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प्राइवेटाइजेशन पर मोदी सरकार को ऐसी नसीहत, खुश हो जाएंगे बैंकर्स
RBI ने अपने एक लेख में सरकार को इस मामले में ध्यान से आगे बढ़ने की सलाह दी है. उसका कहना है कि सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के बड़े पैमाने पर निजीकरण से फायदे से अधिक नुकसान हो सकता है.
बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 3 years ago
मोदी सरकार के एजेंडे में प्राइवेटाइजेशन सबसे ऊपर है. सरकार को लगता है कि सबकुछ निजी हाथों में सौंपना विकास है. एयर इंडिया को पहले ही बेचा जा चुका है, कई बड़ी कंपनियां इसी कतार में हैं और भारतीय अर्थव्यवस्था में अहम भूमिका निभाने वाले सरकारी बैंक भी सरकार की आंखों की किरकिरी बने हुए हैं. इसलिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जल्द से जल्द सरकारी बैंकों को प्राइवेट करना चाहते हैं. हालांकि, आरबीआई (RBI) ने इस 'चाहत' को लेकर उन्हें नसीहत दी है.
फायदे से अधिक नुकसान
रिज़र्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) का कहना है कि बैंकों के निजीकरण का फायदे से अधिक नुकसान हो सकता है. RBI ने अपने एक लेख में सरकार को इस मामले में ध्यान से आगे बढ़ने की सलाह दी है. उसका कहना है कि सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के बड़े पैमाने पर निजीकरण से फायदे से अधिक नुकसान हो सकता है. केंद्रीय बैंक के बुलेटिन में प्रकाशित लेख में कहा गया है कि निजी क्षेत्र के बैंक (पीवीबी) लाभ को अधिकतम करने में अधिक कुशल हैं, जबकि सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों ने वित्तीय समावेशन को बढ़ावा देने में बेहतर प्रदर्शन किया है. डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर (DBT) को मोदी सरकार की सबसे सफल योजनाओं में गिना जाता है. इस स्कीम के तहत नागरिकों को सीधे केंद्र सरकार की ओर से कई चीजों पर अलग-अलग रूपों में सब्सिडी दी जाती है. इसकी सफलता का श्रेय सरकारी बैंकों को ही जाता है.
बैंकों ने निभाई अहम भूमिका
लेख आगे कहता है, निजीकरण कोई नई अवधारणा नहीं है और इसके फायदे-नुकसान सबको पता हैं. पारंपरिक दृष्टि से सभी दिक्कतों के लिए निजीकरण प्रमुख समाधान है, जबकि आर्थिक सोच ने पाया है कि इसे आगे बढ़ाने के लिए सतर्क दृष्टिकोण की ज़रूरत है. डीबीटी योजना की सफलता में सरकारी बैंकों की अहम भूमिका है. इस योजना की शुरुआत 2013 में एक जनवरी को की गई थी, जिसका मकसद था पारदर्शिता और सब्सिडी वितरण में होने वाली धांधलियों को रोकना. यह स्कीम काफी सफल रही जिसकी वजह से इसे दुनिया की सबसे बड़ी स्कीम के रूप में गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स में जगह भी मिली है.
कई अध्ययनों का दिया हवाला
लेख में कई अध्ययनों का हवाला देते हुए बताया गया है कि सरकारी बैंकों ने कार्बन उत्सर्जन कम करने वाले उद्योगों में वित्तीय निवेश को उत्प्रेरित करने में अहम भूमिका निभाई है. इस वजह से ब्राजील, चीन, जर्मनी, जापान और यूरोपीय संघ जैसे देशों में हरित बदलाव को प्रोत्साहन मिला है. बता दें कि सरकार ने 2020 में 10 राष्ट्रीयकृत बैंकों का चार बड़े बैंकों में विलय कर दिया था. इसके बाद सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों की संख्या घटकर 12 रह गई है. अब सरकार सरकारी बैंकों को निजी हाथों में सौंपने की तैयारी कर रही है और वह इस मामले में कुछ भी सुनने को तैयार नहीं है. RBI ने यह स्पष्ट किया है लेख में व्यक्त विचार लेखक के हैं और ये आरबीआई के विचार नहीं हैं.
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