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सुस्त अर्थव्यवस्था के बावजूद दुनिया की भारत पर नजर!
मौजूदा वक्त में तमाम पड़ोसी मुल्कों की तुलना में भारत की स्थिति कई मामलों में बेहतर है, बावजूद इसके कुछ मामलों में हम वैश्विक रूप से पिछड़े हैं जो हमें कमजोर करते हैं.
बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 3 years ago
- अजय शुक्ल
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जैन अंतर्राष्ट्रीय व्यापार संगठन कनेक्ट 2022 के उद्घाटन सत्र में कहा कि दुनिया भारत की ओर बड़े भरोसे से देख रही है. भारत के विकास के संकल्पों को दुनिया अपने लक्ष्यों की प्राप्ति का माध्यम मान रही है. चाहे वैश्विक स्थान, वैश्विक समृद्धि, वैश्विक चुनौतियों का समाधान हो या वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं को सशक्त बनाने का काम, दुनिया को भारत पर भरोसा है.
नेहरू ने की थी शुरुआत
मोदी ने कहा, भविष्य का हमारा रास्ता और मंजिल दोनों स्पष्ट है. आत्मनिर्भर भारत ही हमारा रास्ता और संकल्प है. निश्चित रूप से उन्होंने सही कहा. बगैर आत्मनिर्भर हुए कोई देश आगे नहीं बढ़ सकता. यही वजह है कि प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू ने आत्मनिर्भर देश बनाने के लिए सरकारी उपक्रमों की श्रृंखला खड़ी की थी, जिससे पूंजीवाद हावी न हो जाये और कुछ लोगों के बीच में ही संपत्ति और नकदी न सिमट जाये. निःसंदेह हमारी अर्थव्यवस्था विश्व की सबसे तेज बढ़ती अर्थव्यवस्था है मगर उसकी सुस्ती चिंताजनक भी है.
5 ट्रिलियन का सपना
मोदी देश की अर्थव्यवस्था को 5 ट्रिलियन की बनाने की सोच रखते हैं. बीते वित्तीय वर्ष में देश की जीडीपी 147.35 ट्रिलियन थी. इसे जब 5 ट्रिलियन पर ले जाने की सोच हो, तो कुछ पूंजीपतियों के बजाय सबके हाथ में पर्याप्त नकदी होना जरूरी है. हम आजादी का अमृत महोत्सव मना रहे हैं. पिछले 75 सालों में देश की जनसंख्या जिस अनुपात में बढ़ी है, उस अनुपात में देश के नागरिकों की जीवनशैली नहीं बढ़ सकी है. आजादी के वक्त जीडीपी 2.7 लाख करोड़ थी. देश में भारी उद्योगों की बात छोड़िये, मध्यम और लघु उद्योगों की तादाद बेहद कम थी. कृषि क्षेत्र ही सबसे बड़ा रोजगार था. ऐसे में भारी उद्योगों को सार्वजनिक क्षेत्रों में स्थापित करके आम नागरिक के हाथ में नकदी पहुंचाने का काम किया गया. उसकी खरीदी क्षमता बढ़ने से बाजार में नकदी पहुंची, जिसने निजी और सार्वजनिक दोनों क्षेत्रों का विकास किया. डॉलर के मुकाबले रुपये का मूल्य 1964 तक स्थिर रहा, जिससे हर क्षेत्र में विकास देखने को मिला.
कुछ मामलों में पिछड़े
मौजूदा वक्त में तमाम पड़ोसी मुल्कों की तुलना में भारत की स्थिति कई मामलों में बेहतर है, बावजूद इसके कुछ मामलों में हम वैश्विक रूप से पिछड़े हैं जो हमें कमजोर करते हैं, जैसे प्रेस फ्रीडम इंडेक्स, हंगर इंडेक्स, हैप्पीनेस इंडेक्स आदि. देश की आजादी के वक्त हमारी अर्थव्यवस्था बहुत कमजोर थी. उसे आत्मनिर्भर बनाने के लिए प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने मिश्रित अर्थव्यवस्था का मॉडल चुना था. मोदी सरकार इस मॉडल से इतर पूंजीवादी अर्थव्यवस्था को मजबूत करने में लगी है. इस दौरान कई पूंजीपतियों ने देश और देश के बाहर निवेश करके अर्थव्यवस्था को गति दी है. समस्या यह है कि वो जरूरी रोजगार मुहैया कराने में असफल रहे हैं.
व्यापार घाटा बढ़ा
इसको लेकर अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष के पूर्व मुख्य आर्थिक सलाहकार एवं आरबीआई के गवर्नर रहे रघुराम राजन मानते हैं कि रोजगार के अवसर न होने से अर्थव्यवस्था नहीं सुधर सकती. इससे सिर्फ कुछ पूंजीपतियों को ही लाभ होता है. जरूरत हर हाथ को पैसा देने की है. जब सबसे नीचे के व्यक्ति के पास नकदी आएगी, तो वो बाजार भागेगा और बाजार की पूरी चेन लाभ कमाएगी, जिससे सरकार को भारी राजस्व मिलेगा मगर ऐसा नहीं हो पा रहा है, जो अर्थव्यवस्था के लिए खतरनाक है. विशेषज्ञों का मानना है कि भारत की अर्थव्यवस्था एक ध्रुवीय नहीं है, जिससे उसे चीन और अमेरिका की कोल्ड वार से बचकर बीच का रास्ता निकालना चाहिए/ वजह, भारत का व्यापार घाटा बहुत बढ़ा है.
कर्ज का बोझ भी बढ़ा
चालू वित्तीय घाटा 2022-23 की पहली तिमाही में दोगुने से भी अधिक बढ़कर 30 अरब डॉलर हो गया है. इससे पहले की तिमाही में यह घाटा 13 अरब डॉलर था. यही नहीं भारत के कोर उत्पादन के निर्यात वाले उत्पादों में गिरावट जारी है. डॉलर के मुकाबले रुपया सर्वकालिक निचले पायदान पर है. देश पर कर्ज का बोझ बढ़ता जा रहा है मगर उसको चुकाने के लिए हमारे पास उत्पाद लाभ नहीं है. इस वक्त देश की अर्थव्यवस्था टैक्स और सेस पर निर्भर होकर रह गई है, जिससे नागरिकों पर भारी बोझ है. यह बोझ डर पैदा करता है, जिससे वो खर्च करने के बजाय नकदी बचाने की जुगत में रहता है.
आसान नहीं राह
अगर यही हाल रहा तो देश की जीडीपी नहीं बल्कि कुछ कंपनियों की जीडीपी ही बढ़ेगी. ऐसे में आत्मनिर्भर भारत का सपना सिर्फ सपना रह जाएगा. अवसरों की समानता या प्रतिस्पर्धा खत्म होकर आर्थिक खाई बढ़ती जा रही है. हालांकि पिछले कुछ सालों में सर्विस सेक्टर में निर्यात 15.8 अरब डॉलर की सालाना दर से इस साल 60.3% बढ़ा है मगर यह रोजगार के उतने अवसर पैदा करने में सफल नहीं हुआ है, जितने की आवश्यकता है. भारत की अर्थव्यवस्था के पांच ट्रिलियन डॉलर पर पहुंचाने का सपना आसान नहीं है. दुनिया हमें बड़े उपभोक्ता बाजार की तरह देखती है. हमारी जनसंख्या जहां ताकत है, वहीं उसके लिए पर्याप्त नकदी और रोजगार न होने सबसे बड़ी समस्या. पांच ट्रिलियन डॉलर पर पहुंचने के लिए हमें जापान और जर्मनी को पछाड़ना होगा, जो इतना आसान नहीं है. भारत अभी 2.73 ट्रिलियन डॉलर के साथ छठे स्थान पर है मगर सामाजिक और आर्थिक समस्याओं की भरमार के कारण हम आत्मनिर्भर बनकर आगे नहीं बढ़ पा रहे हैं. जून में हमारा व्यापार घाटा बढ़कर 26.18 अरब डॉलर हो गया है. निर्यात सिर्फ 23% बढ़ा मगर आयात 55% बढ़ा है. यानी हम आत्मनिर्भर बनने के बजाय आश्रित अधिक तेजी से बन रहे हैं.
यह करना होगा
5 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था के लक्ष्य को हासिल करने के लिए हमें लगातार पांच साल तक 9 प्रतिशत की वृद्धि दर पर आना होगा. निवेश की कुल दर को जीडीपी को 38 फीसदी पर लाना होगा. इसके लिए सबसे जरूरी है हर हाथ को रोजगार, जिसका वातावरण निर्मित नहीं हो पा रहा है. सरकार को चाहिए कि सार्वजनिक क्षेत्र को मजबूत करके उसमें रोजगार सुलभ कराये. कॉरपोरेट को अधिक रोजगार पैदा करने के लिए रोड मैप तैयार करे और एमएसएमई सेक्टर को मजबूती प्रदान करे. जब ऐसा होगा, तभी दुनिया हमें सम्मान से देखेगी, नहीं तो वो उपभोक्ता और दयनीयता के लहजे से देख रही है.
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