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स्कूली शिक्षा में बदलाव की जरूरत, इसको कैसे किया जाए ठीक, इस रिपोर्ट में जानिए
भारत के लगभग 15 लाख स्कूलों में स्कूली शिक्षा के हर स्तर पर व्यवस्थित तरीके से सुधार करने की जरूरत है.
बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 1 year ago
हाल ही में जारी एनुअल स्टेटस ऑफ एजूकेशन रिपोर्ट (ASER) 2023 में कहा गया है कि स्कूलों में हमारे छात्र सीख नहीं रहे हैं. इस रिपोर्ट से पता चलता है कि एक चौथाई विद्यार्थी वह भी नहीं कर पाते जो कक्षा 2 के बच्चे को करने में सक्षम होना चाहिए. इन आंकड़ों में पिछले एक दशक में नामात्र का सुधार हुआ है. यह रिपोर्ट शिक्षा के उस संकट की ओर इशारा करती है जिसने आज़ादी के बाद से हमारी शिक्षा प्रणाली को जकड़ रखा है.
रातोंरात नहीं बदल सकता है शिक्षा का स्तर
विशेषज्ञों का कहना है कि ASER जैसे अनौपचारिक सर्वेक्षणों से सामने आया खराब शिक्षा स्तर देश में छात्रों की वर्षों की उपेक्षा और बुनियादी दक्षताओं पर ध्यान देने की कमी का नतीजा है. यह कमी स्कूली शिक्षा के शुरुआती दौर में ही शुरू हो जाती है और समय के साथ बढ़ती ही जाती है. अंततः छात्रों में ये कमी तब स्पष्ट होती है जब वे ऊपरी कक्षाओं में पहुंचते हैं या अपनी आजीविका शुरू करते हैं. हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि भारत को पिछली शिक्षा नीति को अपग्रेड करने में 37 साल और पाठ्यक्रम की रूपरेखा बनाने में 17 साल लगे हैं. इसका मतलब है कि हम यहां कई दशकों से चल रही गड़बड़ी की बात कर रहे हैं. इस नुकसान की भरपाई कुछ सालों में नहीं की जा सकती. भारत के लगभग 15 लाख स्कूलों में स्कूली शिक्षा के हर स्तर पर व्यवस्थित तरीके से सुधार करने की जरूरत है.
शैक्षिक प्राथमिकताओं की ऐतिहासिक उपेक्षा
भारत की शिक्षा नीतियां और प्राथमिकताएं, वास्तविक शिक्षा के बजाय साक्षरता के प्रसार, नामांकन और स्कूल भवन के बुनियादी ढांचे जैसे मुद्दों पर ज़्यादा केंद्रित रही हैं. पिछली शताब्दी की शिक्षा नीतियां हों या 2009 में शिक्षा का अधिकार अधिनियम (RTE), दोनों ही छात्रों को स्कूलों में दाखिला दिलाने के उद्देश्य पर केंद्रित हैं. शिक्षा की गुणवत्ता और सीखने के तरीकों में सुधारों पर वास्तव में कोई बड़ा काम नहीं हुआ है. भाषा, विज्ञान और गणित जैसे विषयों को विशाल पाठ्यक्रम से बोझिल बना दिया गया है. पाठ्यक्रम और परीक्षाएं रोट लर्निंग को प्राथमिकता देती हैं, जबकि वास्तविक जीवन में आवश्यक 21वीं सदी के कौशलों के विकास को ध्यान में नहीं रखतीं. परीक्षाओं में वास्तविक समझ की बजाय रटने की क्षमता की परीक्षा ली जाती रही है. ऐसे में विशाल पाठ्यक्रम को कवर करने की होड़ में सार्थक शिक्षा का वास्तविक लक्ष्य पीछे छूट गया.
NEP 2020 के साथ बदलाव की बयार
लेकिन हाल के दिनों में शिक्षा से जुड़ी बहस स्कूली शिक्षा में सीखने के परिणामों पर केंद्रित हो गई है. राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) 2020 की रिलीज ने गुणवत्तापूर्ण स्कूली शिक्षा, आलोचनात्मक सोच और छात्रों के बहुमुखी विकास पर जोर देने के साथ-साथ सीखने पर फिर से ज़ोर दिया गया है. 'पाठ्यक्रम और पाठ्येतर के बीच कोई कठोर अलगाव नहीं', 'वैचारिक समझ पर जोर', 'रचनात्मक और आलोचनात्मक सोच' जैसे शब्द NEP 2020 में एक अपेक्षित और आवश्यक दार्शनिक बदलाव की ओर इशारा करते हैं.
इस पॉलिसी कार्यान्वयन ने पहले से ही निपुण लक्ष्य जैसे प्रारंभिक साक्षरता और गणितीय ज्ञान और ग्रेड 3 में फाउंडेशनल लर्निंग स्टडी (FLS) जैसे मजबूत मानकों के जरिए कुछ आशाजनक लक्ष्य तय कर दिए हैं. 2022-23 में हाल ही में संशोधित राष्ट्रीय पाठ्यचर्या रूपरेखा (NCF) पूरी तरह से चरित्र निर्माण पर केंद्रित है. यह करिकुलम कड़े मानकों के आधार पर विषयों और अलग-अलग ग्रेड में अपेक्षित सीखने के परिणामों के लक्ष्य तय करता है. CBSE ने अपने नए SEAS मूल्यांकन पद्धति के जरिए स्ट्रक्चर्ड असेसमेंट फॉर एनालाइजिंग लर्निंग (SAFAL) और एनसीईआरटी/परख (NCERT/PARAKH) जैसी पहल के माध्यम से दक्षता-आधारित प्रश्नों के आधार पर प्रारंभिक वर्षों में वास्तविक अवधारणा की समझ का परीक्षण करने के लिए अपने मूल्यांकन पैटर्न को फिर से तैयार किया है. इसमें 6000 से ज्यादा ब्लॉक के लिए 80 लाख से ज्यादा छात्रों का मूल्यांकन किया गया है. NEP के निर्देशों के मुताबित इस प्रक्रिया को आगे बढ़ाते हुए, स्टेट असेसमेंट सर्वे (SAS) पर भी इन शैक्षणिक लक्ष्यों के लिए विचार किया जा सकता है.
आगे की राह सुधारों को आगे बढ़ाना
शिक्षा विशेषज्ञ उन स्पष्ट साक्ष्य-आधारित सुधारों से खुश हैं जो पिछले साढ़े तीन सालों में भविष्य के दृष्टिकोन से नेशनल एजुकेशन पॉलिसी (NEP) 2020 द्वारा लागू किए गए हैं. हालांकि, काम अभी शुरू हुआ है और इसका सबसे कठिन हिस्सा आगे है. संचालन में सुधार, शिक्षकों के कौशल का विकास और छात्रों के लिए उनकी व्यक्तिगत रुचि के मुताबिक सीखने का माहौल बनाने के लिए ज़रूरी नीतियों को लागू करने के लिए सभी राज्यों में सुधार की गति बनाए रखने की ज़रूरत होगी.
शिक्षा विशेषज्ञों के अनुसार, अधिगम के आंकड़ों का हवाला देते हुए कहा जा रहा है कि NEP 2020 की बयानबाजी अभी तक साक्षरता और संख्यात्मक योग्यता में कोई ठोस सुधार नहीं कर पाई है. हालांकि, हमें यह ध्यान रखना चाहिए कि शिक्षा के परिणाम (अधिगम का आउटकम) प्रदर्शित होने में विलम्ब होता है, जिसका प्रभाव पूरी तरह से प्रणाली और स्कूलों में परिवर्तन के बाद ही दिखने लगता है. इसमें छात्रों की क्षमताओं में सुधार, शिक्षकों के कौशल में वृद्धि, पाठ्यक्रम का संतुलन, और स्कूलों की गुणवत्ता में समय लगता है. इस प्रक्रिया के पूरा होने के बाद ही हमें छात्रों के बेहतर प्रदर्शन की उम्मीद करनी चाहिए. पिछली शिक्षा नीतियों के विपरीत, NEP 2020 ने अपने निर्धारित व्यापक रोडमैप के अंतर्गत 3.5 सालों में एनसीएफ 2022 के साथ-साथ दक्षता-आधारित मूल्यांकन जैसे सुधारों का प्रभाव दिखाया है.
इसके विपरीत, 1986 की राष्ट्रीय शिक्षा नीति को 2005 में संशोधित NCF के रूप में सामने आने में 17 साल लग गए थे. आरटीई अधिनियम (RTE Act) को 1986 की शिक्षा नीति आने के बाद लागू होने में कई दशक लग गए. विशेषज्ञों का तर्क है कि नई एनईपी कार्यान्वयन की यह तेज गति दीर्घकालिक लक्ष्यों को हसिल करने के लिए आत्मविश्वास उत्पन्न करती है. हालांकि, सबसे बड़ी चुनौती कई शैक्षणिक चक्रों में इस नीति को लगातार जारी रखने की है.
आगे होने वाले रेग्युलेटरी सुधार
आगे स्कूली शिक्षा प्रणाली में गुणवत्ता और जवाबदेही लाने के लिए और अधिक प्रशासनिक और रेग्युलेटरी सुधारों पर विचार किया जाएगा. राज्यों में मौजूदा प्रणाली में, स्कूल शिक्षा विभाग अपने स्कूल (पब्लिक/सरकारी स्कूल) स्वयं संचालित भी करता है और राज्य भर के सभी स्कूलों को नियंत्रित भी करता है, जिससे वह खिलाड़ी और अंपायर दोनों बन जाता है. NEP 2020 ने एक स्वतंत्र, वैधानिक राज्य स्कूल मानक प्राधिकरण की स्थापना की सिफारिश की है जो सार्वजनिक और सरकारी स्कूलों के लिए 'हल्के लेकिन सख्त' नियम तैयार करेगा, शिक्षा की उपलब्धियों का मूल्यांकन करेगा, स्कूलों को मान्यता प्रदान करेगा, स्कूल-वाइज शिक्षा के परिणामों की सार्वजनिक रिपोर्टिंग करेगा, और गुणवत्ता की मांग को ध्यान में रखते हुए शिक्षण के सर्वोत्तम तरीकों को साझा करेगा. स्वतंत्रता सुनिश्चित करने के लिए ऐसे स्टेट स्कूल स्टैंडर्ड अथॉरिटी को संवैधानिक? जामा पहनाना जरूरी है. राज्यों को अपने स्कूली शिक्षा परिवेश में सुधार के लिए वर्तमान में लागू प्रतिबंधात्मक अधिनियमों, नियमों और विनियमों की सावधानीपूर्वक समीक्षा करनी चाहिए.
एक नियामक संस्था के रूप में स्टेट स्कूल स्टैंडर्ड अथॉरिटी को शिक्षा प्रणाली में स्कूलों के प्रवेश और निकास की निगरानी करने की जरूरत होगी. शिक्षा प्रणाली में स्कूलों के प्रवेश और निकासी उनके सीखने के प्रतिफल की उपलब्धियों पर आधारित करना होगा. इससे इस प्रक्रिया की कार्यकुशलता और पारदर्शिता को बढ़ावा मिलेगा. जिससे यह प्रक्रिया K-12 स्कूलों के लिए अनुमोदन की वर्तमान प्रणाली की तुलना में ज्यादा तेजी और बेहतर तरीके से काम करेगी.
स्कूल मानकों के लिए ऐसे प्राधिकरण की स्थापना देश में शैक्षिक गुणवत्ता तय करने की दिशा में एक महत्वाकांक्षी लेकिन जरूरी कदम है. हालांकि NEP एक मजबूत ढांचा प्रदान करता है. लेकिन SSSA की सफलता इन चुनौतियों से निपटने और पारदर्शी, कुशल और जवाबदेह स्कूल प्रशासन के लिए लगातार प्रयास करने की ऐसी क्षमता पर निर्भर करती है जो अन्य मापदंडों से ऊपर बच्चों के लिए सीखने को प्राथमिकता देती है. इसके अलावा, सिस्टम में इसकी भूमिका मुख्य रूप से नागरिकों द्वारा तय की जाएगी. विशेष रूप से माता-पिता अब सक्रिय भागीदार के रूप में काम कर सकते हैं. बच्चों के माता-पिता फीडबैक प्रदान करने और स्कूलों को अपने बच्चों की शिक्षा के लिए जवाबदेह बनाने के लिए काम कर सकते हैं. शिक्षा प्राणाली के रेग्युलेशन के लिए इस नए तरीके को अपनाने के साथ हम इनपुट से आउटपुट की ओर बढ़ रहे हैं. ऐसे में शिक्षा के अधिकार को सुनिश्चित करने से लेकर गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के अधिकार को हासिल करने की ओर कदम बढ़ाना अनिवार्य हो जाता है. इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए कुछ पुराने कानूनों में संशोधन की जरूरत होगी. इससे वर्तमान जरूरतों के मुताबिक एक ऐसी न्यायसंगत शिक्षा प्रणाली स्थापित करने में सहायता मिलेगी जिसका लक्ष्य छात्रों को गुणवत्ता पूर्ण शिक्षा देना है.
एक समान रेग्युलेटरी प्रक्रिया अपनाने का उद्देश्य सरकारी शिक्षा विभाग पर प्रशासनिक भार को कम करना, शिक्षा के व्यावसायीकरण जैसे मुद्दों का समाधान करना और साथ ही माता-पिता और छात्र हितों की रक्षा करना है. स्टेट स्कूल स्टैंडर्ड अथॉरिटी को कानून बना कर लागू करने में कुछ प्रगतिशील राज्यों की बढ़ती रुचि के साथ, एक केंद्रीकृत नियामक और स्कूल मानकों के लिए एक फ्रेमवर्क जल्द ही पेश होने की संभावना है.
अमृत काल में शिक्षा को प्राथमिकता
राष्ट्रीय शिक्षा नीति और स्कूलों के पाठ्यक्रम, शिक्षकों के प्रशिक्षण और सीखने के आकलन पर पड़ने वाले इसके प्रभाव एक नए युग की शुरुआत का प्रतिनिधित्व करते हैं जो हमारे देश के युवा दिमागों के लिए मूलभूत कौशल को प्राथमिकता देते हैं. इसमें सफलता का प्रमाण छात्र शिक्षण मेट्रिक्स पर लक्षित सुधार हासिल करना होगा जिन्हें NIPUN भारत मिशन और इसी तरह के दूसरे कार्यक्रमों में परिभाषित किया गया है.
हमारे बच्चों में इस शिक्षा के परिणाम दिखाई देने से पहले कई शैक्षणिक चक्रों में सुधार की गति को बनाए रखना जरूरी है. यह हमारा कर्तव्य है कि हम अपने बच्चों को पढ़ने, लिखने, सोचने, सवाल करने, सहयोग करने और समाज के संवेदनशील नागरिक बनने के जरूरी कौशल से लैस करें. जैसा कि प्रधानमंत्री मोदी ने कहा है कि अमृत काल एक बेहतर शैक्षणिक महौल को पोषित करने के लिए सही रनवे प्रदान करता है जो अंततः गुणवत्तापूर्ण शिक्षा को एक यथार्थवादी महत्वाकांक्षा बनाता है. अंततः, सुधारवादी नीतियों का महत्व तभी होता है जब वे बेहतर शिक्षा व्यवस्था को आकार देती हैं. इससे हमारे स्कूलों के लगभग 26 करोड़ शिक्षार्थियों का जीवन और भविष्य बनता है.
(लेखक- डॉ. किरीट प्रेमजीभाई सोलंकी, पूर्व लोकसभा सांसद, अहमदाबाद पश्चिम)
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