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केवल Adani ही नहीं, भारत को भी चोट पहुंचाना चाहती है हिंडनबर्ग, उसकी मंशा को समझिए

रिपोर्ट आने के बाद लगातार सवाल किए जाने लगे कि अडानी को इन सवालों के जवाब देने चाहिए, बल्कि लोगों को ये पूछना चाहिए था कि हिंडनबर्ग पहले आप अपनी साख बताओ.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 3 years ago

  • अनुरंजन झा, लंदन से 

H यानी हिंडनबर्ग, एक कंपनी जो शुद्ध रूप से सट्टा लगाने का काम करती है. अडानी पर आरोप लगाकर एक रिपोर्ट जारी करती है और अडानी को 1.44 लाख करोड़ का नुकसान होता है, दरअसल ये नुकसान निवेशकों का है. पहले इस रिपोर्ट को जारी करने वाली कंपनी की नीयत जानिए. सच जानना चाहते हैं इसका आप? बताइए तो फिर मैं कराऊं सच से रू-ब-रू आपको.

अडानी ग्रुप ने अमेरिकी सट्टेबाजों की कंपनी हिंडनबर्ग रिसर्च के आरोपों को 414 पेजों में जवाब दिया है, साथ ही एक बयान भी जारी किया है और कहा है कि हिंडनबर्ग का मकसद सिर्फ बेबुनियाद आरोप लगाकर कंपनी के शेयर को गिराना ही नहीं बल्कि भारत को बदनाम करने का है. जाहिर है कि ऐसा होना ही था. जब से इस अमेरिकी सट्टेबाजों की कंपनी ने अडानी ग्रुप पर आरोप लगाते हुए ये कहा था कि दुनिया का तीसरा सबसे धनी व्यक्ति कॉरपोरेट इतिहास का सबसे बड़ा धोखा कर रहा है. तब से बाजार में उथल-पुथल देखी जा रही है. इस खबर के बाद अडानी ग्रुप के शेयर दो दिनों तक लगातार गिरते रहे और बाजार में तकरीबन 4 लाख करोड़ निवेशकों के डूब गए. अडानी दुनिया के तीसरे सबसे अमीर व्यक्ति से सातवें पायदान पर पहुंच गए. अब आगे क्या? हिंडनबर्ग ने आरोप लगाए और अडानी ने जवाब दे दिए फिर क्या होना चाहिए? भविष्य तो गर्भ में है लेकिन मामला क्या है और इसकी कैसी प्रतिक्रिया भारत में होनी चाहिए थी, लेकिन कैसी प्रतिक्रिया देखी गई इस पर जरा नजर डाल लेते हैं. 

हिंडनबर्ग की विश्वसनीयता नहीं जांची 
हिंडनबर्ग ने जो आरोप लगाए और उसके बाद भारत में एक बड़े तबके ने जैसा रिएक्ट किया उससे दो मुख्य बातें सामने आईँ. पहली बात अडानी ग्रुप पर 2.20 लाख करोड़ का कर्ज है और दूसरी बात ग्रुप ने हेराफेरी कर शेयर के दाम बढ़ाए हैं, जो वास्तविकता से 85 फीसदी ज्यादा है. हिंडनबर्ग ने आरोपों के साथ साथ 88 सवालों की सूची भी अडानी को भेजी और कहा कि ये हमारी दो साल की रिसर्च है जिसमें ये सारी गड़बड़ियां पाईं गईँ. ये मामला सामने आते ही देश में जैसे बवाल मच गया, शेयर बाजार में खलबली मची और दो दिनों में अडानी औल-बौल हो गए. इन मुद्दों पर लोगों ने हिंडनबर्ग की विश्वसनीयता जांचे बिना अडानी को कटघरे में खड़ा कर दिया. 

शॉर्ट पोजिशन का खेल
इन सभी मुददों को समझने से पहले हिंडनबर्ग को जान लीजिए. हिंडनबर्ग ने रिपोर्ट में साफ़ साफ लिखा कि अडानी पर उसने शॉर्ट पोजिशन ले रखी है. शॉर्ट पोजिशन कोई कामसूत्र का पोजिशन नहीं बल्कि बाजार में पैसे बनाने का एक सट्टेबाजी का तरीका है. आपने किसी कंपनी के शेयर ₹100 में ख़रीदें और दाम ₹150 होने पर बेच दिए आपको ₹50 फायदा हुआ ये लॉंग पोजिशन कहा जाता है. अब आप किसी कंपनी के शेयर किसी A कंपनी से 100 रुपए में उधार लेते हैं और B कंपनी को 100 रुपए में ही बेच देते हैं और आपको भरोसा है कि इसका भाव गिरेगा तो फिर आप बाजार से गिरे हुए भाव पर जो मान लीजिए अब 80 रुपए है, शेयर लेते हैं और फिर जिस A कंपनी से उधार लिए थे उसे लौटा देते हैं. आपका लाभ 20 रुपए का है. ये शॉर्ट पोजिशन है. हिंडनबर्ग ने अडानी पर शॉर्ट दांव खेला है. जाहिर है कि रिपोर्ट जारी कर उसका मकसद अडानी के शेयर गिराने का और उससे लाभ कमाने का है. जो ये कंपनी करती रही है, अमेरिकी कानून के दायरे में ये सही है और इसीलिए ये कंपनी वहीं से संचालित होती है. हालांकि कई मामलों पर अमेरिका संस्थाएं इस कंपनी के लेखा जोखा की जांच कर रही हैं. लेकिन भारत में एक बड़े तबके को गोरी चमड़ी आज भी ज्यादा प्यारी लगती है. उन्हें अडानी पर भरोसा नहीं होकर उस सट्टेबाज कंपनी पर भरोसा हो गया और अडानी के शेयर गिर गए. 

वापस भरोसा जताना चाहिए?
रिपोर्ट आने के बाद लगातार सवाल किए जाने लगे कि अडानी को इन सवालों के जवाब देने चाहिए, बल्कि लोगों को ये पूछना चाहिए था कि हिंडनबर्ग पहले आप अपनी साख बताओ लेकिन ऐसा नहीं हुआ और अब अडानी ने 414 पेजों में जवाब भी दे दिए हैं तो अब क्या? बाजार को वापस अडानी पर भरोसा जताना चाहिए? पहला बड़ा आरोप कि कंपनी पर 2.20 लाख का कर्ज है इस मुद्दे पर सोशल मीडिया पर क़यास लगाये जाने लगे कि अडानी डूब जाएगा, गौतम देश छोड़े के भाग जाएँगे. देश पर 205 लाख करोड़ का कर्ज है तो क्या देश बंद हो रहा है और देश डूब रहा है? ये अतिशयोक्ति है, ऐसे निष्कर्ष नहीं निकालने चाहिए. अडानी ग्रुप के पास पोर्ट है, एयरपोर्ट है, कोयला खदान है, सड़कें है, सीमेंट बनाने के कारख़ाने हैं, बिजली बनाने की कंपनी है, खाने का तेल से लेकर आटा दाल बेचने वाला फ़ॉर्च्यून ब्रांड है. ग्रुप की सालाना बिक्री दो लाख करोड़ रुपये से ज़्यादा है. मुनाफ़ा करीब 13 हज़ार करोड़ रुपये. ये आँकड़ा मार्च 2022 तक का है जिसमें सीमेंट कंपनियाँ शामिल नहीं है मतलब साफ है कि अडानी ग्रुप कोई हवा में कारोबार नहीं कर रहा है और साथ ही इतने बड़े कर्ज के बावजूद अडानी ग्रुप देश की सबसे बड़ी कर्जदार कंपनी भी नहीं है.  

झूठ बोल रही है कंपनी
दूसरा बड़ा आरोप ये कि हेराफेरी से शेयर के दाम बढ़ाए हैं, साथ ही कंपनी के ऑडिटर नौसिखिए हैं. भारतीय कंपनियों पर आरोप लगते हैं कि वो टैक्स हैवन देशों में पैसा लगाते हैं और वहां से विदेशी निवेशक बनकर भारत में अपनी ही कंपनी के शेयर बढ़े दाम पर खरीदते हैं, गौतम के भाई विनोद अडानी यही काम दुबई से कर रहे हैं, लेकिन नौसिखिए ऑडिटर की वजह से ये मामला पकड़ में नहीं आ रहा है. मतलब यहां भी हिन्डनबर्ग सरासर झूठ बोल रही है. अगर गड़बड़ी होती तो शायद नौसिखिए ऑडिटर्स की गड़बड़ियां पकड़ना ज्यादा आसान होता.

खुद को नुकसान पहुंचाने जैसा
जाहिर है कि हिन्डनबर्ग की मंशा भारतीय कंपनी को नुकसान पहुंचा कर भारतीय अर्थव्यवस्था को नुकसान पहुंचाने का दिखती है और भारत में अगर एक तबका अडानी की जगह हिन्डनबर्ग पर भरोसा करके कंपनी को नुकसान पहुंचाने में अपनी भागीदारी देता है तो वो निश्चित तौर पर खुद को नुकसान पहुंचा रहा है. अडानी की कंपनियो में एलआईसी जैसी संस्थाओं के पैसे लगे हैं जिसका सीधा सरोकार भारत के आम लोगों के साथ है. ऐसे में मेरा व्यक्तिगत मानना है कि जब कभी कोई बाहरी ताकत देश के अंदरूनी मामलों में दखल देने की कोशिश करे तो उसे गंभीरता से आंके, हो सकता है कि वो सही भी हो लेकिन जल्दबाजी में लिया गया फैसला आपके भविष्य के साथ खिलवाड़ साबित हो सकता है. निर्मूल आशंकाओँ से बाहर आइए और किसी भी ऐरे गैरे रिपोर्ट पर भरोसा करके अपना नुकसान मत कीजिए.

(डिस्क्लेमर: इस लेख में व्यक्त विचार लेखक के निजी विचार हैं.)


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