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विश्व पुस्तक दिवस: 'TSUNDOKU' और 'DOKUSHO', किताबों से जुड़े दो खास जापानी व्यसन

आज (23 अप्रैल, 2025) को वर्ल्ड बुक डे के अवसर पर डॉ. गोयल किताबों के प्रति अपने प्रेम, उन्हें संजोकर रखने और समय मिलने पर उनसे ज्ञानार्जन करने की बात करते हैं.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 1 year ago

मुझे लगता है कि बचपन से ही मैं दो प्रकार के व्यसनों से ग्रसित रहा हूँ. शुक्र है कि ये ऐसे व्यसन हैं, जिनके लिए किसी डॉक्टर की जरूरत नहीं (यहाँ तक कि खुद से इलाज की भी नहीं), ये व्यसन जापानी नामों से सबसे अच्छे से पहचाने जाते हैं, ये 'त्सुन्दोकु' (TSUNDOKU) और 'दोकुशो' (DOKUSHO) हैं.

क्या है 'त्सुन्दोकु' (TSUNDOKU) और 'दोकुशो' (DOKUSHO) का अर्थ?

त्सुन्दोकु उस प्रवृत्ति को कहते हैं, जिसमें कोई व्यक्ति किताबें या अन्य पढ़ने की सामग्री खरीदता तो है, लेकिन उन्हें पढ़े बिना घर में जमा करता चला जाता है. यह शब्द उन अनपढ़ी किताबों के संग्रह को भी दर्शाता है जो किताबों की अलमारी में "बाद में पढ़ने" के इरादे से रखी जाती हैं. दोकुशो का अर्थ है “किताबें पढ़ना” और मैं तो जीवन भर एक दोकुशोजिन (जुनूनी पाठक) रहा हूँ.

त्सुन्दोकु एक जापानी शब्द है (स्थानीय उच्चारण: “सुन-डो-कू”) जो किताबें खरीदकर उन्हें बिना पढ़े जमा कर देने की आदत को दर्शाता है. यह शब्द स्वयं अनपढ़ किताबों के ढेर को भी दर्शा सकता है. इसका उद्गम जापान के मेइजी युग में हुआ और इसका प्रयोग किसी नकारात्मक अर्थ में नहीं किया जाता, बल्कि यह एक आदत के रूप में किताबें खरीदते रहने के व्यवहार का वर्णन करने वाला शब्द है और मैं इस आदत का बचपन से ही दोषी हूँ, जेबखर्च का पहला ठिकाना चॉकलेट या आइसक्रीम नहीं बल्कि कॉमिक्स हुआ करता था, चाहे वे पुरानी हों या किनारों से फटी हुई. फिर किताबें इकट्ठा करने की आदत शुरू हुई फिक्शन, कविता, फैंटेसी, साइंस फिक्शन, थ्रिलर, रोमांस, ऐतिहासिक, और ढेर सारी नॉनफिक्शन  आत्मकथाएं, जीवनी, संस्मरण, सेल्फ-हेल्प, मोटिवेशनल और फिर बिजनेस, बिजनेस और सिर्फ बिजनेस.

फिर से त्सुन्दोकु की बात करें, यह वह क्रिया है जिसमें पढ़ने की सामग्री (विशेषकर किताबें) तो खरीदी जाती हैं लेकिन उन्हें पढ़े बिना ही घर में जमा कर लिया जाता है (हाँ, मैं दोषी हूँ, दोषी हूँ, दोषी हूँ!), ऐसा माना जाता है कि यह शब्द 19वीं सदी के अंत में उत्पन्न हुआ, संभवतः एक व्यंग्यात्मक तरीके से, और अब जापान में इसका उपयोग किताबों को इकट्ठा करने की आदत का वर्णन करने के लिए व्यापक रूप से होता है, भले ही वह वास्तविक संग्रहण (hoarding) न हो. यह ध्यान देना जरूरी है कि त्सुन्दोकु को कोई नकारात्मक या अपमानजनक शब्द नहीं माना जाता. यह सिर्फ एक आदतन किताबें खरीदने के व्यवहार का वर्णन करता है जिसमें पढ़ने की मंशा तो होती है, पर पढ़ना तुरंत नहीं होता, जबकि त्सुन्दोकु एक विशिष्ट जापानी शब्द है, यह अंग्रेजी के शब्द “बिब्लियोफिलिया” (किताबों का प्रेम) और किताबें इकट्ठा करने की सामान्य प्रवृत्ति से संबंधित है. त्सुन्दोकु उन किताबों के प्रेमियों के लिए एक सामान्य बात है जो नई किताबें खरीदना पसंद करते हैं लेकिन उन्हें तुरंत पढ़ने का समय नहीं निकाल पाते, लेकिन वे उन्हें पढ़ेंगे… उम्मीद है, जल्द ही.

दोकुशो, जैसा कि मैंने पहले बताया था, इसका अर्थ है "किताबें पढ़ना" और मैं जीवन भर एक दोकुशोजिन रहा हूँ. मैंने पहली बार मिखाइल शोलोखोव की विशाल 4-भाग वाली पुस्तक “एंड क्वाइट फ्लोज द डॉन” को तब पढ़ना शुरू किया जब मैं आठवीं कक्षा में था, क्योंकि मेरी मां ने उसे हाल ही में पढ़ा था. मैं कुछ ही पन्नों के बाद रुक गया. ग्रेजुएशन के दौरान दूसरी कोशिश में मैं वॉल्यूम 1 के पार पहुँच गया लेकिन शेष तीन किताबों को आगे पढ़ने की हिम्मत नहीं जुटा सका. इसलिए "डॉन" हमारी चंडीगढ़ स्थित पारिवारिक लाइब्रेरी की शेल्फ पर पड़ा रहा, जब तक कि मैंने तीन साल पहले इसे पूरा नहीं पढ़ा, यानी मेरी पिछली कोशिश के करीब 40 साल बाद, वैसे, शोलोखोव को इस उपन्यास के लिए 1965 में साहित्य का नोबेल पुरस्कार मिला था और मैं सच में बहुत ही कम लोगों को जानता हूँ जिन्होंने इस उपन्यास के सभी चार वॉल्यूम्स को पूरी लगन और बहादुरी के साथ पूरा पढ़ा हो.

जो व्यक्ति पढ़ता नहीं, उसका कोई लाभ नहीं

पढ़ना यानी जानना और अधिक जानना, बहुत अधिक जानना, जैसा कि मार्क ट्वेन ने संक्षेप में कहा है, “जो व्यक्ति अच्छी किताबें नहीं पढ़ता, उसका कोई लाभ नहीं है उस व्यक्ति की तुलना में जो उन्हें पढ़ नहीं सकता.” मेरी 'अच्छी' किताबों की शुरुआत इनिड ब्लाइटन और हार्डी बॉयज़ से हुई, लेकिन जल्द ही मैं विलियम शेक्सपीयर तक पहुँच गया,  मैंने जूलियस सीजर, मैकबेथ, किंग लियर, ओथेलो, हैमलेट, रोमियो और जूलियट से लेकर ऑल्स वेल दैट एंड्स वेल, ऐज यू लाइक इट, द कॉमेडी ऑफ एरर्स, द टेम्पेस्ट, एंटनी और क्लियोपेट्रा और हाल के वर्षों में कोरिओलेनस, सिम्बेलीन, लुक्रेस, पेरिक्लीज़ और यहां तक कि द विंटर’स टेल भी पढ़ा. आप वास्तव में शेक्सपीयर से कभी ऊब नहीं सकते. वह सदा हरा-भरा और अमर है.

एक समय था जब कॉलेज में जेन ऑस्टेन ने मुझे बहुत आकर्षित किया. मैंने एक ही सप्ताह में एम्मा, सेंस एंड सेंसिबिलिटी और प्राइड एंड प्रेजुडिस पढ़ डाली. कई वर्षों बाद मैंने अंततः मैंसफील्ड पार्क, नॉर्थेंजर एबे, लेडी सुसान और लव एंड फ्रेंडशिप पढ़ी (इसमें मुझे लगभग 6 महीने लगे, वह भी टुकड़ों में) क्योंकि मैंने ये किताबें खरीद तो ली थीं, लाइब्रेरी में सजा रखी थीं लेकिन पढ़ने का समय ही नहीं मिला था.

किताबों ने बनाया समृद्ध और जागरूक

वास्तव में पढ़ना मेरे बचपन में एक दैनिक आदत थी. मेरी माँ संस्कृत की विद्वान थीं और हर प्रकार की किताबें बहुत अधिक पढ़ती थीं. मेरी माँ की पढ़ने की अविश्वसनीय गति थी. एक घंटे में 100 पृष्ठ और किताब पूरी करने के बाद आप उनसे किसी भी हिस्से का संदर्भ पूछ सकते थे. मैंने भी अंग्रेजी साहित्य में ऑनर्स करते समय अपनी गति लगभग 80 पृष्ठ प्रति घंटे तक पहुंचा ली थी, लेकिन पढ़ने की मात्रा कम होने के साथ गति भी धीमी हो गई। मेरे पिता, इंजीनियरिंग में डॉक्टरेट थे, तकनीकी साहित्य में अधिक रुचि रखते थे लेकिन फुर्सत के समय वे भी चुपचाप पढ़ते रहते थे, इसलिए हमारा घर हमेशा किताबों से भरा रहता था और मेरे पास पांच साल की उम्र से ही एक लाइब्रेरी कार्ड था. मेरे लिए किताबों ने मुझे समृद्ध किया है, मुझे जागरूक बनाया है, और दुनिया को देखने का मेरा दृष्टिकोण व्यापक किया है. चाहे वह ऐन रैंड रही हों या अधिक लोकप्रिय हैरॉल्ड रॉबिंस, या फिर आर्थर हेले की विश्वकोश जैसी कथाएँ – मुझे हर पुस्तक में डूब जाना पसंद था. हर बिजनेस ट्रिप पर, होटल के हर अकेलेपन भरे रात में, मैं अपने साथ एक किताब लेकर गया हूँ.

3000 पुस्तकें मेरी संपत्ति

मुझे किताबें खरीदने का कोई अपराधबोध नहीं है,  भले ही मैं उन्हें तुरंत पढ़ न सकूँ. देर-सबेर, मैं वह किताब उठा ही लेता हूँ जिसे मैंने वर्षों या महीनों पहले खरीदा था. एक बात तय है  वह किताब पढ़ी जाएगी. उसका समय आएगा. हम अभी अपने मुंबई स्थित घर की लाइब्रेरी का नवीनीकरण करवा रहे हैं. वहाँ 3000 से अधिक किताबें हैं. वे मेरी संपत्ति हैं. ज्ञान की, सीखने की, आत्मीयता की, सुकून की और खुशी की.

(अतिथि लेखक- डॉ. संदीप गोयल, चेयरमैन, रेडिफ्यूजन (Rediffusion)) 


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