✕

होम / हेल्थ / ब्रांडेड दवाएं महंगी और जेनरिक दवाएं सस्ती क्यों होती हैं? समझिये इसके पीछे का खेल

ब्रांडेड दवाएं महंगी और जेनरिक दवाएं सस्ती क्यों होती हैं? समझिये इसके पीछे का खेल

जब तक कोई दवा सिर्फ एक कंपनी बेच रही होती है तो वो उसके दाम अपने हिसाब से रखती है, क्योंकि उसके मुकाबले कोई दूसरी कंपनी उस दवा को नहीं बेच रही होती है

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 4 years ago

नई दिल्ली: कभी आपने सोचा है कि ब्रांडेड दवाएं इतनी महंगी क्यों होती हैं, और वहीं दवाएं जब जेनरिक हो जाती हैं तो इतनी सस्ती क्यों मिलती हैं. मतलब एक ही दवा, एक ही सॉल्ट और कीमतों में कम से कम दोगुने से भी ज्यादा का अंतर. क्या ब्रांडेड दवाएं ज्यादा अच्छी होती हैं और जेनरिक दवाएं कम असरदार. क्या इन दोनों की क्वालिटी में कोई फर्क होता है. चलिये आज इसी गुत्थी को सुलझाते हैं. 

ब्रांडेड दवाएं क्यों महंगी होती हैं?
अमेरिका की Food and Drug Administration यानी FDA के मुताबिक जेनरिक दवाएं आमतौर पर ब्रांडेड दवाओं के मुकाबले करीब 85 परसेंट तक सस्ती हो सकती हैं. ब्रांडेड दवाएं क्यों महंगी होती हैं, इसकी पीछे कई कारण हैं. इसको एक-एक करके समझते हैं. 

1. रिसर्च पर भारी भरकम खर्च 
जब भी किसी बीमारी की दवा खोजी जाती है, उसके लिये कई सालों तक रिसर्च होती है, कई क्लीनिकल शोध होते हैं, जानवरों पर टेस्टिंग होती है, जिसकी लागत करोड़ों डॉलर में होती है. इसलिये जब भी कोई कंपनी इतनी भारी लागत के बाद कोई दवा बनाती है तो उसे पेटेंट करवाती है, उसको बनाने और बेचने का अधिकार कई सालों तक अपने पास रखती है ताकि उस दवा पर किये गए रिसर्च का खर्चा निकाल सके. एक जानकारी के मुताबिक किसी दवा को बनाने में 2.6 बिलियन डॉलर तक का खर्च आता है. इतना पैसा खर्च करने के बाद भी इस बात की कोई गारंटी नहीं होती है कि दवा मंजूर हो जाएगी, क्योंकि दवा के एक गलत असर से सारी मेहनत पर पानी फिर सकता है करोड़ डॉलर बर्बाद हो सकते हैं. इसलिये जब भी कोई दवा मंजूर होती है तो कंपनी उस दवा को पेटेंट करवाती है और आने वाली 20 सालों तक उस दवा को बेचने का एकाधिकार रखती है. इसके बाद ही दवा को दूसरी कंपनियों को बनाने की इजाजत होती है, लेकिन वो काफी सस्ती इसीलिए होती हैं क्योंकि उन्होंने इस दवा को बनाने में रिसर्च या टेस्टिंग पर कोई पैसा खर्च नहीं किया होता है, उन्हें फॉर्मूला पता है, सॉल्ट पता है और वो इसे आसानी से सिर्फ बनाकर बेच रही हैं और मुनाफा कमा रही हैं.

2. कंपटीशन बढ़ने से जेनरिक दवाएं सस्ती
जब तक कोई दवा सिर्फ एक कंपनी बेच रही होती है तो वो उसके दाम अपने हिसाब से रखती है, क्योंकि उसके मुकाबले कोई दूसरी कंपनी उस दवा को नहीं बेच रही होती है, लेकिन वही दवा जब जेनरिक हो जाती है तो उसे कई कंपनियां बेचती हैं, इससे बाजार में कंपटीशन बढ़ जाता है, और दवाओं के दाम कम हो जाते हैं. 
लोगों को ये भी पता होता है कि ये जेनरिक दवा है तो वो उसकी ब्रांडेड दवा लेने की बजाय जेनरिक दवा को खरीदते हैं, क्योंकि वो काफी सस्ती होती है.  

3. मार्केटिंग-ब्रांडिंग पर खर्च 
बड़ी बड़ी ब्रांडेड कंपनियां अपनी दवाओं की मार्केटिंग और ब्रांडिंग पर बहुत खर्च करती हैं. डॉक्टर्स और केमिस्ट्स के जरिये इन दवाओं को प्रमोट करने पर भी काफी खर्चा करती हैं, जिससे इसकी रिटेल कीमत बढ़ जाती है. 

ब्रांडेड दवाएं असरदार या जेनरिक 
अब सवाल उठता है कि क्या जेनरिक दवाएं भी ब्रांडेड दवाओं की तुलना में उतनी ही असरदार होती हैं, क्या जेनरिक दवाओं की क्वालिटी में कोई फर्क होता है. इसका जवाब है नहीं. जेनरिक दवाएं और ब्रांडेड दवाओं का फॉर्मूला एक ही होता है, लेकिन उनका आकार रंग, पैकेजिंग अलग हो सकते हैं. ड्रग प्राइस कॉम्पिटिशन एंड पेटेंट टर्म रिस्टोरेशन एक्ट 1984, जिसे हैच-वैक्समैन एक्ट के रूप में भी जाना जाता है, ये पेटेंट की अवधि खत्म होने के बाद कई ब्रांडेड दवाओं की जेनेरिक बिक्री की इजाजत देता है. किसी कंपनी को अगर किसी ब्रांडेड दवा को जेनरिक बिक्री की मंजूरी चाहिये तो ड्रग रेगुलेटर से मंजूरी लेनी होती है, कंपनी को सख्त मानकों का पालन करना होता है. यानी जब किसी ब्रांडेड दवा को जेनरिक की मंजूरी दी जाती है तो इस बात को सुनिश्चित किया जाता है कि उसकी शुद्धता, स्थिरता और क्वालिटी को लेकर किसी तरह का समझौता नहीं किया जाए. 

अमेरिकी स्वास्थ्य बीमा दावों के एक तुलनात्मक अध्ययन के दौरान, शोधकर्ताओं ने पाया कि पुरानी शारीरिक स्थितियों के लिए ब्रांडेड और जेनेरिक दवाओं के तुलनीय चिकित्सा परिणाम थे. उन्होंने जिन स्थितियों को देखा उनमें हाइपर टेंशन, डायबिटीज, ऑस्टियोपोरोसिस और मानसिक स्थिति जैसे चिंता और अवसाद शामिल थे.
हालांकि, एक दूसरी रिसर्च में सामने आया है कि जेनेरिक दवाओं का कार्डियोवैस्कुलर बीमारियों के लिए समान क्लीनिकल असर नहीं हो सकता. शोधकर्ताओं ने वैज्ञानिक डेटाबेस MEDLINE और EMBASE से रिपोर्ट का विश्लेषण किया. उन्होंने पाया कि 60% स्टडीज ने दवाओं के बीच कोई अंतर नहीं बताया, जेनेरिक दवा लेने वाले लोगों में अस्पताल के चक्कर लगाने का रिस्क ज्यादा था. हालांकि ये ध्यान रखना चाहिए कि ये सिर्फ एक को-रिलेशन है, इसका मतलब ये कतई नहीं कि जेनरिक दवाओं की वजह से अस्पतालों के चक्कर ज्यादा लगे.

अब ये कहना कि ब्रांडेड और जेनरिक दवाओं में कौन बेहतर है, इसके लिए अभी और शोध की जरूरत है, क्योंकि ज्यादातर मामलों में दोनों तरह की दवाओं का एकसमान असर देखा गया है. किसी व्यक्ति को जेनरिक दवाएं लेनी चाहिए या ब्रांडेड ये कई बातों पर निर्भर करता है. इसका सही फैसला मरीज की सेहत की स्थिति को देखते हुए हेल्थ प्रोफेशनल या डॉक्टर ही कर सकते हैं. डॉक्टर को दोनों तरह की दवाओं के लेकर चर्चा करनी चाहिये. 

 


टैग्स
सम्बंधित खबरें

स्कैनर का सवाल: अस्पतालों में बेहतर फैसलों के लिए क्यों जरूरी है वित्तीय समझ और चिकित्सकीय ज्ञान का तालमेल

वित्त टीम की शुरुआत लाभ-हानि विवरण से होती है. इससे पता चलता है कि परामर्श, प्रक्रियाओं, डायग्नोस्टिक्स और फार्मेसी से होने वाली आय अस्पताल चलाने की लागत को पूरा करती है या नहीं.

1 week ago

भारत में पहली बार WCOG, 61 देशों के 3,000 विशेषज्ञ जुटे; एआई और मेडिकल टेक्नोलॉजी पर मंथन

WCOG के उद्घाटन पर जेपी नड्डा बोले- पाचन और लिवर संबंधी बीमारियों से निपटने के लिए इलाज के साथ रोकथाम और शुरुआती जांच पर जोर जरूरी

01-October-2026

दिल्ली में 120 लोगों की हुई हृदय संबंधी जांच, विशेषज्ञों ने समय रहते जोखिम पहचानने पर दिया जोर

विश्व हृदय दिवस के अवसर पर आयोजित इस कैंप में क्लीनिकल जांच, लैब टेस्ट और कार्डियक इमेजिंग को एक साथ शामिल किया गया. इसका उद्देश्य लोगों को हृदय रोग के जोखिम के बारे में जागरूक करना और गंभीर हृदय संबंधी घटना से पहले बीमारी की पहचान तथा रोकथाम पर जोर देना था.

28-September-2026

भारत में बढ़ रहा अल्जाइमर का खतरा, 2036 तक दोगुने हो सकते हैं डिमेंशिया के मरीज

शुरुआती लक्षणों को उम्र बढ़ने का सामान्य हिस्सा मानकर नजरअंदाज करना पड़ सकता है भारी, विशेषज्ञों ने समय पर जांच और डॉक्टर से सलाह लेने की दी सलाह

22-September-2026

IMA और Abbott ने शुरू किया इंडियन इम्यूनाइजेशन वीक, फ्लू वैक्सीनेशन को लेकर जागरूकता बढ़ाने पर जोर

इस अभियान के तहत स्वास्थ्य पेशेवरों को टीका लगाने से जुड़े व्यावहारिक दिशा-निर्देश भी उपलब्ध कराए जा रहे हैं. इनमें खास तौर पर यह जानकारी शामिल है कि बुखार या किसी बीमारी से ठीक होने के दौरान या उसके बाद टीकाकरण कब कराया जा सकता है.

22-September-2026


बड़ी खबरें

SBI के मुनाफे में 14.28% की बढ़ोतरी, दूसरी तिमाही में ₹23,038 करोड़ का शुद्ध लाभ

नेट इंटरेस्ट इनकम में 14.69% का उछाल, बढ़कर ₹49,143 करोड़ हुई; बैंक की एसेट क्वालिटी में भी सुधार

9 hours ago

बच्चों पर सोशल मीडिया के असर को लेकर सुप्रीम कोर्ट सख्त, मेटा के फेसबुक-इंस्टाग्राम पर उठे सवाल

याचिका में आरोप लगाया गया है कि फेसबुक और इंस्टाग्राम के एल्गोरिदम बच्चों को लंबे समय तक स्क्रीन पर सक्रिय रहने के लिए प्रेरित करते हैं. याचिकाकर्ता ने बच्चों की मानसिक सेहत, निजता और ऑनलाइन सुरक्षा को लेकर भारत में विशेष सुरक्षा उपाय लागू करने की मांग की है.

8 hours ago

टाटा ग्रुप के विवाद पर वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण की सलाह, आपसी बातचीत से सुलझाएं मतभेद

वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने टाटा ग्रुप के नेतृत्व से आंतरिक मतभेदों को बातचीत के जरिए सुलझाने और समूह में सामान्य स्थिति बहाल करने की अपील की है. उन्होंने कहा कि टाटा ग्रुप भारतीय अर्थव्यवस्था का अहम हिस्सा है और इस विवाद का सार्वजनिक रूप से जारी रहना ठीक नहीं है.

9 hours ago

2029 तक 3 लाख करोड़ रुपये के रक्षा उत्पादन का लक्ष्य, 50 हजार करोड़ रुपये के निर्यात पर सरकार की नजर

रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने कहा- सेना के आधुनिकीकरण और स्वदेशी रक्षा क्षमताओं को मजबूत करने पर है जोर, रक्षा बजट बढ़कर रिकॉर्ड 7.85 लाख करोड़ रुपये हुआ

9 hours ago

रेलवे इलेक्ट्रिफिकेशन ने पकड़ी रफ्तार, 12 साल में तीन गुना बढ़ा आंकड़ा; 99.7% नेटवर्क हुआ इलेक्ट्रिक

आंकड़ों के मुताबिक, 1950 तक देश के केवल 0.7 फीसदी रेल नेटवर्क का विद्युतीकरण हुआ था. 1961 में यह आंकड़ा 1.3 फीसदी और 2001 तक 23.6 फीसदी पहुंचा. इसके बाद भी रफ्तार सीमित रही, लेकिन 2014 के बाद इलेक्ट्रिफिकेशन के काम में तेजी आई.

14 hours ago