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क्या सच में मंदी आ गई? ये हैं वो 5 कारण जिससे मंदी के आने का पता चलता है
दुनिया में मंदी है या नहीं, ये बहस का मुद्दा है, लेकिन सबकुछ ठीक तो नहीं चल रहा है, क्योंकि Walmart, Netflix, Oracle, Ford ने सैकड़ों कर्मचारियों को बाहर का रास्ता दिखा दिया है.
बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 3 years ago
नई दिल्ली: आसमान छूती महंगाई को काबू करने के लिए दुनिया भर के सेंट्रल बैंक दनादन ब्याज दरें बढ़ा रहे हैं. लेकिन क्या इसका साइड इफेक्ट इकोनॉमी पर पड़ रहा है, क्या दुनिया में मंदी धीरे-धीरे हावी हो रही है. तकनीकी रूप से देखा जाए तो अमेरिका में मंदी आ चुकी है, क्योंकि लगातार दो तिमाहियों से अमेरिकी ग्रोथ निगेटिव है. ऐसा माना जाता है कि अगर लगातार दो तिमाहियों से किसी देश की जीडीपी निगेटिव जोन में है तो मंदी ने दस्तक दे दी है. हालांकि अमेरिका इससे इनकार कर रहा है.
पिछले महीने Bank of America ने एक अनुमान जारी किया था, जिसमें उसने कहा था कि साल 2022 के बाकी महीनों में एक 'Mild recession' देखने को मिल सकता है, जबकि इसके पहले का अनुमान सिर्फ इकोनॉमिक ग्रोथ में सुस्ती का था. इसी तरह Wells Fargo ने भी साल 2023 की पहली तिमाही में “mild recession” का अनुमान जताया है.
दुनिया में मंदी है या नहीं, ये बहस का मुद्दा है, लेकिन सबकुछ ठीक तो नहीं चल रहा है, क्योंकि Walmart, Netflix, Oracle, Ford और इनके जैसी तमाम कंपनियों ने सैकड़ों कर्मचारियों को बाहर का रास्ता दिखा दिया है, इस लिस्ट में Google, Meta जैसी कंपनियां भी जल्द ही शामिल होंगी. मंदी किसे कहते हैं, कब माना जाए कि मंदी आ गई है. चलिए समझते हैं उन 5 कारणों को जिसे मंदी की आहट माना जा सकता है.
1. कंज्यूमर कॉन्फिडेंस कम होना
अगर किसी देश में कंज्यूमर कॉन्फिडेंस खत्म हो रहा है, तो इसे मंदी की आहट मान सकते हैं. कंज्यूमर कॉन्फिडेंस खत्म होने का मतलब है कि लोग आसमान छूती महंगाई की वजह से खरीदारी करना बंद कर देते हैं, वो सिर्फ अपनी जरूरत का सामान खरीदते हैं, जैसे खाने के लिए राशन, ईंधन वगैरह. कंज्यूमर कपड़े, ट्रैवल और एंटरटेनमेंट पर खर्च करने से कतराते हैं, जिससे इस सेक्टर से जुड़ी कंपनियों की कमाई घट जाती है. रिटेल बिक्री घट जाती है तो इसके मैन्यूफैक्चरर्स पर भी असर पड़ता है, नई नौकरियां बनने की बजाय मौजूदा वर्कफोर्स में छंटनी होने लगती है. इससे देश में बेरोजगारी बढ़ने लगती है. कई कंपनियां अपने कर्मचारियों को सैलरी नहीं दे पाती, इसका सीधा असर कंज्यूमर कॉन्फिडेंस पर पड़ता है, क्योंकि जब हाथ में पैसा ही नहीं होगा तो खरीदारी कैसे होगी.
2. ऊंची ब्याज दरें
आज पूरी दुनिया में महंगाई को काबू करने के लिए सेंट्रल बैंक्स जैसे अमेरिकी फेड, ECB और RBI ब्याज दरों में लगातार इजाफा कर रहे हैं. क्योंकि इनकी पहली प्राथमिकता महंगाई को अपनी आरामदायक स्थिति में लाने पर है. लेकिन ब्याज दरें बढ़ने का सीधा असर ग्रोथ पर होता है. जब ब्याज दरें बढ़ाई जाएंगी तो कर्ज महंगा होगा, महंगा कर्ज लेने से कंपनियां या फिर लोग कतराएंगे. जब लोग कर्ज लेंगे ही नहीं तो स्पेंडिंग में कमी आएगी, यानी खरीदारी घटेगी. स्पेंडिंग में कटौती होने से किसी भी देश की जीडीपी को धक्का लगता है, अगर ये लंबे समय तक रहा वो देश मंदी की चपेट में आ सकता है.
3. घरों की बिक्री कम होना
साल 2008 की मंदी तो सभी को याद है, इसकी शुरुआत हाउसिंग मार्केट बबल से हुई थी. लोगों को सस्ते में कर्ज बांटे गए, जो बाद में लोगों ने चुकाने से इनकार कर दिया. चीन में इस समय रियल एस्टेट संकट चल रहा है. चीन में हजारों प्रोजेक्ट्स अधूर पड़े हैं, लोगों ने EMI चुकाने से मना कर दिया है. अगर ऐसी स्थिति किसी भी देश में आए जब घरों के दाम अचानक से कम हो जाएं और बिक्री भी औंधे मुंह गिर जाए तो मानकर चलिए कि मंदी ने दस्तक दे दी है. क्योंकि बैंकों के करोड़ों रुपये फंस जाते हैं, वो आगे लोन देने से कतराते हैं और लोगों का भरोसा भी रियल एस्टेट से घटने लगता है और वो रियल एस्टेट में निवेश से दूरी बनाकर रखते हैं.
4. कच्चे तेल के दाम
कच्चे तेल की कीमतों का असर पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्थाओं पर पड़ता है. जून में कच्चे तेल की कीमतें 120 डॉलर के पार चली गईं थी, जिससे पूरी दुनिया को झटका लगा था. हालांकि वहां से कच्चा तेल अब काफी नीचे आ चुका है, अब मंदी के डर से कच्चा तेल 100 डॉलर के नीचे जा चुका है. इसलिए अगर आपको ये जानना है कि मंदी का क्या रुख है तो आपको कच्चे तेल की चाल को देखना चाहिए. Data Trek की एक रिसर्च के मुताबिक 1970 के बाद से जब भी तेल की कीमतें एक साल की अवधि के दौरान दोगुनी हुई हैं, 12-18 महीनों में मंदी ने दस्तक दी है. Citigroup का कहना है कि ऐतिहासिक सबूत बताते हैं कि सबसे बुरी मंदी की स्थिति में तेल की डिमांड निगेटिव हो जाती है, लेकिन सभी मंदियों में कच्चा तेल सिर्फ एक हद तक ही गिरता है. मंदी में लोगों की नौकरियां जाती हैं, कंपनियां दिवालिया हो जाती है, जिससे ईंधन की डिमांड में तेजी से गिरावट आती है और कच्चा तेल गिरने लगता है. इसलिए कच्चे तेल की चाल से मंदी की आहट का समझा जा सकता है.
5. जंग का असर
जंग कहीं भी हो उसका असर पूरी दुनिया की सेहत पर पड़ता है. इस समय यूक्रेन और रूस के बीच जंग चल रही है, रूस अगर तमाम प्रतिबंध झेल रहा है तो यूक्रेन भी बर्बादी की कगार पर खड़ा है. जिन देशों के इन दोनों देशों के साथ कारोबारी रिश्ते हैं, जाहिर है उनकी आर्थिक स्थिति पर असर पड़ेगा. World Bank के चीफ डेविड मैल्पास का कहना है कि यूक्रेन और रूस की जंग ग्लोबल मंदी की वजह बनेगा. खाने के सामानों, ईंधन और फर्टिलाइजर के दाम बढ़ेंगे. पिछले महीने ही World Bank ने ग्रोथ का ग्लोबल अनुमान इस साल के लिए 1 परसेंट घटाकर 3.2 परसेंट कर दिया. क्योंकि ज्यादातर यूरोपीय देश तेल और ईंधन के लिए रूस पर निर्भर हैं. हालांकि जंग हमेशा नहीं होती है, लेकिन जब भी होती है मंदी की आशंका हमेशा बनी रहती है. कोरिया की जंग के बाद 1953 में अमेरिका मंदी की चपेट में आ गया था, ऐसा ही विश्व दूसरे युद्ध के बाद हुआ था, जब 1945 में मंदी ने दस्तक दी थी.
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