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प्रोजेक्ट चीता: क्या अति उत्साह में सुप्रीम कोर्ट की कही बात भी भूल गई शिवराज सरकार? 

कानून के जानकार मानते हैं कि सरकार को सुप्रीम कोर्ट के ऑर्डर में शामिल बातों को ध्यान में रखना चाहिए था.

नीरज नैयर 3 years ago

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के जन्मदिन पर देश को ‘चीतों’ का तोहफा मिला. नामीबिया से 8 चीते मध्य प्रदेश के कूनो नेशनल पार्क में बसाए गए हैं. वैसे तो इस खास मौके पर पूरे देश में उत्साह देखने को मिला, लेकिन भाजपा और मध्य प्रदेश सरकार कुछ ज्यादा ही उत्साह में नज़र आई और इस अति उत्साह में वो एक ऐसा काम पर बैठी, जिस पर अब सवाल उठ रहे हैं. 

सबने की अनदेखी! 
देश में चीतों को लाने के प्रोजेक्ट का खाका सबसे पहले यूपीए सरकार के कार्यकाल में तैयार किया गया था. हालांकि, बात ज्यादा आगे नहीं बढ़ सकी. क्योंकि सुप्रीम कोर्ट ने इस प्रोजेक्ट पर रोक लगा दी थी. केंद्र में सत्ता परिवर्तन के बाद फिर से प्रयास शुरू हुए और 2020 में सर्वोच्च अदालत ने प्रोजेक्ट पर लगी रोक हटा ली. मामले की सुनवाई के दौरान कोर्ट ने कहा कि सरकार इस प्रोजेक्ट पर आगे बढ़ सकती है, लेकिन साथ ही अदालत ने कुछ बिंदु भी रेखांकित किए, जिन पर सरकार को ध्यान देना था. ऐसे ही एक बिंदु को अति उत्साह में भाजपा, उसके नेता और यहां तक कि शिवराज सिंह सरकार नज़र अंदाज़ कर गई.

कोर्ट ने बताई थी वजह 
BW हिंदी के पास ‘Record of Proceedings’ की कॉपी है. जिसमें उल्लेख है कि ‘चूंकि चीते अफ्रीका से लाए जा रहे हैं इसलिए इसे चीतों की पुनर्स्थापना नहीं कहा जा सकता’. लेकिन मध्य प्रदेश के मंत्री, बड़े नेता और खुद सरकार इसे पुनर्स्थापना कहती आ रही है. इस संबंध में शासन की तरफ से अखबारों में फुलपेज विज्ञापन दिए गए, उनमें भी ‘चीतों की पुनर्स्थापना’ ही लिखा गया. अब सवाल ये उठता है कि क्या शिवराज सरकार को माननीय अदालत की कही बातों का ध्यान नहीं रखना चाहिए था? 

क्या कहते हैं एक्सपर्ट्स?
कानून के जानकार मानते हैं कि सरकार को सुप्रीम कोर्ट के ऑर्डर में शामिल बातों को ध्यान में रखना चाहिए था. सर्वोच्च अदालत यदि कुछ कहती है, तो उसकी कुछ वजह होती है. ऐसे में सरकार और सभी संबंधित संस्थाओं को कोर्ट की कही बातों का पालन करना चाहिए. हालांकि, उनका ये भी कहना है कि चूंकि इस मामले में मध्यप्रदेश सरकार पार्टी नहीं थी, इसलिए उसका कोर्ट की आपत्ति के बावजूद पुनर्स्थापना लिखना कोर्ट की अवमानना नहीं कहा जा सकता, लेकिन सरकार को ध्यान ज़रूर देना चाहिए था.

यह कहा था अदालत ने
28 जनवरी, 2020 के सुप्रीम कोर्ट के ऑर्डर में लिखा गया है, ‘हमने यह पाया है कि इस मामले में ‘Re-introduction’ शब्द का इस्तेमाल किया जा रहा है, जबकि तथ्य यह है कि अफ्रीकी चीता कभी भारत में नहीं रहे. इसलिए यदि अफ्रीकी चीता को भारत में रीलोकेट करने का प्रयास किया जाता है, तो इसे अफ्रीकी चीतों का ‘Introduction’ कहा जाना चाहिए, न कि ‘Re-introduction’. इस मामले की सुनवाई चीफ जस्टिस की बेंच ने की थी, जिसमें न्यायाधीश बीआर गवई और न्यायाधीश सूर्यकांत शामिल थे. 

‘Re-introduction में कुछ गलत नहीं’
हालांकि, RTI और वाइल्ड लाइफ एक्टिविस्ट अजय दुबे का कहना है कि ‘Re-introduction’ शब्द में कुछ गलत नहीं है. नेशनल टाइगर कंजर्वेशन अथॉरिटी (NTCA) इसकी नोडल एजेंसी है. हमारा वाइल्ड लाइफ लॉ कहता है कि जब किसी विदेशी जानवर को हम यहां लाते हैं, तो उसे फ्री रेंज में नहीं छोड़ा जा सकता. ऐसे जानवरों को कैप्टिव रखा जा सकता है. लेकिन यदि उन्हें फ्री छोड़ा जाएगा, तो फिर ये Introduction नहीं होगा. उन्होंने आगे कहा, ‘हिस्टोरिक रेंज में हमारे यहां चीते थे और अफ्रीकी चीतों का जीन हमारे चीतों से काफी मिलता-जुलता है. आप एक तरह से कह सकते हैं कि वो हमारे ही बिछड़े हुए भाई हैं. इसलिए इसे ‘Re-introduction’ ही कहा जाएगा. मुझे नहीं लगता कि सरकार ने  Re-introduction लिखकर कुछ गलत किया है.  

‘भावनाओं पर नहीं चलता विज्ञान’ 
वहीं, रिटायर्ड PCCF (Principal Chief Conservator of Forests) सुहास कुमार का कहना है कि भावनात्मक बातों से कंजर्वेशन बायोलॉजी के सिद्धांत नहीं बदले जा सकते. उनके मुताबिक, Re-introduction केवल तभी माना जाएगा जब किसी जीव को उसके ऐतिहासिक (Indigenous) रहवास स्थल में, जहां से वो विलुप्त हो गया हो, पुनः बसाया जाता है. किसी की व्यक्तिगत राय से कंजर्वेशन साइंस नहीं बदलती. अफ्रीकी चीता (Acinonyx Jubatus Jubatus), एशियाई चीते (A. Jubatus Venaticus) नहीं हैं. अफ्रीकी चीते भिन्न पारिस्थितिकी वातावरण में विकसित हुए हैं. अत: चाहे कितनी भी जेनेटिक समरूपता हो, उसे विदेशी ही माना जाएगा.  

कोर्ट को किया गया था गुमराह
सुप्रीम कोर्ट द्वारा गठित एक्सपर्ट्स कमेटी का हिस्सा रहे वाइल्डलाइफ प्रिजर्वेशन के पूर्व डायरेक्टर और रिटायर्ड IAS अधिकारी M.K. Ranjit Sinh का कहना है कि सुप्रीम कोर्ट ने अपने ऑर्डर में Relocation शब्द का इस्तेमाल किया है, जिसमें Re-introduction और Introduction दोनों ही आते हैं. ये नुक्ताचीनी चलती रही है, और आज भी चल रही है. IUCN की गाइडलाइन कहती है कि यदि वही प्रजाति नहीं मिलती, तो निकटमत उप-प्रजाति ला सकते हैं. उन्होंने आगे कहा कि इस मामले में पहले भी कोर्ट को गुमराह किया गया था. गलत जानकारी भी दी गई थी. हालांकि, 2020 में एमिकस क्यूरी ने अपने बयान में सुधार किया और कोर्ट ने इसे Re-introduction मान लिया था’. Sinh के मुताबिक, भले ही वही प्रजाति नहीं आई हो, लेकिन कोई प्रजाति तो आई है. चीता पहले भी भारत में थे और अब उन्हें दोबारा लाया गया है, इसलिए इसे Re-introduction बोला जा सकता है.

क्या कहती है IUCN की गाइडलाइन?
हालांकि, जिस IUCN की गाइडलाइन का M.K. Ranjit Sinh ने हवाला दिया है, उसमें इसे ‘कंजर्वेशन इंट्रोडक्शन’ का नाम दिया गया है. भारत सरकार के चीता एक्शन प्लान के चैप्टर 5.7 में IUCN की गाइडलाइन का जिक्र है. जो बताती है कि जानबूझकर ऐसे जीवों को उसके मूल क्षेत्र तक लाकर छोड़ना जहां से वो विलुप्त गए थे, Re-introduction कहा जाता है. लेकिन यदि वही प्रजाति नहीं मिल रही हो और उसकी निकटमत उप-प्रजाति को लाया जा रहा हो तो इसे ‘कंजर्वेशन इंट्रोडक्शन’ कहा जाएगा. IUCN का मतलब है इंटरनेशनल यूनियन फॉर कंजर्वेशन ऑफ नेचर. ये अंतर्राष्ट्रीय संस्था प्रजातियों को विलुप्त होने से बचाने के लिए काम करती है.


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