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अमेरिकी बैंक संकट से भारतीय बैंकों के लिए क्‍या है सीख?

 भारतीय शेयर बाजार पहले ही उच्च मूल्यांकन, तंग मौद्रिक स्थितियों और अडानी समूह पर हिंडनबर्ग रिपोर्ट के कारण घाटे से जूझ रहा है.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 3 years ago

अमेरिका में सिलिकॉन वैली बैंक (एसवीबी) के बाद अब सिग्नेचर बैंक पर भी ताला लग गया है. ब्रिटेन में भी सिलिकॉन वैली बैंक ऑफ अमेरिका की यूके इकाई पर भी पिछले सप्ताह ताला लगा था, जिसे एचएसबीसी ने सिर्फ 1 पाउंड में खरीद लिया. अधिग्रहण की कीमत सिर्फ सिंबोलिक है, क्योंकि सिलिकॉन वैली बैंक का पूरा कर्ज सरकार समर्थित है. इससे डील के बाद एचएसबीसी को कोई कर्ज नहीं चुकाना होगा. दूसरी तरफ अमेरिका के सिग्नेचर बैंक के बंद होने से संकट और बढ़ गया है. इस बैंक के पास क्रिप्टोकरेंसी का भंडार था. सिग्नेचर बैंक बड़ी रियल एस्टेट कंपनियों को कर्ज देता है. इसे फेडरल डिपॉजिट इंश्योरेंस कॉरपोरेशन अधिग्रहण कर लिया. अमेरिकी ट्रेजरी विभाग और अन्य बैंक नियामकों ने एक संयुक्त बयान में कहा, 'करदाताओं को सिग्नेचर बैंक और सिलिकॉन वैली बैंक के किसी भी नुकसान का बोझ नहीं उठाना पड़ेगा'. बावजूद इसके, इन बैंकों की तालाबंदी का असर भारतीय बैंकिंग सेक्टर से लेकर कैप मार्केट में दिखने लगा है. यह किस हद तक नुकसान को बढ़ाएगा, यह भविष्य की गर्त में है मगर आशंकायें चिंताजनक हैं.

अमेरिकी बैंको का असर दिखा भारतीय बाजार पर 

अमेरिका की दोनों बैंकों की तालाबंदी का असर भारतीय शेयर बाजार में भी देखने को मिला. सप्ताह के पहले कारोबारी दिन सोमवार को सेंसेक्स 897 अंक गिरकर 58,237 पर बंद हुआ. वहीं निफ्टी में भी 257 अंकों की गिरावट आई है. सेंसेक्स के 30 में से 29 शेयर नुकसान के साथ बंद हुए. इस गिरावट से निवेशकों के 4 लाख करोड़ रुपये डूब गए. बीएसई में लिस्टेड कंपनियों का टोटल मार्केट कैप 258.95 लाख करोड़ रुपए पर पहुंच गया है. पिछले सप्ताह यह 262.94 लाख करोड़ रुपए था. निफ्टी में 50 में 45 शेयरों में गिरावट रही. निफ्टी-50 में इंडसइंड बैंक, एसबीआई, टाटा मोटर्स, एमएंडएम, अडानी पोर्ट्स, आयशर मोटर्स, एक्सिस बैंक, बजाज फिनसर्व समेत 45 शेयरों में गिरावट रही. केवल 4 स्टॉक टेक महिंद्रा, अपोलो हॉस्पिटल्स, ब्रिटानिया और ओएनजीसी आगे बढ़े. विशेषज्ञों का मानना है कि अमेरिका में बैंकिंग संकट से यह स्पष्ट है कि केंद्रीय बैंक महंगाई पर काबू पाने की प्रक्रिया में मंदी की संभावना पर विचार नहीं कर रहे हैं. एसवीबी के ठप होने से भारतीय बैंकों और प्रौद्योगिकी क्षेत्र की चिंता भी बढ़ी हैं. अमेरिकी बैंकिंग व्यवस्था में आई दिक्कत का कुछ असर यहां भी देखा जा सकता है.

हिंडनबर्ग रिपोर्ट से पहले ही बाजार हिला हुआ था मगर इन बैंकों के बंद होने से एक बार फिर वही स्थिति पैदा हुई है. एनएसई के सभी 11 सेक्टोरल इंडेक्स में गिरावट रही. सबसे ज्यादा 2.87 फीसदी की गिरावट पीएसयू बैंक सेक्टर में देखी गई. बैंक, ऑटो, मीडिया और निजी बैंक सेक्टर में भी 2 फीसदी से अधिक की गिरावट आई है. वित्तीय सेवाएं और रियल्टी क्षेत्र भी 1 फीसदी से अधिक गिर गए. एफएमसीजी, आईटी, मेटल और फार्मा सेक्टर में भी मामूली गिरावट आई है.

सेबी की जांच के दायरे में कई कंपनियां 

हिंडनबर्ग की रिसर्च रिपोर्ट के आने से पहले और बाद में शॉर्ट-सेलिंग के घरेलू और विदेशी दोनों तरह से लेनदेन को लेकर सेबी की निगरानी के दायरे में तकरीबन एक दर्जन से अधिक कंपनियां उसके दायरे में आ गई हैं. अदाणी समूह के शेयर मूल्यों में इजाफे की जांच करने वाला सेबी इन कंपनियों के कारोबारी आंकड़ों और कारोबार के स्वरूप की भी जांच कर रहा है, जो कथित रूप से शॉट-सेलिंग में शामिल रहीं और खासा मुनाफा कमाया. हिंडनबर्ग रिपोर्ट के आने के बाद से अदाणी समूह की सात सूचीबद्ध सूची के मूल्यों में लगभग 135 अरब डॉलर की गिरावट आ चुकी है. ऐसे में सेबी यह जांच कर रही है कि क्या शॉर्ट-सेलिंग करने वाली कंपनियों को हिंडनबर्ग की रिपोर्ट की जानकारी पहले से थी? इस जांच में नतीजा कुछ भी निकले मगर नुकसान बाजार का हुआ. अब इन बैंकों की तालाबंदी ने संकट खड़ा कर दिया है. यह संकट आर्थिक मंदी की स्थिति में बाजार को कहां ले जाएगा? यह सवालों में है.

भारतीय बाजार से तरलता खत्‍म हो रही है

हम लगातार देख रहे हैं कि कैप बाजारों में जोखिम बढ़ रहे हैं, मगर इसमें बड़े कॉरपोरेट समूह में हुई बिकवाली अधिक रही है. अल्पावधि से मध्यावधि में, जोखिम अधिक बना रहेगा. भारतीय बाजार अतिरिक्त तरलता के कारण पिछले डेढ़ साल तेजी से बढ़ा था. अब यह तरलता खत्म हो रही है. हम गिरावट के बजाय कंसॉलिडेशन साफ दिख रहा है. हालांकि, तकनीकी तौर पर बाजार अल्पावधि से मध्यावधि में अनिश्चित बने रह सकते हैं, मगर भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए संभावनाएं खत्म नहीं हुई हैं. मंदी का खतरा मंडरा रहा है मगर भारत इससे निपटने में सामान्य तौर पर सक्षम है.र

भारतीय बैंकों के लिए नहीं है संकट 

भारतीय रिजर्व बैंक इस संकट से निपटने के लिए घरेलू कंपनियों और बैंकों पर इन दोनों अमेरिकी बैंकों की तालाबंदी से पड़ने वाले असर का आकलन कर रहा है. बैंकिंग नियामक ने एसबीवी सहित अन्य वित्तीय जमा को लेकर सूचना हासिल कर रहा है. बैंकिंग नियामक इन अमेरिकी बैंकों में हमारे निवेशकों का ब्योरा हासिल करने में जुटा है. इसके साथ ही नियामक अमेरिका में बैंक के विफल होने के मद्देनजर देश की वित्तीय प्रणाली पर इसके असर का आकलन कर रहा है. कुछ भारतीय बैंकों का अमेरिका में भी परिचालन है. इनमें भारतीय स्टेट बैंक, आईसीआईसीआई बैंक, बैंक ऑफ बड़ौदा और बैंक ऑफ इंडिया आदि शामिल हैं. बैंकरों के मुताबिक भारतीय कंपनियों का अमेरिका के इन बैंकों में अधिक रकम नहीं लगी है. भारतीय बैंकों की तरलता पर्याप्तता है. इससे अधिक चिंतित होने का कोई कारण मौजूद नहीं है.

भारतीय बैंकों के लिए क्‍या है सीख 

हम भी बैंकरों और अर्थ विशेषज्ञों की राय से इत्तेफाक रखते हैं. हमारा मानना है कि भारतीय बैंकों को इन अमेरिकी बैंकों से सबक लेना चाहिए कि वो जांच परखकर न सिर्फ कर्ज दें बल्कि अपने व्यवसाय को आगे बढ़ायें. वित्तीय सुरक्षा को सुनिश्चित करना बैंकों की जिम्मेदारी है. ऐसे में उन्हें जमाकर्ताओं की पूंजी की सर्वोच्च सुरक्षा का एहसास कराने के साथ ही पूंजी वृद्धि पर भी ध्यान देना बेहद जरूरी है. पूंजी बाजार की दिशा और दशा को लेकर सतर्कता भी बेहद जरूरी है, जिससे हिंडनबर्ग जैसी रिपोर्ट बनाने की नौबत ही न आये. बहराल, हिंडनबर्ग की रिपोर्ट निश्चित रूप से भारतीय पूंजी बाजार के लिए चिंता का विषय है. मौजूदा संकट के वक्त की स्थितियों को समझना बेहद जरूरी है, नहीं तो हमारे देश में भी कुछ ऐसे बैंक शिकार हो सकते हैं.

(लेखक वरिष्ठ विश्लेषक पत्रकार हैं.) 


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