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अपनी किस्मत, अपने हाथ: जो चाहेंगे वही मिलेगा बस करना है ये काम

‘‘ऐसा हो गया, इसलिए ऐसा हुआ’’ आदि बहानों का सहारा लेकर अपने को बहलाने के बजाए यदि आप इरादा दृढ़ रखें तो अपने सपनों के अनुसार अपना भविष्य बना सकते हैं.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 3 years ago

  • पी.के. खुराना, हैपीनेस गुरू 

हम भारतवासी संतों-फकीरों के बारे में सुनते आये हैं, जो हर स्थिति में प्रसन्न रहते थे. हम सन्यासी न भी बनें तो भी अक्सर हमारा दिल चाहता है कि हम शांत और खुशनुमा जीवन जी सकें, दुख हमें परेशान न करे और हमारे जीवन में सुख और खुशियां हों. पर क्या आप जानते हैं कि खुश रहना, प्रसन्न रहना और सुखी रहना हमारे अपने हाथ में है. अब आप यह पूछेंगे कि अगर खुश रहना हमारे हाथ में है तो संसार में इतना दुख, इतनी तकलीफें क्यों हैं?

विचार ही हैं कारण
हम जो भी करते हैं, निर्णय लेते हैं या अनुभव करते हैं उससे हमें या तो प्रसन्नता होती है या दुख मिलता है. इस कार्य, अनुभव अथवा निर्णय से जुड़े हमारे विचार ही हमारे सुख या दुख का कारण होते हैं. हमारा नजरिया ही हमें उदास, दुखी, कुंठित, प्रसन्न, उल्लसित अथवा शांत बनाता है. आपकी खुशी और आपका दुख आपके विचारों पर निर्भर करते हैं. आप अपने मस्तिष्क को कैसे प्रशिक्षित करते हैं, अपनी आदतें कैसी बनाते हैं तथा जीवन में किस प्रकार समन्वय लाते हैं, यह आपके अपने हाथ में है. 

सिगरेट छोड़ने की कहानी
कुछ वर्ष पूर्व मेरे दो मित्रों ने सिगरेट पीना छोड़ने का निश्चय किया. जब हम दोबारा मिले तो एक मित्र सिगरेट पीना छोड़ चुका था जबकि दूसरा सिगरेट पीने की आदत के कारण अब भी परेशान चल रहा था. कई प्रयत्नों के बाद भी वो सिगरेट से पीछा नहीं छुड़ा पा रहा था. जब हम तीनों एकसाथ बैठे तो मेरे दूसरे मित्र ने पहले मित्र से पूछा, ‘‘आप सिगरेट पीना छोड़ने में कैसे सफल हुए?’’ ‘‘सीधी-सी बात है,’’ पहले मित्र ने उत्तर दिया, ‘‘मैं सिगरेट पीना इसलिए छोड़ पाया क्योंकि मैं सिगरेट पीना छोड़ना चाहता था.’’ ‘‘क्या मतलब है आपका,’’ दूसरे मित्र ने प्रतिवाद किया, ‘‘क्या मैं सिगरेट पीना छोड़ना नहीं चाहता?’’ ‘‘नहीं, असल बात यह है कि, पहले मित्र ने खुलासा किया, ‘‘आप सिगरेट पीना छोड़ नहीं रहे थे, सिर्फ छोड़ने का प्रयत्न कर रहे थे. आप जो करना चाहते हैं उसकी कोशिश मत कीजिए, बस कर डालिये. मैंने सोच लिया कि अब मैं सिगरेट नहीं पीऊंगा तो नहीं पी, बस नहीं पी.’’
‘‘इतना साधारण समाधान, और इतना प्रभावी!’’ मैंने मन ही मन सोचा। इस एक घटना ने मेरी सोच ही बदल डाली। आप जो भी करना चाहें उसकी राह में कोई बाधा नहीं है, बाधा सिर्फ आप हैं. खुश रहना या दुखी रहना भी हमारी अपनी इच्छा पर निर्भर है.

स्वतंत्र इच्छा का सिद्धांत
‘‘ऐसा हो गया, इसलिए ऐसा हुआ’’ आदि बहानों का सहारा लेकर अपने को बहलाने के बजाए यदि आप इरादा दृढ़ रखें तो आप अपने सपनों के अनुसार अपना भविष्य बना सकते हैं. यह प्रकृति का सिद्धांत है. जब आपकी सोच आपका जुनून बन जाए तो दुनिया की कोई शक्ति आपको मनचाहा पाने से नहीं रोक सकती. इतिहास गवाह है कि जो लोग सफलता प्राप्त कर पाये हैं उनका जीवन भी बाधाओं से भरपूर था. समस्याओं से वे भी वाबस्ता हुए, पर उन्होंने उद्देश्य की प्राप्ति के लिए सिर्फ प्रयत्न ही नहीं किया, बल्कि जान लड़ा दी.

हर क्षेत्र पर होती है लागू 
आप जो चाहते हैं, वही पा लेते हैं. यह बात जीवन के हर क्षेत्र में लागू होती है. यदि एक अधिकारी कार्यालय के कार्य में इतना डूब जाए कि उसे अपने परिवार, और खुद अपनी सेहत का ध्यान न रहे तो कुछ वर्षों बाद उसका क्या हश्र होगा, सोचना कठिन नहीं है. एक अन्य अधिकारी जो कार्यालय सिर्फ इसलिए जाता है कि वहां चाय पीते हुए दो-चार साथियों से गपशप हो जाती है, सारी उम्र यह नहीं समझ पायेगा कि पदोन्नति के वक्त उसे क्यों भुला दिया जाता है.

छटपटाहट से मुक्ति
जब हमारा कोई नुकसान हो जाए या कोई व्यक्ति हमारा कोई नुकसान कर दे तो हमें चोट तो लगेगी ही. कभी उसकी भरपाई हो सकती है और कभी नुकसान ऐसा हो जाता है कि उसकी भरपाई संभव नहीं हो पाती. ऐसे में हम क्या करें? दिल में बदले की भावना पाल लें, नुकसान की वजह से उदास हो जाएं या नुकसान के बावजूद जीवन में आगे चलने के लिए जो कर सकते हैं, वह करना आरंभ कर दें? ‘भूल जाओ और माफ करो’ इसीलिए हर धर्म का मूलमंत्र है, क्योंकि यह आपके गुस्से से आपके शत्रु को ही नहीं बचाता बल्कि आपको भी छटपटाहट से मुक्ति दिलाता है. आप भी ऐसा कर सकते हैं. आप भी प्रसन्न रह सकते हैं. अपने मन की बाधाओं को हटाइये और खुले आकाश में उड़िये. यह आपका अधिकार भी है और कर्तव्य भी! 


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