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राजनीतिक पार्टियों के 'चंदे के बदले कैश' पर बड़ा खुलासा, Non GST सामानों से उठा रहीं फायदा

कुछ दिन पहले चुनाव आयोग ने नियमों का उल्लंघन करने वाली 2100 रजिस्टर्ड राजनीतिक पार्टियों पर कार्रवाई की थी. चुनाव आयोग ने पाया था कि इनमें से कई पार्टियां गंभीर वित्तीय अनियमितताओं में शामिल थीं.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 4 years ago

नई दिल्ली: चंदे के नाम पर धंधा कर रहे राजनीतिक दलों पर इनकम टैक्स विभाग की टेढ़ी नजर है. इनकम टैक्स विभाग देश 8 बड़े राज्यों पर देश की राजधानी दिल्ली, उत्‍तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, पंजाब, गुजरात, पश्चिम बंगाल, महाराष्ट्र और बिहार में छापेमारी कर रही है. ऐसी सैकड़ों पार्टियों के कच्चे चिट्ठे खोले जा रहे हैं जो सालों से चंदे के नाम पर काले को सफेद कर रही थीं, सैकड़ों ऐसी पार्टियां भी मिलीं जो सिर्फ कागजों में थी, हकीकत में नहीं. 

IT विभाग की छापामारी 
बुधवार को आयकर विभाग ने दिल्ली समेत देश के 8 राज्यों में 50 से ज्यादा ठिकानों पर अलग-अलग टीमों के साथ कई रजिस्टर्ड गैर-मान्यता प्राप्त राजनीतिक पार्टियों (RUPP) पर छापे मारे हैं. बताया जा रहा है कि ये छापेमारी राजनीतिक दलों की ओर से चंदे के नाम पर धन उगाहने के मामले को लेकर की जा रही है. सूत्रों के मुताबिक इनकम टैक्स विभाग को ये भी पता चला है कि चंदे के नाम पर कई राजनीतिक पार्टियां मनी लॉन्ड्रिंग में भी लिप्त हैं. विभाग ये भी पता लगाने की कोशिश में जुटा है कि ये पार्टियां क्या टैक्स चोरी कर रही हैं, इनके पीछे किसका हाथ है. इनकम टैक्स विभाग के निशाने पर कई छोटी राजनीतिक पार्टियां भी हैं, जिन पर शक है कि ये डोनेशन के बदले कैश के खेल में शामिल हैं. आरोप हैं कि एंट्री ऑपरेटरों के जरिए कारोबारी पार्टियों को चंदा दे रहे थे और बदले में कैश ले रहे थे.  

चुनाव आयोग के आदेश के बाद ऐक्शन
आपको बता दें कि कुछ दिन पहले चुनाव आयोग ने नियमों का उल्लंघन करने वाली 2100 रजिस्टर्ड राजनीतिक पार्टियों पर कार्रवाई की थी. चुनाव आयोग ने पाया था कि इनमें से कई पार्टियां गंभीर वित्तीय अनियमितताओं में शामिल थीं. इनकम टैक्स विभाग के ये छापे चुनाव आयोग की उस कार्रवाई के बाद मारे जा रहे हैं जिसमें 87 पार्टियों को RUPP यानी रजिस्टर्ड अनऑर्गेनाइज्ड पॉलिटिकल पार्टियों  की लिस्ट से हटा दिया गया था. मुख्य चुनाव आयुक्त राजीव कुमार ने राजस्व विभाग को फर्जी चंदा लेने वाली ऐसी पार्टियों के खिलाफ कार्रवाई करने के निर्देश दिए थे. उनकी ओर से CBDT को ऐसी राजनीतिक पार्टियों की एक लिस्ट अलग से भेजी गई. उसके बाद आधा दर्जन से ज्यादा राज्यों में इनकम टैक्स डिपार्टमेंट ने छापे मारे. खबर ये भी है कि फिजिकल वेरिफिकेशन में इन पार्टियों का कुछ अता-पता नहीं चला, ये सिर्फ कागजों पर ही थीं. इसके साथ ही कई पार्टियों ने अपने आप को मिल रहे चंदों और अपने पदाधिकारियों के बारे में जानकारी नहीं दी थी. 

करोड़ों की टैक्स छूट क्लेम 
इनकम टैक्स विभाग के मुताबिक 199 रजिस्टर्ड गैर-मान्यता प्राप्त राजनीतिक पार्टियों  ने साल 2018-19 में 445 करोड़ रुपये की टैक्स छूट क्लेम किए थे, जबकि साल 2019-20 के दौरान ऐसी 219 पार्टियों ने 608 करोड़ रुपये की इनकम टैक्स छूट क्लेम की थी. नियम के मुताबिक इन पार्टियों को फॉर्म 24A के रूप में कंट्रीब्यूशन रिपोर्ट सौंपनी होती है, लेकिन इन पार्टियों में से कई ने ऐसे किसी कंप्लायंस का पालन नहीं किया, चुनाव आयोग के मुताबिक ऐसी 2174 पॉलिटिकल पार्टियों ने कंट्रीब्यूशन रिपोर्ट नहीं सौंपी है, इसलिए उनके की ओर से लिया गया चंदा शक के दायरे में है. 

ऐसे चल रहा था 'डोनेशन के बदले कैश' का खेल 
अपने आदेश में, चुनाव आयोग ने कहा कि कुछ RUPPs के बारे में गंभीर वित्तीय अनियमितताएं मिली हैं. चुनाव आयोग ने पाया कि ये राजनीतिक पार्टियां फर्जी चंदे की रसीदें देती थीं. अब समझिए ये खेल कैसे चल रहा था. जो भी व्यक्ति या कंपनी या कारोबारी इन पार्टियों को चंदा देता अपना कमीशन काटकर पार्टियां रसीद के साथ बाकी पैसा लौटा देती हैं. इससे ऐसा लगता है कि चंदा व्हाइट में लिया गया है, जिससे उन्हें आगे टैक्स में छूट भी मिल जाती है.

इसको ऐसे समझिए कि मान लीजिए किसी कारोबारी ने राजनीतिक पार्टी को 10 लाख रुपये चंदा का दिया, लेकिन राजनीतिक पार्टी अगर पूरे 10 लाख के चंदे की रसीद काटेगी, इससे न तो कारोबारी का भला होगा न पार्टी का, इसलिए पार्टी अपनी कमीनशन मान लीजिए 20 परसेंट या 2 लाख रुपये काट लेती है, लेकिन रसीद पूरे 10 लाख की काटकर देती है. बाकी का 8 लाख रुपये कारोबारी को लौटा देती है, इससे कारोबारी को 8 लाख बिल्कुल व्हाइट होकर मिल भी गए और पार्टी को 2 लाख का कमीशन मिल गया. 8 लाख का हिसाब वो यहां वहां के खर्चे दिखाकर पूरा कर लेगी, जबकि ऐसा कोई खर्च हुआ नहीं होता.

इसके लिए राजनीतिक पार्टियों ने कई शेल कंपनियां बना रखी थीं. मामले की जानकारी रखने वाले बताते हैं कि राजनीतिक पार्टियां ऐसे सामानों की खरीदारी करती हैं जिस पर GST नहीं लगता, खर्चे दिखाने के नाम पर गरीबों के लिए निवास, वृद्धाश्रम, NGO उन्होंने रजिस्टर करा रखे थे, उन्हीं के नाम पर खरीदारी दिखाकर टैक्स की छूट ली जा रही थी. कभी स्कूलों में किताबें बांटने, कभी कंबल बांटने के नाम पर तो कभी सार्वजनिक लंगर के नाम पर खर्च दिखाए जाते, जिससे उन्हें कोई टैक्स न देना पड़े. जब ऑडिट होता तो इन खर्चों का कोई रिकॉर्ड न मिलता. काले को सफेद में करने का ये धंधा इन राजनीतिक पार्टियों की ओर से सालों से चल रहा है. 

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