैं. इतनी व्यस्त जिम्मेदारियों के बीच लेखन के लिए समय कैसे निकालते हैं?

अभिषेक चौहान: मैं हमेशा एक बात में विश्वास करता हूँ कि *“जहाँ इच्छा होती है, वहाँ रास्ता भी निकल आता है.”* वास्तव में समय किसी के पास अतिरिक्त नहीं होता. हम सभी को दिन के वही 24 घंटे मिलते हैं, अंतर केवल इस बात का होता है कि हम अपनी प्राथमिकताएँ कैसे निर्धारित करते हैं.

मेरे लिए लेखन कोई अचानक शुरू हुआ शौक नहीं है, बल्कि यह आत्म-अभिव्यक्ति और समाज से संवाद का एक माध्यम रहा है. जब आपके भीतर कोई विचार लंबे समय तक आकार ले रहा हो और आप उसे शब्दों में ढालने की जिम्मेदारी महसूस करते हों, तब आप स्वाभाविक रूप से उसके लिए समय निकाल लेते हैं.

इस पुस्तक को पूरा करने में मुझे एक वर्ष से अधिक का समय लगा. इस दौरान कार्यालय की जिम्मेदारियाँ अपनी जगह थीं और उनका निर्वहन हमेशा मेरी प्राथमिकता रहा. लेखन का अधिकांश कार्य मैंने अपने व्यक्तिगत समय में किया. निश्चित रूप से इसके लिए कुछ व्यक्तिगत सुविधाओं और अवकाश के क्षणों में समझौता करना पड़ा, लेकिन जब किसी कार्य के पीछे स्पष्ट उद्देश्य और आंतरिक प्रतिबद्धता हो, तो वह बोझ नहीं लगता.

मेरा मानना है कि यदि किसी व्यक्ति के पास कोई सार्थक लक्ष्य है, तो समय कभी सबसे बड़ी बाधा नहीं बनता. अनुशासन, निरंतरता और धैर्य के साथ दोनों भूमिकाओं के बीच संतुलन बनाया जा सकता है. यही प्रयास मैंने भी किया है.

प्रश्न: क्या रक्षा मंत्रालय में काम करने के आपके अनुभवों का इस पुस्तक पर कोई प्रभाव पड़ा है?

अभिषेक चौहान: प्रत्यक्ष रूप से नहीं. रक्षा मंत्रालय देश के सबसे संवेदनशील मंत्रालयों में से एक है और मैंने पूरी सावधानी रखी है कि पुस्तक की कथा, पात्रों, घटनाओं या विचारों का मंत्रालय अथवा किसी सरकारी कार्यप्रणाली से कोई प्रत्यक्ष संबंध न स्थापित हो. पुस्तक का संसार पूरी तरह स्वतंत्र है और इसे उसी रूप में देखा जाना चाहिए.

हालाँकि, यदि व्यापक स्तर पर बात करें, तो किसी भी व्यक्ति के कार्यस्थल और अनुभव उसके दृष्टिकोण को प्रभावित करते हैं. रक्षा मंत्रालय में कार्य करते हुए देश, समाज और राष्ट्रीय हितों से जुड़े अनेक विषयों को निकटता से देखने और समझने का अवसर मिलता है. इससे राष्ट्र के प्रति जिम्मेदारी और व्यापक दृष्टि का भाव निश्चित रूप से मजबूत होता है.

लेकिन मैं यह भी स्पष्ट करना चाहूँगा कि देशप्रेम की भावना मेरे भीतर किसी पद या दायित्व के कारण नहीं आई. यह भावना मेरे संस्कारों, पारिवारिक परिवेश और सामाजिक अनुभवों का हिस्सा हमेशा से रही है. रक्षा मंत्रालय में कार्य करने से उस भावना को एक व्यापक परिप्रेक्ष्य अवश्य मिला है, परंतु पुस्तक की मूल प्रेरणा मेरे अपने सामाजिक, सांस्कृतिक और व्यक्तिगत अनुभवों से निकली है.

इसलिए यह कहना अधिक उचित होगा कि पुस्तक पर रक्षा मंत्रालय का प्रत्यक्ष प्रभाव नहीं है, लेकिन राष्ट्र, समाज और अपने परिवेश के प्रति जो संवेदनशीलता मेरे व्यक्तित्व का हिस्सा है, वह कहीं न कहीं पुस्तक के भावबोध में अवश्य दिखाई दे सकती है.

प्रश्न: आपकी पुस्तक में क्या कोई केंद्रीय नायक है, या आपने कथा को सामूहिक पात्रों के माध्यम से आगे बढ़ाया है?

अभिषेक चौहान: हाँ, पुस्तक में एक केंद्रीय पात्र अवश्य है, जिसका नाम ओमकार है. लेकिन मैं यह स्पष्ट करना चाहूँगा कि मैंने इस कथा को पारंपरिक अर्थों में ‘नायक-केंद्रित’ बनाने का प्रयास नहीं किया है.

मेरे विचार से समाज का निर्माण किसी एक व्यक्ति के प्रयासों से नहीं, बल्कि सामूहिक चेतना और समूह की शक्ति से होता है. इसलिए यद्यपि ओमकार कथा की वैचारिक धुरी है और घटनाओं को दिशा देता है, फिर भी मैं उसे अकेला नायक नहीं मानता. उसके साथ जुड़े लोग, उसके साथी और उसके विचारों को आगे बढ़ाने वाले सभी पात्र कथा के समान रूप से महत्वपूर्ण अंग हैं.

वास्तव में, मैंने पुस्तक में व्यक्तिवाद से अधिक संगठन और सामूहिकता की भावना को महत्व दिया है. इतिहास गवाह है कि कई बार नायक-पूजा अनजाने में अधिनायकवाद की ओर भी ले जाती है. इसलिए मैंने यह प्रयास किया है कि पाठक किसी एक व्यक्ति से अधिक उस विचार, उस समूह और उस सामाजिक चेतना को समझें, जो परिवर्तन का वास्तविक आधार बनती है. इस दृष्टि से देखें तो ओमकार एक पात्र मात्र नहीं, बल्कि एक विचार का प्रतिनिधि है, जबकि उसके साथ चलने वाले सभी लोग उस विचार को जीवंत बनाने वाली शक्ति हैं.

प्रश्न: यदि भविष्य में आपकी पुस्तक ‘उड़ चल अपने देश’ पर फिल्म या वेब सीरीज़ बनती है, तो आप ओमकार की भूमिका में किस अभिनेता को देखना चाहेंगे?

अभिषेक चौहान: यह एक रोचक प्रश्न है. सच कहूँ तो इस विषय पर मैंने कई बार विचार किया है और मित्रों के साथ भी चर्चा हुई है. जब मैं कॉलेज में था, तब फिल्म 'स्वदेस' ने मुझ पर गहरा प्रभाव छोड़ा था. उस फिल्म में जिस संवेदनशीलता, सामाजिक प्रतिबद्धता और देश के प्रति उत्तरदायित्व की भावना को प्रस्तुत किया गया, वह मेरे मन में आज भी कहीं न कहीं मौजूद है.

ओमकार का चरित्र भी कुछ हद तक उसी प्रकार का है, वह एक साथ आधुनिक भी है और अपनी जड़ों से जुड़ा हुआ भी. उसमें संवेदनशीलता है, नेतृत्व क्षमता है और समाज के प्रति उत्तरदायित्व का भाव भी है. इसलिए यदि मुझे किसी एक अभिनेता का नाम लेना हो, तो मैं शाह रुख खान को इस भूमिका के लिए उपयुक्त मानूँगा. हालाँकि आमिर खान जैसे कलाकार भी इस प्रकार के विचारप्रधान और सामाजिक सरोकारों वाले पात्रों को प्रभावशाली ढंग से निभाने की क्षमता रखते हैं. लेकिन यदि मेरी व्यक्तिगत पसंद पूछी जाए, तो ओमकार के चरित्र में मैं शाहरुख खान को देखना पसंद करूँगा, क्योंकि उनमें संवेदनशीलता और जनसरोकारों को अभिव्यक्त करने की एक विशिष्ट क्षमता है. हालाँकि अंततः यह निर्णय निर्देशक और निर्माता की रचनात्मक दृष्टि पर निर्भर करेगा.

प्रश्न: आपकी पुस्तक युवा पीढ़ी को क्या संदेश देती है?

अभिषेक चौहान: यह पुस्तक मुख्य रूप से युवा पीढ़ी को समर्पित है. मेरा मानना है कि किसी भी राष्ट्र का भविष्य उसके युवाओं की सोच, संवेदनशीलता और सामाजिक चेतना पर निर्भर करता है. इसलिए मैंने इस पुस्तक के माध्यम से युवाओं तक कुछ ऐसे संदेश पहुँचाने का प्रयास किया है, जो केवल व्यक्तिगत सफलता तक सीमित न रहकर समाज और राष्ट्र के व्यापक हित से भी जुड़े हों.

पुस्तक युवाओं को अपनी जड़ों, अपनी मिट्टी और अपनी सांस्कृतिक विरासत से जुड़े रहने का संदेश देती है. आधुनिकता और वैश्विक दृष्टिकोण आवश्यक हैं, लेकिन अपनी पहचान और अपने मूल स्रोतों को भूल जाना किसी भी समाज के लिए उचित नहीं है. मेरा विश्वास है कि जो व्यक्ति अपनी जड़ों से जुड़ा रहता है, वही भविष्य की ओर अधिक आत्मविश्वास के साथ बढ़ सकता है.

इसके साथ ही पुस्तक पर्यावरण के प्रति जागरूकता का भी संदेश देती है. हम अक्सर राष्ट्रसेवा को बहुत बड़े कार्यों से जोड़कर देखते हैं, जबकि अपने आसपास के समाज, प्रकृति और पर्यावरण के प्रति जिम्मेदारी निभाना भी राष्ट्र निर्माण का ही एक महत्वपूर्ण हिस्सा है. यदि प्रत्येक व्यक्ति अपने परिवेश के प्रति सजग हो जाए, तो बड़े परिवर्तन स्वतः संभव हो सकते हैं.

पुस्तक का एक महत्वपूर्ण पक्ष युवाओं के मानसिक स्वास्थ्य से भी जुड़ा है. आज के समय में तनाव, अकेलापन और अवसाद जैसी समस्याएँ तेजी से बढ़ रही हैं. मेरा मानना है कि समाज को ऐसे लोगों के प्रति अधिक संवेदनशील और सहायक बनने की आवश्यकता है. कई बार किसी व्यक्ति को केवल थोड़े से अपनत्व, संवाद और सहयोग की आवश्यकता होती है. यदि हम अपने आसपास के लोगों के प्रति मानवीय दृष्टिकोण अपनाएँ, तो अनेक समस्याओं को प्रारंभिक स्तर पर ही कम किया जा सकता है.

अंततः यह पुस्तक युवाओं को यह संदेश देती है कि राष्ट्र निर्माण केवल सरकारों या कुछ विशेष लोगों की जिम्मेदारी नहीं है. हर नागरिक, चाहे वह शिक्षक हो, किसान हो, व्यापारी हो, छात्र हो या किसी भी क्षेत्र में कार्यरत हो, अपने छोटे-छोटे सकारात्मक प्रयासों के माध्यम से देश के विकास में योगदान दे सकता है. जब व्यक्ति अपने समाज, पर्यावरण और लोगों के प्रति जिम्मेदारी महसूस करने लगता है, तभी वास्तविक अर्थों में राष्ट्र निर्माण की प्रक्रिया मजबूत होती है.

प्रश्न: आपकी पुस्तक ‘उड़ चल अपने देश’ कब पाठकों के लिए उपलब्ध होगी और उनसे आपकी क्या अपेक्षाएँ हैं?

अभिषेक चौहान: मेरी पुस्तक ‘उड़ चल अपने देस’ प्रकाशित हो चुकी है, केवल इसके विमोचन का इंतजार है और जून में ही इसका विमोचन हो जाएगा. मैं आपको बताना चाहूंगा कि एक लेखक के रूप में मेरी सबसे बड़ी अपेक्षा यही है कि पाठक इसे केवल एक कहानी के रूप में न पढ़ें, बल्कि इसके भीतर निहित विचारों, सामाजिक सरोकारों और अपने समाज व परिवेश के प्रति जिम्मेदारी के भाव को भी महसूस करें. यदि यह पुस्तक पाठकों को अपनी जड़ों, अपने समाज और अपने देश के प्रति थोड़ा अधिक सजग और संवेदनशील बना सके, तो मैं अपने लेखन को सार्थक मानूँगा.

निष्कर्ष

‘उड़ चल अपने देस’ केवल एक साहित्यिक कृति नहीं, बल्कि समाज, संस्कृति, पर्यावरण और राष्ट्र के प्रति नागरिक जिम्मेदारी का एक विचारोत्तेजक दस्तावेज भी है. पुस्तक के माध्यम से अभिषेक चौहान युवाओं को अपनी जड़ों, अपनी मिट्टी और सांस्कृतिक विरासत से जुड़े रहने का संदेश देते हैं. साथ ही वे मानसिक स्वास्थ्य के प्रति संवेदनशीलता, सामुदायिक सहयोग, पर्यावरण संरक्षण और राष्ट्र निर्माण में व्यक्तिगत योगदान की आवश्यकता को भी रेखांकित करते हैं.

लेखक का मानना है कि देशभक्ति केवल भावनात्मक अभिव्यक्ति नहीं, बल्कि अपने आसपास के समाज, लोगों और प्रकृति के प्रति जिम्मेदार व्यवहार में निहित है। इतिहास से सीख लेते हुए, वर्तमान चुनौतियों को समझते हुए और भविष्य के प्रति सजग रहते हुए ही एक मजबूत और विकसित राष्ट्र का निर्माण संभव है. ‘उड़ चल अपने देस’ इसी चेतना को जागृत करने का एक सार्थक प्रयास है, जो पाठकों को केवल कहानी नहीं, बल्कि अपने समाज और देश के प्रति एक नई दृष्टि भी प्रदान करती है.


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