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राकेश झुनझुनवाला से आप क्या-क्या सीख सकते हैं, जानें कैसे चुनते थे कंपनियां

राकेश झुनझुनवाला की खासियत उनका लंबे दौर का निवेश ही है. हालांकि वो बाज़ार में डूबे रहते थे और ट्रेडिंग भी करते थे लेकिन वो दाल में नमक जैसी ही थी.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 4 years ago

आलोक जोशी
(लेखक सीएनबीसी आवाज़ के पूर्व संपादक हैं. अब यू ट्यूब  पर देखे जा सकते हैं.)

सेठों के सेठ राकेश झुनझुनवाला नहीं रहे. यह उम्र नहीं थी जाने की. सिर्फ 62 साल, लेकिन जाने की कोई उम्र नहीं होती. जाने के बाद कोई कैसे याद किया जाता है यह बड़ी बात है.

राकेश की पत्नी रेखा, तीन बच्चे, परिवार और मित्र तो उन्हें याद करेंगे ही, लेकिन जिनका उनसे कोई रिश्ता नहीं था, जान पहचान भी नहीं थी, ऐसे करोड़ों लोग भी याद करेंगे. याद इसलिए करेंगे क्योंकि बासठ साल की ज़िंदगी में राकेश झुनझुनवाला कोई मामूली इंसान नहीं रहे, एक मिसाल बन चुके थे. शेयर बाज़ार में पांच हज़ार रुपए लगाकर 1985 में उन्होंने जो सफर शुरू किया उसे लगभग पचास हज़ार करोड़ रुपए की संपत्ति तक पहुंचा चुके थे. बाज़ार पर नज़र रखनेवाली पत्रिकाओं और अखबारों के मुताबिक जून के अंत तक राकेश के पोर्टफोलियो की कीमत 5.8 अरब डॉलर यानी लगभग छियालीस हज़ार करोड़ रुपए थी.

राकेश झुनझुनवाला का पोर्टफोलियो जब एकाएक 30% गिर गया
बाज़ार के हर उतार चढ़ाव के साथ उनकी संपत्ति का आंकड़ा कुछ सौ या कुछ हज़ार करोड़ रुपए ऊपर नीचे होता रहता है. जो लोग किसी एक शेयर को खरीद कर रोज़ उसका भाव देखते हैं और दिल की धड़कनें बढ़ती या दिल बैठता महसूस करते हैं उनके लिए यह सोचना बहुत मुश्किल होगा कि बाज़ार में हज़ारों करोड़ रुपए कमाने के बाद दो हज़ार आठ की मंदी में राकेश झुनझुनवाला का पोर्टफोलियो जब एकाएक 30% गिर गया तो उन्हें कैसा लगा होगा. लेकिन वो मंदी बीत गई और राकेश का सिक्का चलता रहा.

लंबे दौर का निवेश राकेश झुनझुनवाला की खासियत
राकेश झुनझुनवाला की खासियत उनका लंबे दौर का निवेश ही है. हालांकि वो बाज़ार में डूबे रहते थे और ट्रेडिंग भी करते थे लेकिन वो दाल में नमक जैसी ही थी. उनको भारत का वॉरेन बफेट कहा जाता था. क्योंकि बफेट की ही तरह वो कंपनियों के बारे में अच्छी खासी पढ़ाई और छानबीन करने के बाद ही उनमें पैसा लगाते थे और जहां लगाते थे जमकर लगाते थे. टाटा टी तो उनका पहला इन्वेस्टमेंट था लेकिन उसके बाद क्रिसिल और टाइटन जैसी कंपनियों में पैसा लगाकर राकेश ने न सिर्फ अपनी संपत्ति बढ़ाई बल्कि पूरे देश के निवेशकों को मजबूर किया कि वो भी इन कंपनियों में छिपी क्षमता को देखें और इस कमाई में हिस्सा बंटाएं. उदारीकरण के बाद भारत में लगातार फैलते बाज़ार और उसके साथ पैदा हो रही संभावनाओं पर राकेश लगातार पैनी नज़र रखते थे. उन्हें पूरा यकीन था कि भारत में अभी काफी लंबे समय तक तेज़ आर्थिक विकास होना है और उसके साथ यहां पैसा बनाने की अपार संभावनाएं हैं. हर बार बातचीत में वो कहते थे भारत एक बहुत लंबी तेज़ी या बुल रन में है. हालांकि इसके बीच उतार चढ़ाव आते रहेंगे.

बाज़ार की ताकत पर बहुत जबर्दस्त भरोसा
2008, 2013 और फिर 2020 के मंदी के झटकों को भी राकेश और उन जैसे निवेशक झेल गए तो इसका कारण यही था कि उन्हें भारत के बाज़ार की ताकत पर बहुत जबर्दस्त भरोसा था. हालांकि वो कभी भी निवशकों को सलाह देने की मुद्रा में बात नहीं करते थे. उनका कहना था कि यह मेरा काम नहीं है. लेकिन जो वो करते थे और उसका जो असर दिखता था उसने लाखों नहीं बल्कि करोड़ों लोगों को भारत के शेयर बाज़ार की तरफ खींचा और उन्हें यहां बने रहने का हौसला और भरोसा दिया. यही राकेश झुनझुनवाला का भारतीय शेयर बाज़ार, भारत की अर्थव्यवस्था और देश के आम आदमी के लिए सबसे बड़ा योगदान है.

आप उनसे सीखें कि वो कंपनियां कैसे चुनते थे
हालांकि पहले भी बहुत से लोग राकेश झुनझुनवाला का पोर्टफोलियो देखकर उसकी नकल करने की कोशिश करते थे और आगे भी करते रहेंगे, लेकिन इससे बेहतर तरीका है कि आप उनसे सीखें कि वो कंपनियां कैसे चुनते थे. उनके निवेश मंत्र क्या थे और वो क्या नहीं करते थे. किस्मत की बात है कि अब आप गूगल के सहारे उनके निवेश मंत्र पा सकते हैं और यू ट्यूब  पर उनके पुराने इंटरव्यू देखकर अपना गाइड तैयार कर सकते हैं.

राकेश झुनझुनवाला से और क्या-क्या सीख सकते हैं
अगर आप राकेश झुनझुनवाला की तर्ज पर पैसा कमाने का तरीका सीखने की कोशिश कर रहे हैं तो फिर आपको उनसे समृद्धि के सदुपयोग का तरीका भी सीखना चाहिए. अभी अकासा एयरलाइंस में उन्होंने जो बड़ी हिस्सेदारी खरीदी है, उसमें उनके खुद के अलावा पत्नी के नाम और तीनों बच्चों के बेनेफिशियरी ट्रस्ट के नाम पर शेयर लिए गए हैं. यानी अपने परिवार का ख्याल रखने और उसके भविष्य का इंतजाम करने पर भी राकेश से आप सबक सीख सकते हैं. इसके अलावा उन्होंने यह संकल्प भी लिया था कि अपनी कुल संपत्ति का चौथाई हिस्सा वो समाज के नाम करेंगे. इसमें वो कैंसर पीड़ित बच्चों के लिए आश्रय चलानेवाले सेंट ज्यूड और बच्चों के बीच काम करनेवाले अनेक गैर सरकारी संगठनों को काफी मोटी रकम दान करते रहे थे. अशोका युनिवर्सिटी, फ्रेंड्स ऑफ ट्राइबल सोसाइटी और ओलिंपिक गोल्ड क्वेस्ट को भी उन्होंने काफी दान दिया और नवी मुंबई में वो एक आंखों का अस्पताल बनवा रहे थे जहां पंद्रह हज़ार आंखों के ऑपरेशन मुफ्त किए जाने हैं. एक मोटा अनुमान है कि बीते साल राकेश ने हर रोज़ सोलह लाख रुपए से ज्यादा की रकम ऐसे ही समाजिक कार्य में लगाई.

राकेश ने क्या नहीं सीखा
इन सबसे बड़ा एक सबक जो राकेश ने नहीं सीखा लेकिन उनसे आप सीख सकते हैं कि इंसान को दौलत कमाने और बड़े बड़े काम करने के बीच अपनी सेहत को नजरंदाज़ नहीं करना चाहिए. अगर वो यह गलती न करते तो शायद अभी कई साल तक वो और कमाते भी और बांटते भी.

एक शानदार निवेशक और एक बेहतरीन इंसान को श्रद्धांजलि के साथ यह कामना कि उनके परिवार को यह दुख सहने की शक्ति मिले.

VIDEO: प्रधानमंत्री मोदी के पास कितने करोड़ की है संपत्ति


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