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Scams Of India: दो भाइयों ने मिलकर बैंकों को कैसे लगाया 34,000 करोड़ का चूना

बात साल 2019 की है, सबकुछ ठीक ठाक चल रहा था, तभी अचानक एक खबर आती है कि PMC Bank और Yes Bank के ग्राहक अपना पैसा नहीं निकाल पा रहे हैं

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 3 years ago

भारत के बैंकिंग सिस्टम को दुनिया के कुछ श्रेष्ठ और मजबूत बैंकिंग सिस्टम में से माना जाता है. कोई आम नागरिक अगर क्रेडिट की किश्त चुकाना भूल जाए या लोन की एख EMI न चुका पाए तो बैंक वाले दरवाजे पर आ धमकते हैं. लेकिन इसी देश में कई बैंक कारोबारियों को अंधाधुंध लोन देते हैं, बाद में यही लोन जब डूब जाता है तो उसे बट्टा खाता में डालकर हाथ झाड़ लेते हैं. जैसे विजय माल्या और नीरव मोदी ने किया. इसी कड़ी में दो भाईयों का भी नाम आता है. कपिल वाधवान और धीरज वाधवान, जिन्होंने DHFL बैंकिंग घोटाला किया. आज इसी के बारे में जानेंगे. 

DHFL बैंकिंग घोटाला
बैंकिंग घोटालों के इतिहास में DHFL अबतक सबसे बड़ा बैंकिंग घोटाला साबित हुआ है. बाजवूद इसके हमारे देश में कई बड़े बड़े बैंकिंग घोटाले हुए हैं. इसी में से एक है DHFL का बैंकिंग घोटाला. 34,000 करोड़ रुपये के इस घोटाले ने बैंकिंग सिस्टम की कमजोरियों को खोलकर सामने रख दिया. आखिर कैसे हुआ ये घोटाला. 
इस घोटाले को समझने के लिए सबसे पहले आपको DHFL के बारे में समझना होगा. इसका मतलब है Dewan Housing Financial Limited, जो कि एक नॉन बैंकिंग फाइेंस कॉर्पोरेशन है. ये कंपनी सेमी अर्बन और ग्रामीण इलाकों में कम आय वाले लोगों को घर के लिए देने के विजन के साथ शुरू हुई थी. इस घोटाले को समझने के लिए कपिल वाधवान, धीरज वाधवान के बारे में जानना जरूरी है. 

कुलदीप सिंह वाधवान  के दो बेटे होते हैं, राजेश वाधवान और राकेश वाधवान 
11 अप्रैल 1984 को राजेश वाधवान DHFL नाम की कंपनी की शुरुआत करते हैं
आगे चलकर DHFL की कमान राजेश वाधवान के दो बेटों के पास चली जाती है 
राजेश वाधवान के दो बेटे हैं- कपिल वाधवान और धीरज वाधवान 
इस कंपनी में राजेश वाधवान की बहू करुणा वाधवान भी शामिल हैं 
दूसरी तरफ राकेश वाधवान 1996 में HDIL की शुरुआत करते हैं 
इस कंपनी को अब उनके बेटे सारंग वाधवान चलाते हैं 

2019 में घोटाले का पता चला
बात साल 2019 की है, सबकुछ ठीक ठाक चल रहा था, तभी अचानक एक खबर आती है कि PMC Bank और Yes Bank के ग्राहक अपना पैसा नहीं निकाल पा रहे हैं. दोनों बैंकों के अंदर कैश की किल्लत हो गई थी. शुरू में लगा कि ये कोई सामान्य सी दिक्कत है, लेकिन देखते देखते ये मामले तूल पकड़ने लगा. टीवी चैनल्स और अखबार इस खबर को तवज्जो देने लगे. लेकिन अबतक ये समझ नहीं आ रहा था कि आखिर दोनों बैंकों में कैश की दिक्कत हुई कैसे. ये बात इतनी ज्यादा बढ़ी कि मामला रिजर्व बैंक तक पहुंच गया. रिजर्व बैंक मामले की जांच करता है, उसके बाद जो सच सबके सामने आता है उससे सबके होश उड़ जाते हैं. 

मई 2019, DHFL 960 करोड़ रुपये की ब्याज की रकम को चुका नहीं पाती और डिफॉल्ट कर जाती है. कंपनी कहती है कि ये छोटी मोटी दिक्कत है, लेकिन जुलाई की शुरुआत तक कंपनी अपने सारे रीपेमेंट को डिफॉल्ट करती जा रही थी, अब बैंकों को लगने लगा था कि मामला कुछ और है, कुछ तो ऐसा है जो बहुत गंभीर है. डिपॉजिटर्स ने कंपनी के खिलाफ केस दर्ज करना शुरू कर दिया. बस यहीं से इस घोटाले की परतें खुलना शुरू हो जाती है. जांच में पता चलता है कि इन दोनों बैंकों के टॉप अधिकारियों की HDIL (Housing Development and Infrastructure Ltd), DHFL के प्रमोटर्स, जो कि वाधवान फैमिली थी के बीच काफी नजदीकी रिश्ते हैं. इन दोनों कंपनियों के प्रमोटर्स ने बैंकों से करोड़ रुपये लोन देने के नाम पर लिए हैं. रिजर्व बैंक देश के इस सबसे बड़े मामले की जांच करता है. तो पता चलता है कि DHFL बैंकों का 34,000 करोड़ रुपये लेकर भाग चुका है. CBI की जांच शुरू होती है, तो पता चलता है कि DHFL ने 17 बैंकों को ठगा है. कंपनी के पूर्व कपिल वाधवान और डायरेक्टर धीरज वाधवान सहित 13 लोगों पर मामला दर्ज किया गया. 

सबसे पहले मीडिया हाउस कोबरापोस्ट ने इस बैंकिंग घोटाले का पर्दाफाश किया. उसने बताया कि कैसे DHFL कंपनी ने बैंकों से लोन के नाम लिये गए पैसों से निजी संपत्तियां और जमीनें खरीदीं, लेकिन DHFL ने इन आरोपों को गलत बताया, कंपनी ने निवेशकों और एनालिस्ट्स की एक कॉन्फ्रेंस बुलाई, जिसमें उसने बताया कि उसने एक भविष्य के प्रोजेक्ट के लिए 31,000 करोड़ रुपये लोन लिया है. लेकिन उसकी पोल पट्टी तब खुल गई जब CBI ने खुलासा किया कि DHFL ने 17 बैंकों से 34,615 करोड़ रुपये लिए हैं और इस मामले में कंपनी के प्रमोटर्स के खिलाफ केस दर्ज किया गया. DHFL ने कुल 42,871 करोड़ का लोन लिया है, जिसमें कई बड़े बैंक जैसे स्टेट बैंक ऑफ इंडिया, बैंक ऑफ बड़ौदा, यूनियन बैंक ऑफ इंडिया शामिल हैं. 

30 नवंबर 2021 यूनियन बैंक ऑफ इंडिया सीबीआई को एक शिकायत दर्ज कराता है कि DHFL ने 14,000 करोड़ रुपये के रिटेल लोन प्रोजेक्ट अंडर फाइनेंस दिये हैं, मगर ये लोन सच में थे ही नहीं.  KPMG को इसकी जांच में लगाया जाता है. तो पता चलता है कि DHFL ने ये सारा पैसा डकार लिया है. उसने ये पैसा 66 अलग अलग कंपनियों को ट्रांसफर किया है, जिसमें से 25 कंपनियां तो ऐसही हैं, जिनका कोई अता-पता नहीं है, वो सिर्फ कागज पर थीं. मतलब साफ था कि DHFL ने ये सारा पैसा मनी लॉन्ड्रिंग के जरिये दूसरी कंपनियों में डाल दिया था. बस यहीं से DHFL की काली करतूतों से परदा हटना शुरू हुआ. 

दोनों भाईयों ने कैसे किया ये घोटाला?
अब सवाल उठता है कि DHFL ने ये सब किया कैसे, आखिर उसको इतना बड़ा लोन मिला कैसे. अब इसको शुरुआत से समझते हैं और चलते हैं कहानी के फ्लैशबैक में. साल 2012 में DHFL के दोनों प्रमोटर्स कपिल वाधवान और धीरज वाधवान, जो कि भाई भी हैं. ये दोनों मिलकर मुंबई के बांद्रा में एक ब्रांच खोलते हैं. DHFL एक NBFC   है, इसलिये ये होम लोन देने के नाम पर बैंकों से काफी बड़ी तादाद में लोन उठाती है. उसको ये लोन मिल जाता है क्योंकि दोनों भाईयों की बैंकों के टॉप ऑफिशियल तक पहुंच थी. लोन का सारा पैसा DHFL की बांद्रा शाखा में ट्रांसफर होता है. इसके बाद इस लोन के पैसे को 2.6 लाख से ज्यादा अलग अलग लोन अकाउंट्स में ट्रांसफर किया जाता है, जिसमें से एक भी अकाउंट असली नहीं था, सारे अकाउंट नकली थे. इसके अलावा 66 ऐसी कंपनियां भी थीं, जो फेक थीं, उनके अंदर भी मोटी रकम लोन के रूप में ट्रांसफर की गई. DHFL की बांद्र शाखा भी फेक थी, क्योंकि ये भी सिर्फ पेपर ही थी, इसका कोई ऑफिस भी नहीं था. 2.6 लाख लोन अकाउंट और 66 कंपनियों में सारा पैसा ट्रांसफर करने के बाद ये पैसा एक शेल कंपनी में ट्रांसफर होता है, बाद में इस शेल कंपनी से कंपनी के प्रमोटर्स अपने अकाउंट में पैसों को ट्रांसफर करवा लेते हैं. इस पैसे को दोनों भाईयों ने देश विदेश में संपत्ति खरीदने, और कई तरह के असेट्स खरीदने में लगा दिया. इस मामले में दोनों भाई कपिल वाधवान और धीरज वाधवान जेल में हैं, कई बार उनकी जमानत की अर्जी खारिज हो चुकी है, इस मामले में अभी कोर्ट का फैसला नहीं आया है. 

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