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टैरिफ जाल: ट्रंप-मोदी की जुगलबंदी से, चीन पड़ गया अकेला

ट्रम्प-मोदी की जुगलबंदी ने चीन को मात दी, और उसे टैरिफ युद्ध में अकेला और बेनकाब कर दिया। चीन गिर नहीं रहा है, लेकिन उसकी वैश्विक ताकत कमजोर हो गई है, और उसका व्यापार घट रहा है.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 1 year ago

अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के टैरिफ (आयात शुल्क) लगाने को कोई पागलपन मत समझिए. यह कोई बेमतलब की ट्रेड वॉर (व्यापार युद्ध) नहीं है, बल्कि एक सोची-समझी चाल है – जैसे शतरंज का खेल. इसमें भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी उनके अहम साथी हैं. ट्रंप और मोदी ने मिलकर चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग को ऐसी चाल में फंसा दिया है जिससे चीन की मजबूत अर्थव्यवस्था कमजोर होने लगी है. टैरिफ वॉर (आयात शुल्कों की लड़ाई) की वजह से दुनिया में एक बड़ा बदलाव हो रहा है – अब चीन पीछे हो रहा है और भारत एशिया की नई ताकत बनकर उभर रहा है.

ट्रंप ने चीन से आयात पर भारी शुल्क लगाए और मोदी ने चीन की बड़ी ईवी (इलेक्ट्रिक वाहन) कंपनी BYD को भारत के 1.5 ट्रिलियन डॉलर के बाजार से बाहर कर दिया. ये सब दिखाता है कि दोनों की रणनीति बहुत सटीक और सख्त है. अब जबकि रूस अलग-थलग है, एशियाई देश अपनी स्थिति बदल रहे हैं, और चीन की जवाबी कार्रवाई खुद उसी पर भारी पड़ रही है—ये टैरिफ की जंग दुनिया के ताकत के संतुलन को पूरी तरह बदल रही है, ऐसा लिखते हैं पत्रकार पलक शाह.

शी जिनपिंग का व्हाइट फ्लैग मूवमेंट

1 अप्रैल 2025 को जब भारत और चीन के बीच राजनयिक संबंधों के 75 साल पूरे हुए, तो चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने “ड्रैगन और हाथी की दोस्ती” की एक खूबसूरत सी कहानी सुनाई. लेकिन ये असली दोस्ती नहीं थी, बल्कि रेशमी लफ़्ज़ों में लिपटी हुई हार थी. शी जिनपिंग शांति नहीं चाहते थे, वो तो मुश्किल हालात से निकलने की कोशिश कर रहे थे. अमेरिका ने चीन से आने वाले 759 अरब डॉलर के सामान पर भारी 104% टैरिफ लगा दिया था, जिससे चीन की अर्थव्यवस्था बुरी तरह दब गई. ऊपर से विदेशी निवेशक अब चीन छोड़कर भारत आ रहे हैं. ऐसे में शी जिनपिंग की यह मीठी बात असल में प्रधानमंत्री मोदी से एक तरह की गुहार थी—“थोड़ी राहत दो.”

लेकिन मोदी पीछे नहीं हटे. शी की दोस्ती की पेशकश के कुछ ही दिन बाद भारत ने चीन की बड़ी इलेक्ट्रिक गाड़ी कंपनी BYD को भारत के तेजी से बढ़ते बाजार में आने से रोक दिया. ये सिर्फ एक नकार नहीं था, बल्कि एक सख्त संदेश था: हम अब तुम्हारे साथी नहीं, तुम्हारे प्रतियोगी हैं. शी जिनपिंग का “ड्रैगन और हाथी साथ नाचेंगे” वाला सपना वहीं टूट गया. मोदी ने साफ दिखा दिया कि भारत की तरक्की अब चीन को पीछे छोड़कर ही होगी. अब आंकड़े भी यही बता रहे हैं—2027 तक चीन का दुनिया में व्यापार हिस्सा 15% से गिरकर 12% हो सकता है, जबकि भारत की तेजी से हो रही तरक्की, जिसे अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया जैसे देश (Quad) का समर्थन मिल रहा है, रुकने का नाम नहीं ले रही.

जाल में फंसा चीन

चीन को दुनिया से अलग-थलग करने की नींव तब रखी गई जब अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अपने “America First” (अमेरिका पहले) वाले एजेंडे पर चलते हुए चीन से आने वाले सामान पर भारी टैक्स (टैरिफ) लगा दिए. चीन पहले ही अपने सामान पर औसतन 54% टैक्स लगाता था, तो ट्रंप ने और भी सख्त जवाब दिया. चीन को लगा ये सिर्फ अमेरिका और उसके बीच की लड़ाई है, तो उसने अमेरिका के कृषि उत्पादों (जैसे 50 अरब डॉलर के सोयाबीन) और टेक्नोलॉजी पर टैक्स लगाकर पलटवार किया, यही थी चीन की बड़ी गलती और इसी का इंतज़ार ट्रंप और मोदी कर रहे थे.

मोदी ने मौके को तुरंत पकड़ा. भारत ने ब्याज दरें घटाईं (RBI का रेपो रेट 6.5% से 5.5% किया), जिससे अर्थव्यवस्था में तेजी आई और दुनिया के डर से भाग रहे निवेशकों को भारत में आने का मौका मिला. अब भारत अमेरिका, यूरोप (EU) और ASEAN देशों से व्यापार समझौते करने की तैयारी में है. भारत ने अमेरिका से आने वाले सामान पर टैक्स 17% से घटाकर 10% करने का इशारा भी दे दिया है, जिससे भारत का एक्सपोर्ट और तेज़ हो जाएगा. जहां चीन की जवाबी कार्रवाई ने उसे दुनिया की नजरों में एक “धौंस जमाने वाले देश” की छवि दे दी, वहीं भारत ने दुनिया को खुलकर व्यापार के लिए न्योता दे दिया—"हम भरोसेमंद हैं, आइए हमारे साथ काम कीजिए." 

बहुराष्ट्रीय कंपनियां जो “चीन +1” रणनीति ढूंढ़ रही थीं, वे अब भारत की तरफ दौड़ रही हैं. Apple ने 2024 में अपने iPhone का $14 अरब का उत्पादन भारत में शिफ्ट किया और ये तो बस शुरुआत थी. अब भारत में हर साल $100 अरब का विदेशी निवेश (FDI) आने का अनुमान है, जबकि चीन का निवेश 2023 में 8% गिरकर $130 अरब पर आ गया. चीन ने जो टैक्स लगाने की कोशिश की, वो उसी पर भारी पड़ गई. उसे लगा था कि उसके दोस्त देश उसका साथ देंगे, लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ. अब उसका $18 ट्रिलियन का विशालकाय अर्थतंत्र लड़खड़ा रहा है, और दुनिया भारत को अपनाने लगी है. ये सिर्फ एक जाल नहीं था—बल्कि एक शानदार चाल थी, जिसे चीन समझ ही नहीं पाया.

एशिया में बड़ा बदलाव

चीन अब सिर्फ आर्थिक रूप से ही नहीं, बल्कि पूरे एशिया में भी अकेला पड़ता जा रहा है. पहले एशिया के देश चीन की ताकत से डरते थे, लेकिन अब वे भारत की ओर खिंचते जा रहे हैं—क्योंकि मोदी ने टैक्स घटाए हैं और भारत की GDP भी 6-7% की तेज़ रफ्तार से बढ़ रही है. ताइवान, जो हमेशा चीन के डर में रहता है, अब चीन का साथ देने की कोई वजह नहीं देखता. उसका अमेरिका से 2024 में 80 अरब डॉलर का व्यापार बिना किसी टैक्स रुकावट के आसानी से चल रहा है. भारत ने तकनीक के लिए अनुकूल नीतियां बनाई हैं, जिससे ताइवान की बड़ी चिप बनाने वाली कंपनियां, जैसे TSMC, भारत की 500 अरब डॉलर की डिजिटल इकोनॉमी में हिस्सेदारी चाहती हैं.

वियतनाम, जो पहले अमेरिकी टैक्स से बचकर चीन के सामान को अपने देश से भेजता था, अब सख्ती से अपने निर्यात पर नियम लागू कर रहा है. उसका 370 अरब डॉलर का एक्सपोर्ट इकोनॉमी है, और वह अमेरिका के गुस्से का खतरा नहीं ले सकता, जिससे उसकी तरक्की रुक सकती है. इसी तरह ASEAN के बड़े देश—मलेशिया, थाईलैंड, इंडोनेशिया—अब चीन की जगह भारत को अपना व्यापारिक साथी बना रहे हैं. भारत का 776 अरब डॉलर का व्यापार बाजार 2027 तक 1 ट्रिलियन डॉलर तक पहुँचने वाला है तो फिर चीन के 3 ट्रिलियन डॉलर के निर्यात मॉडल से चिपके रहने का क्या फायदा, जब उस पर 104% अमेरिकी टैक्स और घरेलू मांग भी गिरकर GDP के सिर्फ 40% पर रह गई है?

जापान और दक्षिण कोरिया, जो क्वाड (Quad) के साथी हैं, पूरी तरह भारत के साथ हैं. जापान ने भारत में 20 अरब डॉलर निवेश का वादा किया है और साउथ कोरिया टेक्नोलॉजी में साझेदारी कर रहा है. दूसरी ओर, चीन की बेल्ट एंड रोड योजना, जो 130+ देशों में फैली थी, अब फीकी पड़ती जा रही है. चीन की ताकत अब एशिया में कमजोर पड़ रही है. बाकी देश अब एक ऐसे चीन से दूरी बना रहे हैं, जो भारी टैक्सों से जूझ रहा है. चीन अब अकेले ही अपनी गलतियों की कीमत चुका रहा है.

चीन का नाकाम जवाबी वार

चीन ने जब "जैसे को तैसा" की नीति अपनाई, तो वही उसकी सबसे बड़ी गलती बन गई. जहां यूरोप (EU) और भारत अमेरिका के साथ मिलकर टैरिफ कम करने की बातचीत कर रहे थे, वहीं चीन ने उल्टा अमेरिका से आने वाले 110 अरब डॉलर के सामान पर 25% टैक्स लगा दिए (2018 में), और बाद में और बढ़ा दिए. चीन की ये अकेली जवाबी कार्रवाई दुनिया को ये संदेश दे गई कि ट्रेड वॉर (व्यापार युद्ध) का असली गुनहगार चीन है. इससे ट्रंप और मोदी को लोगों को समझाने में आसानी हो गई कि – चीन रुकावट डालता है, भारत समाधान देता है.

अमेरिका ने फिर और सख्ती की, 2022 से चीन को चिप (semiconductor) सप्लाई करने पर बैन लगा दिया और वियतनाम व मलेशिया जैसे देशों की भी जांच शुरू की, जहाँ से चीन अपने सामान को घुमा-फिराकर अमेरिका भेजता था. अब इस तरह के चक्करदार रास्ते से सामान भेजने पर 5-15% तक ज़्यादा खर्च लग रहा है, जिससे चीन की लागत बढ़ गई है और उसकी प्रतिस्पर्धा घट गई है. पहले जो अमेरिकी कस्टम्स (सीमा शुल्क विभाग) चीन से खेल में मात खा जाता था, अब वही विभाग सख्त हो गया है. अब तक वो इस तरह की धोखाधड़ी करने वालों पर 1.8 अरब डॉलर के जुर्माने लगा चुका है. भले ही चीन की अर्थव्यवस्था मजबूत हो, लेकिन उसका वैश्विक व्यापार में हिस्सा 15% से गिरकर 12-13% के बीच आ गया है. दूसरी ओर, भारत का 450 अरब डॉलर का निर्यात तेज़ी से बढ़ रहा है और 15% की विकास दर की तरफ बढ़ रहा है. यानी चीन का जवाबी हमला उल्टा उसी पर भारी पड़ गया, और भारत आगे निकलता जा रहा है.

भारत की जबरदस्त छलांग

भारत ने टैरिफ (आयात-निर्यात टैक्स) घटाकर जो दांव चला है, उसने उसे एशिया की चोटी पर पहुँचा दिया है. कम टैक्स की वजह से भारत के शेयर बाजार (NIFTY 50) में 18 महीनों में 20-30% की तेज़ बढ़त की उम्मीद है—30,000 से 32,500 तक. इस तेजी की अगुवाई करेंगे—बैंकिंग कंपनियाँ (जैसे HDFC, ICICI), बड़ी इंफ्रास्ट्रक्चर कंपनियाँ (जैसे Reliance) और आईटी दिग्गज (जैसे TCS, Infosys).

भारत का निर्यात, जो 2024 में $450 अरब था, अब और तेज़ी से बढ़ने वाला है. दवाओं का निर्यात ($30 अरब) और कपड़ों का व्यापार ($40 अरब) अब अमेरिका की दुकानों में और ज़्यादा दिखेगा. डॉलर के मुकाबले कमजोर रुपया (90-95 रुपये प्रति डॉलर) विदेशी निवेशकों के लिए भारतीय शेयरों को और भी आकर्षक बना रहा है. 2025 में FPI (विदेशी पोर्टफोलियो निवेश) $60 अरब तक पहुँच सकता है, जो 2023 में $50 अरब था.

मोदी सरकार के अमेरिका, यूरोप (EU), और ASEAN के साथ किए गए व्यापार समझौते भारत को “चीन +1” की रणनीति में सबसे आगे रख रहे हैं. अमेरिका का भारत से आयात 2024 में $105 अरब तक पहुँच चुका है, और हर साल 10% की दर से बढ़ रहा है. दूसरी ओर, चीन से अमेरिका का आयात 2022 से अब तक 20% गिर गया है. Quad (अमेरिका, भारत, जापान, ऑस्ट्रेलिया) की साझेदारी से जापान-भारत व्यापार 20% बढ़कर $25 अरब हो गया है, जिससे चीन पर भू-राजनीतिक दबाव भी बढ़ रहा है. ASEAN देश जो पहले RCEP के ज़रिए चीन पर निर्भर थे, अब भारत के $150 अरब के व्यापार को चीन के विकल्प के रूप में देख रहे हैं. भारत सिर्फ तरक्की नहीं कर रहा—बल्कि एशिया की ताकत का नक्शा फिर से बना रहा है, और इसके पीछे सबसे बड़ा रोल प्रधानमंत्री मोदी का है.

चीन की टूटी हुई ताकत

टैरिफ (आयात टैक्स) के जाल ने चीन की तेज़ रफ्तार अर्थव्यवस्था को थाम लिया है. जो चीन पहले $3 ट्रिलियन का निर्यात powerhouse था, अब उसे तीन बड़ी मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है—अमेरिकी टैक्स, भारत द्वारा व्यापार का खींचा जाना, और एशिया के देशों का साथ छोड़ देना. अब टेस्ला से लेकर फॉक्सकॉन जैसी दुनिया की बड़ी कंपनियाँ भारत में अरबों डॉलर का निवेश कर रही हैं. इससे चीन में विदेशी निवेश (FDI) कम हो गया है, जो पहले $130 अरब था और अब गिरता जा रहा है. चीन की घरेलू खपत (डिमांड), जो GDP का सिर्फ 40% है, इतनी नहीं है कि नुकसान की भरपाई कर सके. अमेरिका को भेजे जाने वाले $759 अरब के सामान अब संकट में हैं.

चीन की जवाबी चालें अब कमजोर साबित हो रही हैं. अगर वह स्टील जैसे सामान को सस्ते में बेचना (डंपिंग) शुरू करता है, तो अमेरिका और कड़ा जवाब दे सकता है. रूस और ईरान जैसे देशों पर भरोसा करने से भी कुछ खास फायदा नहीं मिल रहा—रूस खुद अपने संकट में डूबा है और चीन से उसका $240 अरब का व्यापार भी बहुत कम असर डालता है. चीन द्वारा रास्ता बदलकर (circumvention) सामान भेजना अब महँगा और फेल हो रहा है, और जवाबी टैक्स से उसका गला और कसता जा रहा है. चीन पूरी तरह टूटा नहीं है, लेकिन उसकी वैश्विक बादशाहत अब कमजोर पड़ गई है. उसका व्यापार साम्राज्य सिकुड़ रहा है, जबकि भारत का दबदबा तेज़ी से बढ़ रहा है. अब चीन का "ड्रैगन वाली दहाड़" धीमी पड़ चुकी है, और भारत की "गर्जना" के बीच वह आवाज़ जल्द ही गुम हो जाएगी.

रूस से भी टूटी उम्मीदें

चीन को जो उम्मीद थी कि रूस उसका बड़ा सहारा बनेगा, वह शुरू से ही नाकाम साबित हुई. रूस पर पश्चिमी देशों के भारी प्रतिबंध और यूक्रेन युद्ध की मार ने उसकी हालत कमजोर कर दी है. 2024 में रूस और चीन का व्यापार भले ही $240 अरब हो, लेकिन रूस के लिए अपना अस्तित्व बचाना ज्यादा जरूरी है, चीन का साथ देना नहीं. दूसरी ओर, भारत न केवल टैरिफ में राहत दे रहा है, बल्कि ASEAN देशों के साथ $150 अरब का व्यापार भी कर रहा है. ऐसे में रूस को लगता है कि चीन का साथ देने से बेहतर है तटस्थ (neutral) रहना.

प्रतिबंधों ने रूस की अर्थव्यवस्था को जकड़ लिया है—GDP ग्रोथ सिर्फ 1-2% के बीच रह गई है. ऐसे में पुतिन अब भारत या पश्चिमी देशों को और नाराज़ नहीं करना चाहते. खासकर तब जब भारत Quad (अमेरिका, जापान, ऑस्ट्रेलिया) का हिस्सा बनकर ताकतवर बनता जा रहा है. रूस के भारत के साथ $10 अरब के ऊर्जा सौदे और हथियार निर्यात दिखाते हैं कि अब वह व्यावहारिक सोच अपना रहा है—और चीन को अकेले ही उसकी लड़ाई लड़ने दे रहा है.

एक नया वर्ल्ड ऑर्डर

ट्रम्प और मोदी ने सिर्फ चीन को मात नहीं दी—उन्होंने पूरी दुनिया का खेल ही पलट दिया. भारत में चीनी कार कंपनी BYD पर बैन, शी जिनपिंग की मजबूरी में दोस्ती की पेशकश, रूस का दूरी बनाना, और एशियाई देशों का भारत की तरफ झुकाव—ये सब दिखाते हैं कि चीन अब अकेला पड़ गया है.  ट्रम्प और मोदी ने चीन को गुस्से में जवाब देने पर मजबूर किया, और यही उसकी बड़ी गलती बन गई. इससे न सिर्फ चीन की कमजोरी सबके सामने आ गई, बल्कि एशिया भी अब भारत की तरफ खड़ा दिख रहा है, और चीन की तेज़ रफ्तार अब धीमी पड़ गई है.

भारत अब 6-7% की तेज़ विकास दर और कम टैरिफ के साथ एशिया का केंद्र बन गया है. उसका $776 अरब का व्यापार बाजार अब दुनिया भर के निवेशकों को अपनी ओर खींच रहा है. दूसरी तरफ, चीन अब भी पूरी तरह टूटा नहीं है, लेकिन वह अपनी चोटें सहला रहा है—उसका व्यापार हिस्सा घट रहा है और उसकी पकड़ ढीली पड़ रही है. इस टैरिफ वॉर का सबसे बड़ा हारने वाला? वो ड्रैगन (चीन) जो सोच रहा था कि वो अकेला लड़ सकता है. ये सिर्फ एक व्यापारिक जीत नहीं है—ये एक बड़ी रणनीतिक जीत है. मोदी की मजबूत सोच और ट्रम्प की टैरिफ की सख्ती ने शायद भारत को एशिया की नई महाशक्ति बना दिया है, जबकि चीन की दौड़ लड़खड़ा गई है. ड्रैगन ने अब ये सबक सीख लिया है—इस खेल में जाल से नहीं लड़ते. अगर तुमने ध्यान नहीं दिया... तो खुद जाल ही निगल जाता है.

(लेखक- पलक शाह, "द मार्केट माफिया - क्रॉनिकल ऑफ इंडिया’s हाई-टेक स्टॉक मार्केट स्कैंडल एंड द कबाल दैट वेंट स्कॉट-फ्री" किताब के लेखक हैं. पलक शाह पिछले दो दशकों से मुंबई में पत्रकारिता कर रहे हैं. उन्होंने द इकोनॉमिक टाइम्स, बिजनेस स्टैंडर्ड, द फाइनेंशियल एक्सप्रेस और द हिंदू बिजनेस लाइन जैसे प्रमुख पिंक पेपरों में काम किया है. वह 19 साल की उम्र में अपराध रिपोर्टिंग से जुड़े थे, लेकिन कुछ सालों में इस क्षेत्र में काम करने के बाद उन्हें यह महसूस हुआ कि अपराध की संरचना बदल चुकी थी और वह संगठित गिरोह, जैसा कि मुंबई ने 80 के दशक में देखा था, अब अस्तित्व में नहीं थे.  'व्हाइट मनी' अर्थव्यवस्था की जटिलताओं को समझने के उनके जुनून ने पलक को वित्त और नियामकों की दुनिया में पहुंचा दिया.)
 


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