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आपको परेशान करने वाली महंगाई, RBI और सरकार का भी छीन लेगी सुकून, समझें क्या है गणित

पिछले कुछ दिनों से महंगाई का मीटर तेजी से घूम रहा है, जो सबके लिए परेशानी वाली बात है.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 2 years ago

चुनावी मौसम बीतने के बाद महंगाई (Inflation) का मीटर चालू हो गया है. आलू-प्याज से लेकर दाल-आटा और चावल तक सबकुछ महंगा हो गया है. बीते दो हफ्तों में ही आटा, चावल, दाल, सरसों तेल, गुड़ और यहां तक कि नमक के दामों में इजाफा देखने को मिला है. परेशानी वाली बात यह है कि महंगाई का ये मीटर आने वाले दिनों में और तेजी से दौड़ सकता है. महंगाई की रफ्तार न थमने की मार आम जनता पर कई तरह से पड़ेगी. उदाहरण के तौर पर उसका रसोई का बजट बढ़ जाएगा. इसके साथ ही कर्ज सस्ता होने की आस भी टूट जाएगी. 

EMI कम तो नहीं बढ़ जाएगी?  
रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) पिछले 8 बार से नीतिगत ब्याज दरों को यथावत रखता आ रहा है. हाल ही में हुई RBI की मौद्रिक नीति समिति की बैठक में रेपो रेट को 6.5 प्रतिशत पर बरकरार रखने का फैसला लिया गया. हालांकि, यह माना जा रहा है कि MPC की अगली बैठक में रेपो रेट में कटौती का ऐलान किया जा सकता है. यानी कर्ज कुछ सस्ता हो सकता है. लेकिन महंगाई इस राह में फिर बाधा बनती नजर आ रही है. यदि महंगाई का पहिया इसी रफ्तार से घूमता रहा, तो रिजर्व बैंक कटौती की आस को तोड़ते हुए नीतिगत ब्याज दरों में इजाफे को मजबूर हो सकता है. यदि ऐसा हुआ, तो फिर आपकी EMI बढ़ने की आशंका भी जन्म ले लेगी.

FMCG उत्पाद भी हुए महंगे
महंगाई हर तरफ से बढ़ रही है. फल-सब्जी के साथ-साथ FMCG कंपनियों के उत्पाद भी महंगे हो गए हैं. बीते दो-तीन महीनों में इन कंपनियों ने फूड और पर्सनल केयर से जुड़े उत्पादों की कीमतों में 2 से 17% तक का इजाफा किया है. कंपनियां इसके पीछे कच्चे माल की कीमतों में बढ़ोतरी का तर्क दे रही हैं. एक रिपोर्ट की मानें तो FMCG कंपनियों ने साबुन-बॉडी वॉश जैसे प्रोडक्ट्स 2-9% महंगे कर दिए हैं. इसी तरह, हेयर ऑयल 8-11% और चुनिंदा फूड आइटम्स 3 से 17% तक महंगे मिल रहे हैं. इतना ही नहीं, ये कंपनियां चालू वित्त वर्ष 2024-25 में अपने उत्पादों के दाम औसतन 1% से 3% तक बढ़ा सकती हैं. यानी आने वाले दिन और भी मुश्किल भरे हो सकते हैं.

RBI को देना पड़ा था स्पष्टीकरण
बढ़ती महंगाई RBI के लिए भी मुश्किल पैदा कर सकती है. चढ़ते दामों के चलते ही उसे 2022-23 में शर्मसार होना पड़ा था. अब तक के इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ था कि RBI को महंगाई नियंत्रित न करने पाने के लिए सरकार को स्पष्टीकरण देना पड़ा. दरअसल, रिजर्व बैंक अधिनियम के तहत अगर महंगाई के लिए तय लक्ष्य को लगातार तीन तिमाहियों तक हासिल नहीं किया जाता, तो RBI को केंद्र सरकार के समक्ष स्पष्टीकरण देना होता है. उसे बताना होता है कि महंगाई नीचे नहीं आने के क्या कारण है और उसने अब तक क्या कदम उठाए हैं. मौद्रिक नीति रूपरेखा के 2016 में प्रभाव में आने के बाद से यह पहली बार था जब RBI को इस संबंध में केंद्र को रिपोर्ट भेजनी पड़ी.

क्या है RBI की जिम्मेदारी?
आरबीआई को केंद्र की तरफ से खुदरा महंगाई दो प्रतिशत घट-बढ़ के साथ चार प्रतिशत पर बनाए रखने की जिम्मेदारी मिली हुई है. इसी साल मई में खुदरा महंगाई दर 4.75 प्रतिशत दर्ज की गई. मार्च में यह 4.80% थी. जबकि पिछले साल अगस्त में यह 6.83 प्रतिशत थी. सितंबर 2023 के बाद से रिटेल इन्फ्लेशन में नरमी देखने को मिली है, लेकिन अब जिस तरह से लगभग सभी वस्तुओं के दाम बढ़ रहे हैं ये आंकड़ा भी तेजी से बढ़ सकता है. उस स्थिति में RBI महंगाई नियंत्रित करने के नाम पर नीतिगत ब्याज दर यानी रेपो रेट में इजाफा कर सकती है और बैंक इसक भार आम ग्राहकों पर डाल सकते हैं. यानी आपकी किचन के बजट के साथ-साथ EMI का गणित भी गड़बड़ा सकता है. वहीं, सरकार को भी इस मुद्दे पर तीखे सवालों का सामना करना होगा. मोदी सरकार सहयोगियों के कंधों पर सवार है और विपक्ष भी इस बार पहले से ज्यादा मजबूत है. ऐसे में सरकार पहले की तरह महंगाई से पल्ला नहीं झाड़ पाएगी. 

कर्ज और महंगाई का रिश्ता
महंगाई सीधे तौर पर डिमांड और सप्लाई के अंतर की वजह से चढ़ती है और इस अंतर की एक वजह है पर्चेजिंग पावर बढ़ना. यानी आपके हाथ में यदि ज्यादा पैसा होगा, तो आप खुलकर खर्च करेंगे. इस खर्च के चलते डिमांड बढ़ेगी और यदि सप्लाई पूरी नहीं हो पाई तो महंगाई बढ़ेगी. यहीं से RBI की जिम्मेदारी शुरू होती है. ऐसी स्थिति में RBI रेपो रेट बढ़ाकर यह कोशिश करता है कि आपके हाथ में अतिरिक्त पैसा न पहुंचे. जब ज्यादा पैसा नहीं होगा, तो आप ज्यादा खर्च नहीं करेंगे. न डिमांड बढ़ेगी और न मांग और आपूर्ति के बीच अंतर बढ़ेगा. इसे दूसरी तरह से भी समझते हैं. ब्याज दरें कम होने से बाजार में अतिरिक्त लिक्विडिटी बढ़ जाती है. कहने का मतलब है कि लोग बिना ज़रूरत के सामान खरीदने के लिए लोन आदि लेने लगते हैं. इससे डिमांड में एकदम से इजाफा होता है, सप्लाई सीमित होने की वजह यह महंगाई का रूप ले लेता है. रिजर्व बैंक के रेपो रेट बढ़ाने से बैंक कर्ज महंगा करेंगे, जिससे लिक्विडिटी या अतिरिक्त पैसा घटने लगेगा. ऐसे में लोग जो बिना जरूरत के सामान खरीदने लगते हैं, उनकी खरीदारी कम हो जाएगी और महंगाई पर लगाम लग जाएगी.

कारगर नहीं है रणनीति
RBI का मानना है कि बाजार से लिक्विडिटी कम करने से Artificial Demand को कंट्रोल करने में मदद मिलती है. इससे मांग घटती है, जो महंगाई को नियंत्रित करने का काम करती है. वैसे ये फ़ॉर्मूला केवल भारत ही नहीं अमेरिका जैसे देशों में भी अपनाया जाता है. हालांकि, ये बात अलग है कि कई एक्सपर्ट्स इसे ज्यादा कारगर नहीं मानते. उनका कहना है कि पैसे और महंगाई के बीच का ये रिश्ता ऐसा नहीं है, जिसे रेपो रेट में बदलाव से नियंत्रित किया जा सकता है. रिजर्व बैंक के इस तरह के फैसलों से महंगाई रोकने में खास सफलता नहीं मिली है. 

क्या होती है रेपो रेट?
रेपो रेट वह दर होती है जिस पर RBI बैंकों को कर्ज देता है. बैंक इस पैसे से कस्टमर्स को LOAN देते हैं. रेपो रेट बढ़ने का सीधा सा मतलब है कि बैंकों को मिलने वाला कर्ज महंगा हो जाएगा और इसकी भरपाई वो ग्राहकों से करेंगे. इसीलिए कहा जाता है कि Repo Rate बढ़ने से होम लोन, वाहन लोन आदि की EMI ज्यादा हो सकती है. इसके उलट जब यह दर कम होती है तो बैंक से मिलने वाले कई तरह के कर्ज सस्ते होने की संभावना बढ़ जाती है.

क्या होती है रिवर्स रेपो रेट?
अब बात करते हैं रिवर्स रेपो रेट की. जैसा कि नाम से ही स्पष्ट है, यह रेपो रेट से उलट है. रिवर्स रेपो रेट वो दर होती है जिस पर बैंकों को उनकी ओर से RBI में जमा धन पर ब्याज मिलता है. रिवर्स रेपो रेट मार्केट में कैश-फ्लो को नियंत्रित करने में काम आती है. दूसरे शब्दों में कहें तो बाजार में जब भी बहुत ज्यादा कैश दिखाई देता है, रिजर्व बैंक रिवर्स रेपो रेट बढ़ा देता है, ताकि बैंक ज्यादा ब्याज की चाह में अपना पैसा उसके पास जमा करें. बिल्कुल, वैसे ही जैसे आप अपना पैसा बैंक में रखते हैं.


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