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Happy Birthday PM Modi: जो मनमोहन नहीं कर सके, मोदी ने कर दिखाया 

इसमें कोई शक नहीं है कि मनमोहन सिंह के कार्यकाल में अमेरिका से परमाणु करार एक बड़ी उपलब्धि था, मगर उसके प्रारूप से लेकर प्रावधानों तक में अमेरिकी वर्चस्व साफ तौर पर नजर आता था.

नीरज नैयर 3 years ago

"तुम्हें गैरों से कब फुर्सत, और हम गम से कब खाली, चलो बस हो गया मिलना न तुम खाली, न हम खाली". पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के कार्यकाल में भारत और रूस के संबंधों की व्याख्या इसी शेर से की जाती थी. मनमोहन सिंह भारतीय इतिहास के पहले ऐसे प्रधानमंत्री रहे, जिनका मॉस्को दौरा महज 24 घंटे में खत्म हो गया. ये वो दौर था, जब सदियों के दोस्त रहे भारत और रूस का रिश्ता टूटने की कगार पर था. केवल अंतर्राष्ट्रीय बाध्यताएं और ज़रूरतें रिश्ते की तार को जोड़े हुई थीं. ऐसा लगने लगा था जैसे हमारी हर सफलता में शरीक रहा रूस, अब हमसे दूर जा रहा है, लेकिन फिर अचानक कुछ ऐसा हुआ कि तार-तार हो चुके रिश्तों में आपसी गर्माहट महसूस की जाने लगी. एक-दूसरे को समझने और साथ देने का दौर फिर से लौट आया. ये 'अचानक’ था केंद्र में सत्ता परिवर्तन. मनमोहन सिंह की विदाई और नरेंद्र मोदी की प्रधानमंत्री के रूप में ताजपोशी.

बनाई भारत की अलग पहचान
मोदी के सत्ता में आने के बाद देश में बहुत कुछ बदला, लेकिन सबसे ज्यादा बदलाव विदेश नीति को लेकर हुए. देश में हुए 'बदलावों' पर सवाल उठाए जा सकते हैं, लेकिन विदेश नीति की दिशा में जो भी बदलाव हुए उससे भारत और भारतीय दोनों का मान बढ़ा. आज पूरी दुनिया में भारत की एक अलग पहचान है. उसे सशक्त राष्ट्र और एक ऐसे देश के रूप में देखा जाता है जो दुश्मन को उसके घर में घुसकर मारता है. मोदी की विदेश नीति फुटबॉल के उस खिलाड़ी की तरह है जिसे पता होता है कि कहां डिफेंसिव होना है और कहां अर्गेविस होकर गोल दागना है. पीएम मोदी ने न केवल रूस के साथ रिश्तों को मजबूत किया है, बल्कि उन देशों को भी करीब लाए हैं, जिनकी अतीत में अनदेखी होती रही थी.  

संतुलित विदेश नीति अपनाई 
इसमें कोई शक नहीं है कि मनमोहन सिंह के कार्यकाल में अमेरिका से परमाणु करार एक बड़ी उपलब्धि था, मगर उसके प्रारूप से लेकर प्रावधानों तक में अमेरिकी वर्चस्व साफ तौर पर नजर आता था. यह कहना गलत नहीं होगा कि यूपीए सरकार की विदेश नीति पूरी तरह से अमेरिका के इर्द-गिर्द ही सिमटकर रह गई थी और  इसी के चलते वामदलों का कांग्रेस से तलाक हुआ. इसके विपरीत मोदी सरकार ने बेहद संतुलित तरीके से सभी देशों को साथ लेकर चलने की रणनीति पर काम किया है. सबसे अच्छी बात यह है कि पाकिस्तान को लेकर जो दोहरा रवैया पिछली सरकार के वक्त नजर आता था, वैसी स्थिति अब नहीं है. मोदी इस बात को बखूबी समझते हैं कि किसी एक के ज्यादा करीब जाना रणनीतिक संतुलन के लिहाज से नुकसानदायक हो सकता है, इसलिए वे रूस, अमेरिका, चीन के साथ-साथ जापान, नेपाल, श्रीलंका और भूटान को बराबरी का सम्मान दे रहे हैं. बतौर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की पहली आधिकारिक यात्र भूटान थी, जो इस बात का सबसे बड़ा सबूत है. जबकि आमतौर पर प्रधानमंत्री अपने विदेश दौरों की शुरुआत किसी सशक्त देश से करते हैं.

कांग्रेस की खोदी खाई को पाटा
कांग्रेस के कार्यकाल में भारत और श्रीलंका के बीच जो दूरियां बढ़ी थीं, उसे मौजूदा सरकार ने पाटा है. श्रीलंका भले ही इस वक्त संकट से दौर से गुजर रहा है. लेकिन इसके बावजूद सामरिक तौर पर वो हमारे लिए उतना ही महत्वपूर्ण है जितना कि नेपाल.  हालांकि, मनमोहन सिंह के शासन में ऐसी कई गंभीर गलतियां हुईं, जिसने श्रीलंका को दोस्त से दुश्मन बनने की तरफ अग्रसर कर दिया था. उदाहरण के तौर पर, जब लिट्टे से संघर्ष के दौरान श्रीलंका को हमारे साथ की सबसे ज्यादा जरूरत थी, तब तमिलनाडु में अपनी राजनीति बचाने के लिए कांग्रेस ने हाथ खड़े कर दिए. चीन ने इसका फायदा उठाते हुए श्रीलंका को हथियारों की सप्लाई की़ इसके बाद से भारत के प्रति श्रीलंका का मिजाज तल्ख होता गया. ये तल्खी कई बार श्रीलंकाई सेना द्वारा भारतीय मछुआरों के साथ बर्बरता के रूप में सामने आई थीं.  

शैतान पड़ोसी को दिया संदेश
मोदी सरकार दूर होते नेपाल को पास लाने की दिशा में भी उल्लेखनीय कार्य कर रही है. पिछली सरकार के कार्यकाल में भारत और नेपाल के बीच एक अदृश्य सीमा खिंच गई थी, जिसका फायदा चीन उठा रहा था लेकिन आज स्थिति ऐसी नहीं है. वहीं, मौजूदा वक्त में चीन से रिश्ते भले ही ज्यादा बेहतर नहीं हुए हैं, लेकिन PM मोदी उस तक यह संदेश पहुंचाने में सफल रहे हैं कि भारत अब पहले वाला भारत नहीं है. इसमें कोई दोराय नहीं कि सीमा विवाद सुलझाने में ख़ास प्रगति नहीं हुई है, लेकिन इस दिशा में प्रयास जारी हैं. मोदी मानते हैं कि आपसी संवाद का दायरा जितना विस्तृत होगा, दोनों मुल्कों के लोग एक-दूसरे के जितना करीब आएंगे सीमा विवाद जैसे जटिल मुद्दे सुलझने की संभावना उतनी ही अधिक रहेगी.

सबको साथ लेकर चलने की सोच
केवल पड़ोसी या चुनिंदा देश ही नहीं, मोदी के कार्यकाल में सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात, इजरायल, ईरान  और फिलस्तीन जैसे अलग-अलग धड़ों वाले देशों से भी भारत बेहतर संबंध स्थापित करने में कामयाब रहा है, जो वाकई एक बड़ी उपलब्धि है. मोदी आज एक ब्रांड बन गए हैं, एक ऐसा ब्रांड जो विदेशों में भारत की छवि को लगातार चमकाने में व्यस्त है. विभिन्न अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलनों में PM मोदी की मौजूदगी देखकर इसका अहसास किया जा सकता है. दुनिया के महत्वपूर्ण नेताओं के साथ मोदी के ‘घर जैसे’ रिश्ते हैं. अफ्रीका और दक्षिण प्रशांत के देशों के साथ उन्होंने रिश्तों को नया आयाम दिया है. 

बहुआयामी रही है हमारी विदेश नीति
आज पूरे विश्व में भारत का नाम सम्मान के साथ लिया जाता है, भारतीय प्रधानमंत्री से मिलने, उनसे हाथ मिलाने की होड़ हर तरफ देखी जा सकती है. कुल मिलाकर कहा जाए तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में पिछले कुछ सालों में भारत की विदेश नीति बहुआयामी रही है. घरेलू मोर्चे पर ज़रूर सरकार की कुछ नीतियों को लेकर मतभिन्नता है, लेकिन विदेश नीति पर सवाल की कोई गुंजाइश नज़र नहीं आती. लिहाजा, इस मामले में यह कहना गलत नहीं होगा कि जो काम बतौर प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह नहीं कर सके, वो नरेंद्र मोदी ने कर दिखाया.
 


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