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वैश्वीकरण से आर्थिक राष्ट्रवाद की ओर संकेत करती है ट्रंप की टैरिफ नीति

लेखक हरदयाल सिंह के अनुसार हाल की द्विपक्षीय व्यापार नीति के चलते, भारत इस तूफान को झेलने में कई अन्य देशों की तुलना में बेहतर स्थिति में हो सकता है.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 1 year ago

साल 2025 असाधारण है, क्योंकि इसने समकालीन इतिहास को आकार देने वाली शक्तियों में एक भूकंपीय बदलाव की शुरुआत कर दी है. यह वर्ष एक शुरुआत के साथ-साथ एक अंत का प्रतीक है. शायद एक नए युग की शुरुआत, 21वीं सदी की असली शुरुआत और इसके साथ ही एक नए विश्व व्यवस्था की. यह पुराने विश्व व्यवस्था का भी अंत करता है, जिसकी शुरुआत वास्तव में 1945 में द्वितीय विश्व युद्ध के बाद हुई थी. वही समय था जब 20वीं सदी की शुरुआत हुई थी. यह व्यवस्था केवल अस्सी वर्षों तक चली; जबकि इसके पहले की व्यवस्था, जो यूरोपीय औपनिवेशिक शक्तियों के प्रभुत्व में थी, लगभग 150 वर्षों तक चली थी.

1992 में, जापानी मूल के अमेरिकी समाज वैज्ञानिक फ्रांसिस फुकुयामा ने लिखा था कि तत्कालीन सोवियत संघ के पतन के साथ, मानवता अपनी महिमा की चरम सीमा पर पहुंच गई है, और यह वर्ष इतिहास का अंत है. उन्होंने कहा कि अब कोई और विकास संभव नहीं है. उस समय यह विचार बहुत प्रसिद्ध हुआ, लेकिन बाद में यह सिद्धांत अत्यंत गलत साबित हुआ.

फुकुयामा यह नहीं देख सके कि इतिहास को आकार देने वाली शक्तियां सदियों के सुसंगत कालखंडों से मेल नहीं खातीं. इन शक्तियों के संदर्भ में पिछली सदी तब शुरू हुई जब अमेरिका और उसके सहयोगियों ने द्वितीय विश्व युद्ध के बाद एक नई विश्व व्यवस्था की स्थापना की, जिसमें संयुक्त राष्ट्र और उसके सहायक संगठन जैसे WHO, ILO आदि शामिल थे, और डॉलर को विश्व की अंतर्राष्ट्रीय आरक्षित मुद्रा बनाया गया. बाद में, 166 देश एक साथ आए और WTO की स्थापना की. इस व्यवस्था ने वैश्वीकरण को बढ़ावा दिया, जिसमें वस्तुओं, सेवाओं, श्रम और कच्चे माल की सीमाओं के पार स्वतंत्र आवाजाही को प्राथमिकता दी गई. इस व्यवस्था ने विशेष रूप से चीन और दक्षिण-पूर्वी एशियाई देशों सहित दुनियाभर में करोड़ों लोगों को गरीबी से बाहर निकाला है.

अब तक सब कुछ ठीक था, लेकिन किसी भी अन्य प्रणाली की तरह, इसमें भी अपनी विनाश की बीज मौजूद थे. इसने चीन जैसे देशों को नियमों की अवहेलना करने की छूट दी. साथ ही, जब अमेरिका और यूरोप में समाज में असमानता बढ़ी और निम्न और मध्यम वर्ग का जीवन स्तर ठहरने लगा, तो उच्च शिक्षित अभिजात वर्ग के खिलाफ असंतोष उभरने लगा. राष्ट्रपति ट्रंप ने ठीक इसी असंतोष को भुनाया और पिछले वर्ष अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव जीते.

राष्ट्रपति ट्रंप का मानना है कि पुरानी उदार व्यवस्था अमेरिका के लिए बहुत अन्यायपूर्ण रही है. इसने पूरी दुनिया को अमेरिका की कीमत पर लाभान्वित होने दिया. अमेरिका के यूरोपीय और नाटो सहयोगियों ने अपनी रक्षा जिम्मेदारियों से किनारा कर लिया और उम्मीद की कि अमेरिका हमेशा उनकी सुरक्षा का बोझ उठाए. उन्होंने यह स्पष्ट कर दिया है कि अमेरिका की कीमत पर चल रही यह "पार्टी" अब समाप्त हो चुकी है. उनकी टैरिफ नीतियां, जो मित्रों, सहयोगियों और विरोधियों सभी को एक जैसा मानती हैं. अमेरिकी सार्वजनिक कर्ज को अधिक सम्मानजनक स्तर पर लाने का प्रयास हैं. यह कर्ज वर्तमान में 35 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर है, जो देश की 28 ट्रिलियन डॉलर की GDP का 120 प्रतिशत है.

इस प्रकार, टैरिफ लगाना राजस्व बढ़ाने, सार्वजनिक ऋण घटाने, विदेशी वस्तुओं को महंगा करने और यह सुनिश्चित करने का एक तरीका है कि घरेलू निर्माण फिर से व्यवहार्य बन सके. ट्रंप को उम्मीद है कि अमेरिकी नागरिक एक बार फिर से अमेरिकी उत्पाद खरीदना शुरू करेंगे. उनके अनुसार, इस तरह वे अमेरिका की अंतर्राष्ट्रीय श्रेष्ठता को बहाल करने में सक्षम होंगे.

क्या यह मॉडल काम करेगा? राष्ट्रपति ट्रंप एक बड़ा जोखिम ले रहे हैं; क्या वे इसे सफलतापूर्वक लागू कर पाएंगे, यह केवल समय ही बताएगा. संभावना है कि यदि उनकी टैरिफ नीति असंगत सिद्ध होती है तो वे पीछे हट जाएंगे. अधिकांश संभावना है कि मध्यम अवधि में अमेरिका फिर से एकमात्र वैश्विक महाशक्ति के रूप में नहीं, बल्कि एक प्रमुख अंतर्राष्ट्रीय शक्ति के रूप में उभरेगा, जो अन्य क्षेत्रीय शक्तियों जैसे चीन, भारत, रूस और यूरोपीय संघ (EU) की तुलना में कहीं अधिक ताकतवर होगी.

इस बीच, नई उभरती व्यवस्था में अस्थिरता और अनिश्चितता की अधिक मात्रा की अपेक्षा की जा सकती है. सूक्ष्म और स्थूल दोनों ही स्तरों पर यह कई तरह से सामने आएगा, जिससे वैश्विक आपूर्ति शृंखलाएं और शेयर बाजार बाधित होंगे और दुनियाभर के व्यवसायों की मांग और आपूर्ति की पूर्वानुमानित योजनाएं प्रभावित होंगी. समय के साथ, द्विपक्षीय व्यापार समझौते नई सामान्य प्रक्रिया बन सकते हैं. यह समझना स्वाभाविक है कि इस परिवर्तन को स्थिर होने और स्थितियों के किसी संतुलित स्तर पर लौटने में समय लगेगा.

यह महाशक्ति संघर्ष आम लोगों को कैसे प्रभावित करेगा? यदि आपके पास अतिरिक्त नकद है, तो सोना खरीदें. यह अनिश्चितता के समय में एक शानदार बचाव उपाय है. अगर आप शेयर बाजार में निवेशित हैं, तो निवेशित रहें, क्योंकि जब उभरती विश्व व्यवस्था एक नया संतुलन पाएगी, तो बाजार देर-सबेर फिर से ऊपर आएंगे. अंतर्राष्ट्रीय व्यापार को लेकर अपने हालिया द्विपक्षीय दृष्टिकोण के चलते भारत कई अन्य देशों की तुलना में इस तूफान को बेहतर ढंग से झेलने की स्थिति में हो सकता है.

डिस्क्लेमर : इस लेख में व्यक्त विचार लेखक के निजी हैं और यह आवश्यक नहीं कि प्रकाशन के विचारों को दर्शाते हों.

अतिथि लेखक- हरदयाल सिंह,  लेखक आयकर विभाग (Income Tax) के मुख्य आयुक्त रह चुके हैं और The Moral Compass - Finding Balance and Purpose in an Imperfect World* (Harper Collins India, 2022) पुस्तक के लेखक हैं.


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