होम / हेल्थ / ब्रांडेड दवाएं महंगी और जेनरिक दवाएं सस्ती क्यों होती हैं? समझिये इसके पीछे का खेल

ब्रांडेड दवाएं महंगी और जेनरिक दवाएं सस्ती क्यों होती हैं? समझिये इसके पीछे का खेल

जब तक कोई दवा सिर्फ एक कंपनी बेच रही होती है तो वो उसके दाम अपने हिसाब से रखती है, क्योंकि उसके मुकाबले कोई दूसरी कंपनी उस दवा को नहीं बेच रही होती है

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 3 years ago

नई दिल्ली: कभी आपने सोचा है कि ब्रांडेड दवाएं इतनी महंगी क्यों होती हैं, और वहीं दवाएं जब जेनरिक हो जाती हैं तो इतनी सस्ती क्यों मिलती हैं. मतलब एक ही दवा, एक ही सॉल्ट और कीमतों में कम से कम दोगुने से भी ज्यादा का अंतर. क्या ब्रांडेड दवाएं ज्यादा अच्छी होती हैं और जेनरिक दवाएं कम असरदार. क्या इन दोनों की क्वालिटी में कोई फर्क होता है. चलिये आज इसी गुत्थी को सुलझाते हैं. 

ब्रांडेड दवाएं क्यों महंगी होती हैं?
अमेरिका की Food and Drug Administration यानी FDA के मुताबिक जेनरिक दवाएं आमतौर पर ब्रांडेड दवाओं के मुकाबले करीब 85 परसेंट तक सस्ती हो सकती हैं. ब्रांडेड दवाएं क्यों महंगी होती हैं, इसकी पीछे कई कारण हैं. इसको एक-एक करके समझते हैं. 

1. रिसर्च पर भारी भरकम खर्च 
जब भी किसी बीमारी की दवा खोजी जाती है, उसके लिये कई सालों तक रिसर्च होती है, कई क्लीनिकल शोध होते हैं, जानवरों पर टेस्टिंग होती है, जिसकी लागत करोड़ों डॉलर में होती है. इसलिये जब भी कोई कंपनी इतनी भारी लागत के बाद कोई दवा बनाती है तो उसे पेटेंट करवाती है, उसको बनाने और बेचने का अधिकार कई सालों तक अपने पास रखती है ताकि उस दवा पर किये गए रिसर्च का खर्चा निकाल सके. एक जानकारी के मुताबिक किसी दवा को बनाने में 2.6 बिलियन डॉलर तक का खर्च आता है. इतना पैसा खर्च करने के बाद भी इस बात की कोई गारंटी नहीं होती है कि दवा मंजूर हो जाएगी, क्योंकि दवा के एक गलत असर से सारी मेहनत पर पानी फिर सकता है करोड़ डॉलर बर्बाद हो सकते हैं. इसलिये जब भी कोई दवा मंजूर होती है तो कंपनी उस दवा को पेटेंट करवाती है और आने वाली 20 सालों तक उस दवा को बेचने का एकाधिकार रखती है. इसके बाद ही दवा को दूसरी कंपनियों को बनाने की इजाजत होती है, लेकिन वो काफी सस्ती इसीलिए होती हैं क्योंकि उन्होंने इस दवा को बनाने में रिसर्च या टेस्टिंग पर कोई पैसा खर्च नहीं किया होता है, उन्हें फॉर्मूला पता है, सॉल्ट पता है और वो इसे आसानी से सिर्फ बनाकर बेच रही हैं और मुनाफा कमा रही हैं.

2. कंपटीशन बढ़ने से जेनरिक दवाएं सस्ती
जब तक कोई दवा सिर्फ एक कंपनी बेच रही होती है तो वो उसके दाम अपने हिसाब से रखती है, क्योंकि उसके मुकाबले कोई दूसरी कंपनी उस दवा को नहीं बेच रही होती है, लेकिन वही दवा जब जेनरिक हो जाती है तो उसे कई कंपनियां बेचती हैं, इससे बाजार में कंपटीशन बढ़ जाता है, और दवाओं के दाम कम हो जाते हैं. 
लोगों को ये भी पता होता है कि ये जेनरिक दवा है तो वो उसकी ब्रांडेड दवा लेने की बजाय जेनरिक दवा को खरीदते हैं, क्योंकि वो काफी सस्ती होती है.  

3. मार्केटिंग-ब्रांडिंग पर खर्च 
बड़ी बड़ी ब्रांडेड कंपनियां अपनी दवाओं की मार्केटिंग और ब्रांडिंग पर बहुत खर्च करती हैं. डॉक्टर्स और केमिस्ट्स के जरिये इन दवाओं को प्रमोट करने पर भी काफी खर्चा करती हैं, जिससे इसकी रिटेल कीमत बढ़ जाती है. 

ब्रांडेड दवाएं असरदार या जेनरिक 
अब सवाल उठता है कि क्या जेनरिक दवाएं भी ब्रांडेड दवाओं की तुलना में उतनी ही असरदार होती हैं, क्या जेनरिक दवाओं की क्वालिटी में कोई फर्क होता है. इसका जवाब है नहीं. जेनरिक दवाएं और ब्रांडेड दवाओं का फॉर्मूला एक ही होता है, लेकिन उनका आकार रंग, पैकेजिंग अलग हो सकते हैं. ड्रग प्राइस कॉम्पिटिशन एंड पेटेंट टर्म रिस्टोरेशन एक्ट 1984, जिसे हैच-वैक्समैन एक्ट के रूप में भी जाना जाता है, ये पेटेंट की अवधि खत्म होने के बाद कई ब्रांडेड दवाओं की जेनेरिक बिक्री की इजाजत देता है. किसी कंपनी को अगर किसी ब्रांडेड दवा को जेनरिक बिक्री की मंजूरी चाहिये तो ड्रग रेगुलेटर से मंजूरी लेनी होती है, कंपनी को सख्त मानकों का पालन करना होता है. यानी जब किसी ब्रांडेड दवा को जेनरिक की मंजूरी दी जाती है तो इस बात को सुनिश्चित किया जाता है कि उसकी शुद्धता, स्थिरता और क्वालिटी को लेकर किसी तरह का समझौता नहीं किया जाए. 

अमेरिकी स्वास्थ्य बीमा दावों के एक तुलनात्मक अध्ययन के दौरान, शोधकर्ताओं ने पाया कि पुरानी शारीरिक स्थितियों के लिए ब्रांडेड और जेनेरिक दवाओं के तुलनीय चिकित्सा परिणाम थे. उन्होंने जिन स्थितियों को देखा उनमें हाइपर टेंशन, डायबिटीज, ऑस्टियोपोरोसिस और मानसिक स्थिति जैसे चिंता और अवसाद शामिल थे.
हालांकि, एक दूसरी रिसर्च में सामने आया है कि जेनेरिक दवाओं का कार्डियोवैस्कुलर बीमारियों के लिए समान क्लीनिकल असर नहीं हो सकता. शोधकर्ताओं ने वैज्ञानिक डेटाबेस MEDLINE और EMBASE से रिपोर्ट का विश्लेषण किया. उन्होंने पाया कि 60% स्टडीज ने दवाओं के बीच कोई अंतर नहीं बताया, जेनेरिक दवा लेने वाले लोगों में अस्पताल के चक्कर लगाने का रिस्क ज्यादा था. हालांकि ये ध्यान रखना चाहिए कि ये सिर्फ एक को-रिलेशन है, इसका मतलब ये कतई नहीं कि जेनरिक दवाओं की वजह से अस्पतालों के चक्कर ज्यादा लगे.

अब ये कहना कि ब्रांडेड और जेनरिक दवाओं में कौन बेहतर है, इसके लिए अभी और शोध की जरूरत है, क्योंकि ज्यादातर मामलों में दोनों तरह की दवाओं का एकसमान असर देखा गया है. किसी व्यक्ति को जेनरिक दवाएं लेनी चाहिए या ब्रांडेड ये कई बातों पर निर्भर करता है. इसका सही फैसला मरीज की सेहत की स्थिति को देखते हुए हेल्थ प्रोफेशनल या डॉक्टर ही कर सकते हैं. डॉक्टर को दोनों तरह की दवाओं के लेकर चर्चा करनी चाहिये. 

 


टैग्स
सम्बंधित खबरें

सिर्फ 7 मिनट में फेफड़ों के कैंसर का इलाज, भारत में लॉन्च हुई दुनिया की पहली सबक्यूटेनियस इम्यूनोथेरेपी टिसेंट्रिक एससी

कंपनी का कहना है कि इस नई थेरेपी से मरीजों और उनके परिजनों को अस्पताल में कम समय बिताना पड़ेगा. साथ ही बार-बार लंबे सफर और उपचार से जुड़े अप्रत्यक्ष खर्चों में भी कमी आएगी.

15-May-2026

नर्सिंग शिक्षा में बड़े बदलाव की जरूरत, भारत का भविष्य अब पारंपरिक ट्रेनिंग से आगे

आज यानी 12 मई को अंतरराष्ट्रीय नर्स दिवस के अवसर पर विशेषज्ञों ने चिंता जताते हुए कहा, AI और आधुनिक प्रशिक्षण के बिना नर्सिंग शिक्षा अधूरी है.

12-May-2026

भारत के फार्मा-हेल्थकेयर डील्स Q1FY26 में स्थिर, 1.9 अरब डॉलर पर टिकी गतिविधि

Grant Thornton Bharat की रिपोर्ट के अनुसार, भारत का हेल्थकेयर डील मार्केट स्थिर तो है लेकिन सतर्क मोड में आगे बढ़ रहा है. निवेशक अब बड़े सौदों की बजाय डिजिटल हेल्थ, हेल्थटेक और मिड-मार्केट कंपनियों पर फोकस कर रहे हैं.

29-April-2026

देवेंद्र फडणवीस का शिरपुर को तोहफा, 1200 बेड के अस्पताल और 40,000 करोड़ निवेश से विकास को रफ्तार

यह अत्याधुनिक अस्पताल श्री विले पार्ले केलावणी मंडल (SVKM) द्वारा विकसित किया गया है. इसे एक क्षेत्रीय हेल्थकेयर हब के रूप में स्थापित किया जा रहा है, जो महाराष्ट्र के साथ-साथ पड़ोसी राज्यों मध्य प्रदेश और गुजरात के मरीजों को भी सेवाएं देगा.

26-April-2026

काइंडनेस प्रैक्टिस फाउंडेशन ने एसोसिएशन फॉर वूमन इन हेल्थकेयर की शुरुआत की

इस एसोसिएशन का उद्देश्य गैर-संचारी रोगों (NCDs) और पर्यावरणीय स्वास्थ्य से निपटना है.

17-March-2026


बड़ी खबरें

मिडिल ईस्ट संकट का भारत को बड़ा फायदा! 1 साल के सबसे ऊंचे स्तर पर पहुंचा फ्यूल एक्सपोर्ट

बेहतर रिफाइनिंग मार्जिन और वैश्विक बाजार में सप्लाई गैप का फायदा उठाते हुए भारतीय रिफाइनिंग कंपनियों ने अंतरराष्ट्रीय बाजार में अपनी पकड़ और मजबूत कर ली.

16 hours ago

मुथूट फिनकॉर्प के IPO की राह आसान, सेबी ने 6 फैमिली ट्रस्टों को ओपन ऑफर नियम से दी छूट

सेबी ने यह भी स्पष्ट किया कि यह राहत केवल ओपन ऑफर नियमों तक सीमित है. अधिग्रहण करने वाले पक्षों को अन्य सभी लागू नियामकीय प्रावधानों का पालन करना होगा.

15 hours ago

अडानी इंफ्रा ने अडानी ग्रीन एनर्जी में 2,380 करोड़ रुपये में खरीदी 1.03% हिस्सेदारी

अडानी ग्रीन एनर्जी भारत के नवीकरणीय ऊर्जा क्षेत्र की प्रमुख कंपनियों में बनी हुई है और स्वच्छ ऊर्जा की बढ़ती मांग तथा ग्रीन इंफ्रास्ट्रक्चर में निवेश के बीच कंपनी लगातार अपनी उत्पादन क्षमता का विस्तार कर रही है.

15 hours ago

नोएडा-गुरुग्राम बने रियल एस्टेट निवेश के सबसे बड़े हॉटस्पॉट, 7 साल में घरों की कीमतें 125% तक बढ़ीं: रिपोर्ट

ANAROCK रिसर्च एंड एडवाइजरी के विश्लेषण के अनुसार, देश के 11 प्रमुख आवासीय बाजारों में 2019 से Q2 2026 के बीच पूंजीगत मूल्य और रेंटल यील्ड, दोनों में लगभग समान गति से वृद्धि हुई है.

17 hours ago

महंगाई और वैश्विक चुनौतियों के बीच इमामी का दमदार प्रदर्शन, Q1 में राजस्व 15% बढ़ा

इमामी लिमिटेड के निदेशक मंडल ने 30 जून 2026 को समाप्त पहली तिमाही के गैर-ऑडिटेड वित्तीय नतीजों को मंजूरी दे दी है. कंपनी ने बताया कि Q1 FY27 में समेकित परिचालन राजस्व 15 फीसदी बढ़कर 1,039 करोड़ रुपये रहा.

17 hours ago