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बड़ा सवाल: आखिर कमजोर क्यों पड़ रहे हैं आर्थिक सुधार के दावे?   

सरकार अपनी नीतियां बनाते वक्त समग्र स्थितियों पर ध्यान दे और एफएंडआर (वित्त एवं राजस्व) नियमों का कड़ाई से पालन करे.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 3 years ago

अजय शुक्ला, वरिष्ठ पत्रकार
मोदी सरकार ने आमजन के लिए सड़कों पर चलना और भी महंगा कर दिया है. सड़कों को मुनाफे में बदला जा सके, इसके लिए केंद्र सरकार ने अपने बजट में राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण को सड़कों के विकास के लिए बजट बढ़ा दिया है. इस वित्त वर्ष में राष्ट्रीय राजमार्गों के लिए 2.70 लाख करोड़ रुपये का बजट आवंटित किया गया है. इसमें सबसे अधिक हिस्सा पेड सड़कों यानी राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (एनएचएआई) के बजट में बीते वित्त वर्ष की तुलना में 1.42 लाख करोड़ से बढ़ाकर 1.62 लाख करोड़ रुपये किया गया है. तमाम सरकारी दावों और महंगे टोल के बाद भी सरकार राजस्व घाटे को लेकर परेशान है. एनएचएआई अपने जीवन में कर्ज के शीर्ष पर पहुंच चुकी है. पिछले वित्तीय वर्ष की समाप्ति पर जो कर्ज 3.49 लाख करोड़ रुपये का था, वो अब तकरीबन 4 लाख करोड़ का हो चुका है. यह स्थिति तब है जबकि टोल टैक्स वसूली के साथ ही सरकार का राजस्व भी बढ़ा है. 

लगातार बढ़ रहा कर्ज का बोझ
मौजूदा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सरकार पर कर्ज लगातार बढ़ता जा रहा है. एनएचआई पर बढ़े कर्ज की अदायगी काफी महंगी पड़ रही है. कर्ज की अदायगी वक्त पर करने के लिए सरकार ने अब अपनी संपत्तियां, सड़कें और कुछ अन्य संसाधन बेचकर फंड जुटाने की योजना तैयार की है. सड़कों के निजीकरण की योजना पर केंद्र सरकार की सहमति बन चुकी है. एनएचएआई 25 हजार करोड़ की टोल सड़कें टीओटी (टोल ऑपरेट ट्रांसफर) के आधार पर देने जा रही है. इसके साथ ही 19 हजार करोड़ की संपत्ति बेचने को लेकर भी सहमति बन चुकी है. सरकार ने अब एनएचएआई को नए ऋण लेने के लिए बाजार में जाने के बजाय अपने संसाधनों का इस्तेमाल करने को कहा है. एनएचएआई की तमाम परियोजनाएं अधर में लटकी हैं, आम चुनाव के पहले वो पूरी करने पर जोर है. इसके लिए सरकार ने टोल रेट बढ़ाने के साथ ही संपत्तियों को बेचने की योजना तैयार की है.

RBI का अनुमान बहुत आशावादी
हम देश की अर्थव्यवस्था में सकारात्मकता देखते हैं मगर नीतियां कई बार भ्रम तोड़ देती हैं. हालांकि जापानी ब्रोकरेज कंपनी नोमुरा ने उम्मीद जताई है कि वित्त वर्ष 2023-24 में भारत की आर्थिक वृद्धि दर 6.5 फीसदी रहने का जो अनुमान रिजर्व बैंक (आरबीआई) ने जताया है वो ‘बहुत आशावादी’ है. यह भी उम्मीद जताई है कि अक्टूबर से ब्याज दरों में कटौती शुरू हो सकती है. उसने चालू वित्त वर्ष में भारत की वृद्धि दर के घटकर 5.3 फीसदी रहने की संभावना जताई है. नोमुरा ने RBI के वृद्धि पूर्वानुमान में एक फीसदी से अधिक की कमी आने की आशंका जताते हुए कमजोर वैश्विक वृद्धि, अनिश्चितता बढ़ने और घरेलू मौद्रिक नीति में सख्ती के प्रभावों को इसके लिए जिम्मेदार बताया है. ब्रोकरेज कंपनी ने जून के बाद मुद्रास्फीति के लक्ष्य से थोड़ा पीछे रहने और वृद्धि पर उसका असर पड़ने की आशंका भी जताई है. वहीं विश्व बैंक ने 2023-24 के अपने दिसंबर के जीडीपी के अनुमान को 6.6 फीसदी को घटाकर 6.3 फीसदी कर दिया है. उधर, एशियाई विकास बैंक (एडीबी) ने स्पष्ट किया है कि भारत की अर्थव्यवस्था इस साल उम्मीद से कम 6.4 फीसदी की दर से बढ़ेगी. दोनों संस्थाओं का विकास का अनुमान आरबीआई के फरवरी के 2023-24 में 6.4 फीसदी की वृद्धि दर के अनुमान के करीब है.

विदेशी मुद्रा भंडार में गिरावट
हम वित्तवर्ष की शुरुआत के साथ ही अर्थव्यवस्था की चुनौतियों को स्पष्ट तौर पर देख रहे हैं. आरबीआई के आंकड़ों के मुताबिक, देश का विदेशी मुद्रा भंडार भी 31 मार्च को 32.9 करोड़ डॉलर घटकर 578.45 अरब डॉलर रह गया है. वित्तवर्ष 2022-23 में कुल विदेशी मुद्रा भंडार में 28.86 अरब डॉलर की गिरावट दर्ज की गई. अक्टूबर 2021 में देश का कुल विदेशी मुद्रा भंडार 645 अरब डॉलर के उच्चतम स्तर पर था. इसके साथ ही मुद्रा भंडार का अहम हिस्सा, विदेशी मुद्रा आस्तियां 3.6 करोड़ डॉलर घटकर 509.691 अरब डॉलर रह गयी हैं. वहीं, इसी अवधि में भारत का स्वर्ण भंडार का मूल्य भी 27.9 करोड़ डॉलर घटकर 45.20 अरब डॉलर रह गया है. विशेष आहरण अधिकार (एसडीआर) 2.7 करोड़ डॉलर घटकर 18.392 अरब डॉलर पर पहुंच गया. आरबीआई ने रेपो रेट न बढ़ाकर सही दिशा में कदम उठाये हैं. रेपो रेट बढ़ने से महंगाई को नियंत्रित कर लेने के दावे में दम नजर नहीं आया बल्कि कुछ अन्य संकट जरूर खड़े हो गये हैं. शायद यही वजह है कि भारतीय रिजर्व बैंक ने रेपो रेट में कोई बदलाव नहीं किया है. बैंक की मौद्रिक नीति समिति ने रेपो दर को 6.50 फीसदी पर ही रखने का फैसला किया. दरों में बदलाव न होने से विकास को बढ़ावा मिलने के साथ ही मुद्रास्फीति तय लक्ष्य पर बनी रहेगी. हमने देखा है कि पिछले 11 महीनों में, रेपो दर में 250 आधार अंकों की छह बार में ऐतिहासिक वृद्धि की गई थी, जिसके नतीजे बहुत अच्छे नहीं रहे. आरबीआई गवर्नर शक्तिकांत दास ने माना कि इस अस्थिरता के बीच, भारत का बैंकिंग और गैर-बैंकिंग वित्तीय सेवा क्षेत्र संतुलित बना हुआ है, और वित्तीय बाजार व्यवस्थित तरीके से विकसित हुए हैं.

अमेरिकी संकट देश के लिए बड़ी सीख
अमेरिका का बैंकिंग संकट भारत के लिए एक बड़ी सीख है. आरबीआई को विफल वित्तीय कंपनियों के समाधान पर अधूरी नीतिगत पहल पूरी करनी चाहिए. जिससे भविष्य के अनुमान के करीब हम पहुंच सकें. बैंकिंग संकट के वक्त लोग डरने लगते हैं. बैंकों में भी हर वक्त रकम की उपलब्धता सदैव नहीं होती है, क्योंकि वो जमा रकम से ही कारोबार करती हैं. जब अचानक ग्राहक डर से रकम निकालने लगते हैं तो संकट अधिक हो जाता है. बैंकों पर आफत आने से साधारण जमाकर्ताओं-किसान, पेंशनधारक, अनुबंध पर काम करने वाले कामगारों-के लिए संकट बढ़ाने वाला होता है. इस समस्या से निपटने के लिए सरकारें तिहरा ढांचा बनाती हैं, मगर बीते वक्त में भारत में यह ढांचा चरमराया है. जिससे वित्तीय संकट लगातार खड़ा होता है. कर्ज की अदायगी से लेकर निवेश तक में यह संकट बना हुआ है. पहला उपाय नियमन तैयार कर बैंकों के दिवालिया होने के जोखिम को कम किया जाता है. दूसरे उपाय के तौर पर केंद्रीय बैंक अन्य बैंकों के लिए काम करता है. तीसरे उपाय के तौर पर बैंकों के लिए विशेष दिवालिया ढांचा होता है, जो साधारण जमाकर्ताओं को उनकी जमा रकम पर बीमा सुविधा देता है.

जरूरत इसकी है कि सरकार अपनी नीतियां बनाते वक्त समग्र स्थितियों पर ध्यान दे और एफएंडआर (वित्त एवं राजस्व) नियमों का कड़ाई से पालन करे. आमजन की आमदनी बढ़ाने के साथ ही रिजर्व फंड को सुरक्षित करने की स्थिति में रहे. रोजगार के अवसर अधिकतम बढ़ाने पर काम करे. जब इस दिशा में तेजी से काम होगा, तो संकट अपने आप कम हो जाएंगे.
 


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