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स्कूली शिक्षा में ज्योतिषीय काउंसलिंग की कितनी है आवश्यता, इस रिपोर्ट से समझिए

ज्योतिष शास्त्र मनुष्य के जीवन में काल (समय) को परख कर समुचित दिशा में निर्देशन का कार्य करता है.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 1 year ago

शब्दों के प्रभाव में परामर्श शब्द एक ऐसा शब्द है जिसमें एक प्रभावक दूसरा प्रभाव में आने वाला अर्थात् यह एक ऐसी प्रक्रिया है जिसमें दो लोग शामिल होते हैं एक व्यक्ति जिसे अपनी समस्या का समाधान चाहिए, दूसरा व्यक्ति समस्या का निदान करने वाला होता है, जिसे मनोचिकित्सक कहते हैं. परामर्शदाता (Counsellor) व्यक्ति के चिन्ता, अवसाद, परिवारिक समस्या, रिश्ता, आदि समस्याओं से बाहर निकलने में मदद करता है, मानव एक अन्वेषक प्राणी है. वह प्रकृति के प्रत्येक पदार्थ के साथ अपना तादात्म्य सम्बन्ध स्थापित करना चाहता है. यह अपने जीवन काल में संसार का श्रेष्ठ व्यक्ति बनना चाहता है. अब विचारणीय विषय यह है कि स्कूली शिक्षा के समय एक स्कूल, समान अध्यापक, समान सुविधा फिर भी एक समान छात्रों में प्रतिभा नहीं होती? तब यहां प्रश्न उठ खड़ा होता है कि ऐसा क्यों? जबकि मनोचिकित्सक से परामर्श लेने पर भी कई बार परिवर्तन नजर नहीं आता है. तब लोगों में ऐसी धारणा या विश्वास बनने लगता है कि इसके अलावा भी कोई बाह्य शक्ति है जो हमें सहायता कर सकती है. तब लोग अच्छे ज्योतिषियों को ढूंढने लगते हैं.

क्या ज्योतिष शास्त्र द्वारा इन परेशानियों को पता लगाया जा सकता है और इससे बचाया जा सकता है क्या? इन दो प्रश्नों का उत्तर ज्योतिष शास्त्र के माध्यम से इस प्रकार से दिया जा सकता है.

भारतीय दर्शन शास्त्र के “यथा पिण्डे तथा ब्रह्माण्डे” इस सूत्रानुसार जो हमारे पिण्ड (शरीर) में जो तत्त्व है वही तत्त्व ब्रह्माण्ड में है अर्थात् आकाश स्थित ब्रह्माण्ड में पाँच तत्त्व (आकाश, वायु, अग्नि, जल और पृथ्वी) कारक पाँच तारा ग्रह क्रम (गुरु, शनि, मंगल, शुक्र, और बुध) है सूर्य आत्मा तथा चन्द्रमा मन है इन्हीं सात पदार्थों से हमारा शरीर संचालित होता है. इन्हीं ग्रहों के स्थिति वशात् व्यक्ति का स्वरूप, गुण, धर्म, विवेक, बुद्धि आकृति आदि का निर्माण होता है. इन ग्रहों की  उत्तम तथा अधम स्थिति हमारे पूर्व जन्मार्जित कर्मों के आधार पर होता है. यह कर्म तीन प्राकर के होते हैं, संचित, प्रारब्ध एवं क्रियमाण. जन्म कालीन ग्रह स्थिति उत्तम तभी होता है जब व्यक्ति का संचित कर्म उत्तम हो, और कई जन्मों में किये गये कर्मों का कालखण्डों में भोगना ही प्रारब्ध कहलाता है इन प्रारब्ध कर्म को ज्योतिष शास्त्र में दशा आदि के द्वारा ज्ञात किया जाता है. क्रियमाण कर्म को ग्रहों के वर्तमान स्थिति द्वारा ज्ञात किया जाता है अर्थात सार रूप मे कहें तो…

1.    जन्मकालीन ग्रहों की योग एवं स्थिति द्वारा व्यक्तियों का प्रतिभा का बोध होता है और कर्मों में यह संचित कर्म है.
2.    जन्म कुण्डली में ग्रहों की दशा के माध्यम से व्यक्ति मे प्रतिभा का विकास का बोध होता है, अर्थात् किस ग्रह की दशा व्यक्ति के जीवन काल में उत्तम फल सूचक है और किस ग्रह की दशा अधम फल सूचक है. कर्मों में यह प्रारब्ध कर्म का सूचक है.
3.    जन्मकुण्डली के आधार पर वर्तमान में ग्रहों की स्थिति के द्वारा व्यक्ति के जीवन में होने वाली आकस्मिक उत्तम तथा अधम फल का बोध किया जाता है. यह एक प्रकार से आकस्मिक घटनाओं का भी द्योतक है. वर्तमान ग्रह की स्थिति वशात् व्यक्तियों को करवाए जाने वाले कर्म ही क्रियमाण कर्म है.

उपर्युक्त कर्म के तीन भेद तथा ज्योतिष के तीन महत्वपूर्ण विधा मानव जीवन के व्यक्तित्त्व का सांगोपांग अध्ययन करता है. इस सन्दर्भ में वराहमिहिर का वचन यह है कि व्यक्ति अपने ओर से अत्यधिक प्रयत्न करता है परन्तु फल वैसा नहीं मिलता है. मिलता वही है जैसा जन्मकालीन ग्रहों की स्थिति है. ग्रह अपने अनुरूप व्यक्ति का निर्माण करता है. एक विचारणीय विषय है कि किसी स्कूल, समाज या नगर में एक प्रतिभावान बच्चा या व्यक्ति पहले दौड़ में आगे रहता हैं फिर उसमें से कई ऐसे होते हैं जो अत्यन्त पिछड़ जाते है या किसी न किसी गलत आदतों में पड़ जाते हैं.

दूसरी तरफ एक सामान्य बच्चा या व्यक्ति पहले दौड़ में पीछे रहता है, फिर बाद में उसमें कई बच्चे या व्यक्ति अपनी अथक प्रयत्न एवं लगन से कार्य को सम्पादन करते हुए जीवन में आगे बढ़ते चले जाते हैं कई ऐसे होते हैं जो कम से कम परिश्रम में सामान्य प्रतिभा के साथ सबसे ज्यादा सफल जीवन बना लेते हैं. एक बात और है कि इन सभी के जीवन में एक जैसी उन्नति एवं अवनति नहीं रहती हैं, इसी बात को महाकवि भास ने अपने ग्रन्थ (स्वप्नवासवदत्ता) में काल (समय) की महिमा का गुण गान बड़े रोचक ढंग से किया है, अर्थात् दैहिक शक्ति का संचार दैविक शक्ति ही करती है अन्यथा हर पैसे वाला का बच्चा संसार में सबसे ज्यादा पढ़ा लिखा होता, परन्तु ऐसा नहीं है. यही ज्योतिष है और यहीं से ज्योतिष का महत्व समझ में आने लगता है.

सभी स्कूली छात्रों के अभिभावकों से निवेदन करना चाहता हूं कि आप अपने बच्चों पर किसी प्रकार का दबाव न बनावें. उसके आधारभूत प्रयत्न एवं परेशानियों को जानने कि कोशिश करें, बाह्य प्रयत्न एवं परेशानी उनके क्रिया कलापों से ज्ञान हो जाता है. लेकिन आन्तरिक प्रयत्न एवं परेशानियों का ज्ञान नहीं हो पाता है. तब ऐसी परिस्थिति में एक उत्तम ज्योतिषी से परामर्श लेना समुचित होगा, अन्यथा बच्चा सफर कर सकता है.

उत्तम विचार अच्छे कर्मों को करवाता है, अधिकतर बड़े से बड़े विद्वान अनुभवी लोग भी बड़े मंच पर जाने के बाद उनमें घबराहट होती है, टाँगे थर-थराने लगती हैं अतः यह परिस्थिति बच्चों के बारे में भी सोचना चाहिए. बच्चा अपनी शक्ति के अनुरूप प्रयत्न करता है परन्तु असफल होने पर अधिकतर अभिभावक अपने बच्चों को डराते हैं परन्तु ऐसा नहीं करना चाहिए. सदैव सकारात्मक सोच के साथ जीवन में आगे बढ़ना चाहिए. परेशानी आने पर उत्तम ज्योतिषी से परामर्श (Counselling) लेना चाहिए. मनमानी नहीं करना चाहिए बल्कि बुद्धिमानी करनी चाहिए. बुद्धिमानी करने वाले सदैव सफल होते हैं और मनमानी करने वाले सदैव विफल होते हैं, कोई भी शास्त्र बिना उद्देश्य का नहीं होता. ज्योतिष शास्त्र मनुष्य के जीवन में काल (समय) को परख कर समुचित दिशा में निर्देशन का कार्य करता है. अतः स्कूली शिक्षा में अभिभावक के परेशानियों को देखते हुए देश के सभी स्कूलों में परामर्श दाता के रूप में उत्तम ज्योतिषी का प्रयोग करना चाहिए. मुझे पूर्ण विश्वास है कि एक उत्तम ज्योतिषी किसी अन्य परामर्श दाता (Counsellor) से उत्तम परामर्श दे सकेंगे.


(लेखक- प्रो० डॉ० फणीन्द्र कुमार चौधरी, श्री लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय नई दिल्ली 110016)

 


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