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दोहरीघाट से दिल्ली, संस्कारों की विरासत’: संस्कारों और पारिवारिक मूल्यों की विरासत को नई पीढ़ी तक पहुंचाने का संदेश

यह पुस्तक केवल लेखक की व्यक्तिगत यात्रा नहीं, बल्कि पूर्वांचल की सांस्कृतिक विरासत, भारतीय पारिवारिक मूल्यों, माता-पिता के संघर्ष, संस्कारों और बदलते सामाजिक परिवेश के बीच मानवीय संवेदनाओं की कहानी को प्रस्तुत करती है.

रितु राणा 4 months ago

नई दिल्ली स्थित इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में 27 जून को कैनरा बैंक के पूर्व जनरल मैनेजर रवि प्रकाश जायसवाल की पुस्तक ‘दोहरीघाट से दिल्ली, संस्कारों की विरासत’ का विमोचन हुआ. यह पुस्तक केवल लेखक की व्यक्तिगत यात्रा नहीं, बल्कि पूर्वांचल की सांस्कृतिक विरासत, भारतीय पारिवारिक मूल्यों, माता-पिता के संघर्ष, संस्कारों और बदलते सामाजिक परिवेश के बीच मानवीय संवेदनाओं की कहानी को प्रस्तुत करती है. कार्यक्रम में BW बिजनेसवर्ल्ड एवं एक्सचेंज4मीडिया के चेयरमैन एवं एडिटर-इन-चीफ डॉ. अनुराग बत्रा, अयोध्या से आए पर्यटन मंत्रालय भारत सरकार में श्री राम सर्किट के चेयरमैन डॉ. राम अवतार शर्मा सहित साहित्य, मीडिया, बैंकिंग और सामाजिक क्षेत्र से जुड़े अनेक गणमान्य लोग उपस्थित रहे.  

पूर्वांचल की संस्कृति और पारिवारिक मूल्यों को समर्पित है यह पुस्तक

इस अवसर पर लेखक रवि प्रकाश जायसवाल ने कहा कि इस पुस्तक की परिकल्पना कई वर्षों से उनके मन में थी, लेकिन उसे शब्दों में ढालने का अवसर उन्हें सेवा निवृत्ति के बाद मिला.

उन्होंने कहा, "आज हम अपने नायकों को फिल्मों, राजनीति, खेल, साहित्य और समाज में तलाशते हैं, लेकिन हमारे सबसे बड़े नायक हमारे अपने घरों में होते हैं. मेरे लिए मेरे माता-पिता सबसे बड़े आदर्श, सबसे बड़े नायक और सबसे बड़े हस्ताक्षर रहे हैं. जिनकी छत्रछाया में हम पलते-बढ़ते हैं, उनसे ही जीवन के संस्कार और मूल्य प्राप्त करते हैं, लेकिन हम उन्हें नायक के रूप में स्वीकार करने का अवसर बहुत कम देते हैं."

उन्होंने कहा कि इस पुस्तक में वर्णित पात्र भले ही मेरे माता-पिता हों, लेकिन उनकी संवेदनाएं, संघर्ष, त्याग और संस्कार हर परिवार की कहानी हो सकते हैं. यदि पाठकों को इनमें अपने माता-पिता दिखाई दें, तो यही इस पुस्तक की सबसे बड़ी सफलता होगी. लेखक ने कहा कि उन्होंने पूर्वांचल के सामाजिक और सांस्कृतिक परिवेश को पुस्तक में विशेष स्थान दिया है.

उन्होंने कहा, "पूर्वांचल केवल एक भौगोलिक क्षेत्र नहीं, बल्कि संस्कारों, परंपराओं और मानवीय मूल्यों की भूमि है. दोहरीघाट केवल एक कस्बा नहीं, बल्कि सांस्कृतिक स्मृतियों, वैदिक परंपराओं और आस्था का केंद्र है. परिवेश बदल जाते हैं, परिवार बदल जाते हैं, भाषाएं बदल जाती हैं, लेकिन मनुष्य की संवेदनाएं और अनुभूतियां नहीं बदलतीं. यह पुस्तक किसी एक परिवार की नहीं, बल्कि भारतीय समाज की साझा स्मृतियों और मूल्यों की कहानी है."*

पुस्तक में लेखक ने अपनी माता पार्वती देवी के संघर्ष, त्याग और साहस को भी प्रमुखता से स्थान दिया है. उन्होंने कहा कि कठिन परिस्थितियों, सामाजिक मर्यादाओं और पारिवारिक जिम्मेदारियों के बीच एक महिला की करुणा, साहस और संस्कारों की शक्ति इस पुस्तक की मूल प्रेरणा है.

परिवार की सबसे बड़ी पूंजी माता-पिता द्वारा दिए गए संस्कार

डॉ. राम अवतार शर्मा ने पुस्तक की सराहना करते हुए कहा कि किसी भी परिवार की सबसे बड़ी पूंजी माता-पिता द्वारा दिए गए संस्कार होते हैं. उन्होंने कहा, "लेखक के परिवार को जो संस्कार मिले हैं, उनका सबसे बड़ा श्रेय माता-पिता को जाता है. इसके साथ ही दोहरीघाट की उस पावन भूमि को भी इसका श्रेय जाता है, जहां भगवान श्रीराम और भगवान परशुराम के मिलन की मान्यता है. जिस भूमि पर ऐसे आदर्शों की परंपरा रही हो, वहां के संस्कार पीढ़ियों तक दिखाई देते हैं."

उन्होंने कहा, "रवि प्रकाश जायसवाल ने यह पुस्तक किसी से सुनकर, पढ़कर या नकल करके नहीं लिखी है. यह उनके अपने जीवन, अपने अनुभवों और अपने हृदय की भावनाओं से निकली हुई रचना है. जो बातें हृदय से लिखी जाती हैं, वे लंबे समय तक समाज और आने वाली पीढ़ियों को प्रभावित करती हैं. पहले हमें स्वयं इस पुस्तक को पढ़ना चाहिए और फिर अपने बच्चों को इसे पढ़ने के लिए प्रेरित करना चाहिए."

'दोहरीघाट से दिल्ली' भारतीय पारिवारिक मूल्यों और संस्कारों का दस्तावेज 

कार्यक्रम को संबोधित करते हुए डॉ. अनुराग बत्रा ने कहा कि आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में लोग अपने माता-पिता, अपने मूल्यों और अपनी जड़ों से दूर होते जा रहे हैं. उन्होंने कहा, "‘दोहरीघाट से दिल्ली, संस्कारों की विरासत’ केवल एक पुस्तक नहीं, बल्कि भारतीय पारिवारिक मूल्यों और संस्कारों का दस्तावेज है. यदि दो या चार लोग भी इस पुस्तक को पढ़कर अपने माता-पिता के साथ अधिक समय बिताने लगें, उनकी सेवा और सम्मान करने लगें, तो यह पुस्तक अपने उद्देश्य में सफल होगी."

डॉ. बत्रा ने कहा कि किताबें जीवन बदलने की क्षमता रखती हैं. उन्होंने कहा, किताबें आपका जीवन बदल सकती हैं, जीवन में मैंने जो भी हासिल किया है, उसमें मेरे माता-पिता के आशीर्वाद, उनके संस्कार और पुस्तकों से मिली सीख का बड़ा योगदान है. सफलता का पूरा श्रेय हमें स्वयं को नहीं देना चाहिए, बल्कि अपने माता-पिता, दादा-दादी, गुरुओं और उन सभी लोगों को देना चाहिए, जिन्होंने हमारी सफलता की नींव रखी है."

उन्होंने जीवन में तीन H को महत्वपूर्ण बताते हुए कहा, "पहला Hope यानी आशा, दूसरा Hard Work यानी कठिन परिश्रम और तीसरा Humility यानी विनम्रता, यदि व्यक्ति के जीवन में ये तीनों गुण हों, तो वह किसी भी लक्ष्य को प्राप्त कर सकता है."

डॉ. बत्रा ने तीन G का भी उल्लेख करते हुए कहा, "पहला Gratitude यानी कृतज्ञता, जो हमें माता-पिता, गुरुओं, बड़ों और ईश्वर के प्रति आभार व्यक्त करना सिखाती है. दूसरा Grit यानी कठिन परिस्थितियों में भी डटे रहने की क्षमता और तीसरा Grace यानी जीवन में संतुलन, सहजता और ईश्वर की कृपा को स्वीकार करने का भाव. ये मूल्य व्यक्ति को न केवल सफल बनाते हैं, बल्कि उसे बेहतर इंसान भी बनाते हैं."

कार्यक्रम में उपस्थित अतिथियों ने पुस्तक को भारतीय परिवार व्यवस्था, सामाजिक स्मृतियों और सांस्कृतिक विरासत का महत्वपूर्ण दस्तावेज बताते हुए इसकी सराहना की. वक्ताओं ने कहा कि यह पुस्तक नई पीढ़ी को अपनी जड़ों, अपने परिवार और अपने संस्कारों से जोड़ने का महत्वपूर्ण माध्यम बनेगी.


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