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चीन चिढ़ा, तुर्की नाराज, ऐसा क्या है इस Economic Corridor में, भारत को कैसे मिलेगा फायदा? 

भारत-अमेरिका-यूरोपीय यूनियन और सऊदी अरब के बीच जिस इकॉनोमिक कॉरिडोर पर सहमति बनी है, उससे चीन के साथ-साथ तुर्की को भी मिर्ची लग रही है.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 2 years ago

दुनिया के सबसे शक्तिशाली समूह G-20 के शिखर सम्मेलन की मेजबानी करके भारत ने बहुत कुछ हासिल किया है. कूटनीतिक, रणनीतिक और कारोबार के लिहाज से आने वाले समय में भारत को बड़े फायदे मिलने वाले हैं. इस दौरान, भारत-मिडिल ईस्ट-यूरोप इकनॉमिक कॉरिडोर (India Middle East Europe Economic Corridor) पर बनी सहमति को देश के लिए एक बड़ी उपलब्धि माना जा रहा है. भारत, यूरोपियन यूनियन (EU), अमेरिका और सऊदी अरब ने G-20 समिट के इतर इस महत्वकांक्षी प्रोजेक्ट पर सहमति जताते हुए एक एमओयू पर दस्तखत किए थे. इस प्रोजेक्ट में कुल 8 देश शामिल हैं.

कुल कितना आएगा खर्चा?
माना जा रहा है कि ये आर्थिक गलियारा यूरोप से एशिया तक दोनों महाद्वीपों में आर्थिक विकास को गति देगा. अमेरिका इस इकनॉमिक कॉरिडोर से बेहद खुश है और उसका कहना है कि इससे यूरोप से एशिया तक संपर्क के नए युग की शुरुआत होगी. इस कॉरिडोर के अमल में आने के बाद रेल और जहाज से भारत से यूरोप तक पहुंचा जा सकेगा. इसे चीन के बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (BRI) का जवाब माना जा रहा. इस इन्फ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट पर कितना खर्च आएगा, फिलहाल इसकी कोई जानकारी नहीं है, लेकिन अनुमान है कि इसकी लागत 20 अरब डॉलर के आसपास होगी. जानकारी के अनुसार, इस कॉरिडोर के दो हिस्से होंगे. पहला- ईस्टर्न कॉरिडोर, जो भारत को खाड़ी देशों से जोड़ेगा और दूसरा- नॉर्दर्न कॉरिडोर, जो खाड़ी देशों को यूरोप से जोड़ेगा.  इस कॉरिडोर में केवल रेल नेटवर्क ही नहीं होगा, बल्कि इसके साथ-साथ शिपिंग नेटवर्क भी होगा. 

चीन के बाद तुर्की का फूला मुंह
भारत की इस उपलब्धि से चीन तो चिढ़ा ही है, तुर्की को भी मिर्ची लग रही है. दरअसल, इकनॉमिक कॉरिडोर को आकार देने के लिए कुल 8 देश आगे आए हैं, इनमें भारत, UAE, सऊदी अरब, अमेरिका, फ्रांस, जर्मनी, इटली और EU शामिल हैं. हालांकि, इस प्रोजेक्ट का फायदा इस्राइल और जॉर्डन को भी मिलेगा, लेकिन ये कॉरिडोर तुर्की को बायपास करता है. इसी को लेकर तुर्की के राष्ट्रपति नाराज हैं. उनका यहां तक कहना है कि तुर्की के बिना कोई गलियारा नहीं हो सकता. क्योंकि पूर्व से पश्चिम की ओर जाने वाले ट्रैफिक को तुर्की से होकर गुजरना होगा. तुर्की उत्पादन और व्यापार का महत्वपूर्ण आधार है.

शिपिंग टाइम हो जाएगा काफी कम 
माना जा रहा है कि इस प्रोजेक्ट इकनॉमिक कॉरिडोर के अमल में आने के बाद शिपिंग टाइम 40% तक कम हो सकता है. जिसका सीधा मतलब है कि समय और पैसे की बचत. भारत से निकला सामान यूरोप कम समय में पहुंच सकेगा. इससे व्यापार बढ़ने की संभावनाएं भी उत्पन्न होंगी. एक रिपोर्ट के अनुसार, मौजूदा समय में भारत से समुद्री रास्ते से जर्मनी तक सामान पहुंचने में एक महीना लगता है, लेकिन कॉरिडोर बनने के बाद सामान महज दो हफ्ते में पहुंच जाएगा. फिलहाल, मुंबई से निकलने वाले कार्गो कंटनेर स्वेज नहर के रास्ते यूरोप पहुंचते हैं. कॉरिडोर बनने के बाद ये कंटेनर दुबई से इजरायल के हाइफा पोर्ट तक ट्रेन से जा सकेंगे. 

कारोबार नहीं होगा प्रभावित
स्वेज नहर एशिया को यूरोप से और यूरोप को एशिया से जोड़ती है. तेल का अधिकतर कारोबार इसी नहर के रास्ते होता है. ऐसे में यदि इस रूट पर कोई दिक्कत आती है, जैसे कि 2021 में एक बड़े जहाज के फंसने से हुई थी, तो कॉरिडोर के रूप में एक विकल्प भी होगा और किसी भी सूरत में अंतरराष्ट्रीय कारोबार प्रभावित नहीं होगा. एक्सपर्ट्स मानते हैं कि इस कॉरिडोर के जरिए भारत से लेकर मिडिल ईस्ट और फिर यूरोप तक कारोबार करना तो आसान होगा ही, साथ ही एनर्जी रिसोर्सेस के ट्रांसपोर्ट और डिजिटल कनेक्टिविटी में भी मजबूती आएगी.


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