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Explainer: मेक इन इंडिया के 8 साल! 'फ्लॉप' रही या 'हिट'
साल 14-15 से लेकर 17-18 के दौरान मैन्यूफैक्चर्ड गुड्स का एक्सपोर्ट करीब 17-19 लाख करोड़ रुपये था. जो कि साल 18-19 में बढ़कर 23.07 लाख करोड़ रुपये हो गया.
बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 3 years ago
नई दिल्ली: Make in India को 8 साल हो चुके हैं. 25 सितंबर 2014 को जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मैन्यूफैक्चरिंग सेक्टर को रिफॉर्म करने के लिए इस फ्लैगशिप स्कीम का ऐलान किया था, तब से लेकर अबतक इसकी कामयाबी और नाकामी को लेकर बहस होती आई है. सरकार इसकी हमेशा गुलाबी तस्वीर पेश करती है जबकि आलोचक तल्ख अंदाज में इसकी नाकामी गिनाते हैं, इसे सिर्फ कानों को अच्छा लगने वाला स्लोगन बताते हैं.
तो सच क्या है, क्या मेक इन इंडिया एक असफल प्रयास है या इसने देश के मैन्यूफैक्चरिंग सेक्टर की तस्वीर बदलकर रख दी, जैसा की सरकार का दावा है. इसका सीधा-सीधा 'हां' या 'ना' में जवाब देना थोड़ा मुश्किल है और न्यायसंगत भी नहीं है. सही तस्वीर सामने तभी आएगी जब हमें बिंदु से बिंदु का मिलान करेंगे. हम आंकड़ों के जरिए समझेंगे कि सच क्या है. आंकड़ों से बेहतर जवाब इस सवाल का कुछ नहीं हो सकता. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की इस फ्लैगशिप स्कीम को हम तीन पैरामीटर पर परखेंगे- विदेशी निवेश यानी FDI, एक्सपोर्ट और ईज ऑफ डूइंग बिजनेस. तो चलिए एक एक करके इन आंकड़ों पर नजर डालते हैं
FDI के मोर्चे पर
सरकार के मुताबिक साल 2014-15 में भारत में 45.15 बिलियन डॉलर का FDI आया और इन 8 सालों के दौरान FDI रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया. साल 2021-22 में सबसे ज्यादा 83.6 बिलियन डॉलर विदेशी निवेश आया. ये विदेशी निवेश 101 देशों से आया. जिसका फायदा देश के 57 सेक्टर्स को पहुंचा. सरकार का लक्ष्य है कि इस वित्त वर्ष में FDI 100 बिलियन डॉलर पहुंच जाएगा. जब साल 2014 में मेक इन इंडिया की शुरुआत की गई थी तो इसका मकसद था देश में घरेलू मैन्यूफैक्चरिंग को बढ़ावा देना, देश को दुनिया का मैन्यूफैक्चरिंग हब बनाना. इसके लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पूरी दुनिया में जहां भी गए मेक इन इंडिया का जिक्र किया. विदेशी कंपनियों को भारत आकर निवेश करने की अपील की. इसके लिए उन्होंने कई सेक्टर्स में FDI के दरवाजे खोले. लक्ष्य ये भी है कि मेक इन इंडिया के जरिए मैन्यूफैक्चरिंग सेक्टर को इतना मजबूत किया जाए ताकि GDP में उसका योगदान साल 2025 तक 25% हो जाए. जो कि साल 2021 तक 17-18% के करीब था, हालांकि साल 2016 में ये सिर्फ 14% ही था. साल 2015 में भारत ने FDI के मामले में चीन और अमेरिका को भी पीछे छोड़ दिया, इस दौरान भारत में 60.1 बिलियन डॉलर FDI आया. FDI के मोर्चे पर अभी तक मेक इन इंडिया का प्रदर्शन शानदार दिखता है, और साल 2025 तक 100 बिलियन डॉलर का लक्ष्य भी कठिन नहीं मालूम होता.
एक्सपोर्ट के मोर्चे पर
साल 14-15 से लेकर 17-18 के दौरान मैन्यूफैक्चर्ड गुड्स का एक्सपोर्ट करीब 17-19 लाख करोड़ रुपये था. जो कि साल 18-19 में बढ़कर 23.07 लाख करोड़ रुपये हो गया. यानी इस दौरान एक्सपोर्ट में सालाना आधार पर 17.95% की ग्रोथ देखने को मिली. लेकिन इसके बाद आई कोरोना महामारी ने इस ग्रोथ को पहिये को पूरे दो साल तक थाम लिया, फैक्ट्रियों पर दो साल तक ताला पड़ा रहा. साल 20–21 के दौरान एक्सपोर्ट में 21.60 लाख करोड़ रुपये की गिरावट दर्ज की गई. मगर जब फैक्ट्रियों के ताले खुले तो वित्त वर्ष 21-22 में एक्सपोर्ट बढ़कर 31.46 लाख करोड़ रुपये पहुंच गया, और ये कोई मामूली बात नहीं थी. इस ग्रोथ ने साबित कर दिया कि मेक इन इंडिया में दम है, ऐतिहासिक सालाना ग्रोथ 45.72% दर्ज की गई, हालांकि आलोचकों का कहना है कि ये उछाल पिछले साल की गिरावट से मापी गई है, लेकिन ये भूल जाते हैं कि कोरोना महामारी जैसी त्रासदी से जहां चीन और अमेरिका जैसी अर्थव्यवस्थाएं अबतक नहीं उबर पाईं, भारत का मैन्यूफैक्चरिंग सेक्टर अपने पैरों पर वापस खड़ा हो गया. आलोचक ये भी तर्क देते हैं कि ये ग्रोथ तो रुपये के टर्म में है, क्योंकि रुपया कमजोर है, इसलिए ये इतना ज्यादा दिख रहा है, उनके लिये जवाब ये है कि वित्त वर्ष 2021-22 में डॉलर टर्म में ये 4,21,890 मिलियन डॉलर रहा है, जो कि सालाना आधार पर 44.58% ज्यादा है.
ईज़ ऑफ डूइंग बिजनेस के मोर्चे पर
नरेंद्र मोदी सरकार ने मेक इन इंडिया की राह में आने वाली दिक्कतों को समझा और उसी के आधार पर कई रिफॉर्म भी किए. ज्यादातर सेक्टर्स के लिए FDI का ऑटोमैटिक रूट खोला गया.
साल 2021 में ईज ऑफ डूइंग बिजनेस के लिए नेशनल सिंगल विंडो सिस्टम की शुरुआत की गई, ये एक सिंगल डिजिटल प्लेटफॉर्म है जहां निवेशकों को अप्रूवल और क्लीयरेंस मिलेगा. इस सिस्टम में तमाम मंत्रालयों, विभागों के मल्टीपल क्लीयरेंस सिस्टम को एक साथ जोड़ा गया. ताकि निवेशकों को अप्रूवल के लिए जगह जगह भटकना न पड़े. इस पहल में राज्य सरकारों को भी जोड़ा गया. इसके अलावा मल्टीमॉडल कनेक्टिविटी स्कीम गतिशक्ति को भी लॉन्च किया गया है. जो देश के मैन्यूफैक्चरिंग जोन को जोड़ेगा और लॉजिस्टिक क्षमता को बढ़ावा देगा. इससे सामानों का मूवमेंट तेज होगा और लॉजिस्टिक लागत में भी कमी आएगी. इसके अलावा 14 मुख्य मैन्यूफैक्चरिंग सेक्टर्स के लिए सरकार ने PLI स्कीम भी चलाई है. जिसका फायदा घरेलू मैन्यूफैक्चरिंग को मिल रहा है. अब जरा ईज ऑफ डूइंग बिजनेस को लेकर वर्ल्ड बैंक की रैंकिंग पर नजर डाल लेते हैं. साल 2014 में भारत की रैंकिंग 142 थी, 190 देशो की लिस्ट में भारत की इस स्थिति को अच्छा नहीं कहा जा सकता. लेकिन इसके बाद इसमें लगातार सुधार देखने को मिला. साल 2017 में ये 42 पायदान उछलकर 100 हो गई, साल 2018 में ये 23 पायदान उछलकर 100 हो गई. साल 2019 में ये 63 हो गई और अब भी ये 63वें पायदान पर है.
जब से मेक इन इंडिया की शुरुआत हुई है, दुनिया की बड़ी बड़ी कंपनियों ने भारत का रुख किया है. कुछ कंपनियों पर नजर
- Apple जैसी कंपनी ने भारत में अपने iPhone की मैन्यूफैक्चरिंग शुरू की. अनुमान है कि 76 परसेंट फोन जो भारत में बेचे जाएंगे वो मेक इन इंडिया होंगे.
- साल 2016 में Hitachi ने चेन्नई में ऑटो कंपोनेट प्लांट की शुरुआत की
- अप्रैल 2017 में Kia ने भारत में $1.1 बिलियन का निवेश किया और आंध्र प्रदेश के अनंतपुर में एक मैन्यूफैक्चरिंग प्लांट लगाया
- यूरोपियन ऑटोमोबाइल कंपनी PSA ने साल 2017 में ही CK Birla Group के साथ करार किया है, ये तमिलनाडु में 7000 करोड़ रुपये का कार मैन्यूफैक्चरिंग प्लांट लगाएँगे
- इसी तरह जुलाई 2017 में SAIC Motor ने ₹2,000 करोड़ की लागत से गुजरात के हलोल में मैन्यूफैक्चरिंग प्लांट लगाने का ऐलान किया
-Boeing ने भी भारत में फाइटर प्लेन की असेंबिंग के लिए प्लांट लगाने का ऐलान किया है
आंकड़ों से तो यही जाहिर होता है कि मेक इन इंडिया ने जो लक्ष्य साधा था, उस दिशा में वो सफलतापूर्वक अग्रसर हो रही है, लेकिन ग्रोथ की लाइन कभी सीधी नहीं होती, कभी उतार और कभी चढ़ाव किसी भी देश की इकोनॉमी का हिस्सा होते हैं. मायने सिर्फ ये रखता है कि जो ग्रोथ के लिए आपने जो रिफॉर्म अपनाए हैं, वो कितने ठोस और आसान हैं. ग्रोथ एक सतत चलने वाली प्रक्रिया है, इसे एक रात, एक महीने या एक साल में नहीं मापा जा सकता, लेकिन मेक इन इंडिया का रास्ता और मंजिल फिलहाल दोनों ही सही है, ये जरूर कहा जा सकता है.
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