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संविधान निर्माण में 'संस्थापक माताओं' का योगदान: महिलाओं की अदृश्य भूमिका

हंसा मेहता और अमृत कौर जैसी महिलाओं ने धार्मिक स्वतंत्रता की आवश्यकता पर बल दिया, जबकि धर्म में निहित पिछड़ी प्रथाओं जैसे बाल विवाह और पर्दा प्रथा के खिलाफ सुधार की वकालत की. 

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 1 year ago

11 दिसंबर, 1946 को भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का प्रतिनिधित्व करते हुए सरोजिनी नायडू ने संविधान सभा के उद्देश्य को “भारत की स्वतंत्रता का अमर घोषणा पत्र” बनाने के रूप में प्रस्तुत किया, जिसमें स्वतंत्रता, शांति और समानता पर जोर दिया गया. इस दृष्टिकोण के बावजूद, मुख्यधारा की विद्वता अक्सर महिलाओं के योगदान को हाशिए पर रखती है, "संस्थापक पिता" की कहानी को कायम रखती है और भारत के संविधान को आकार देने में महिलाओं द्वारा निभाई गई महत्वपूर्ण भूमिकाओं को नजरअंदाज करती है.

संविधान निर्माण में महिलाओं की भूमिका  
संविधान निर्माण की महिलाएं केवल निष्क्रिय सहभागी नहीं थीं, बल्कि इस प्रक्रिया में उनका योगदान महत्वपूर्ण था. वे मौलिक अधिकार उप-समिति और अल्पसंख्यक अधिकार उप-समिति जैसी महत्वपूर्ण उप-समितियों की सक्रिय सदस्य थीं. इन छोटे, केंद्रित मंचों में, महिलाओं ने संवेदनशील मुद्दों को उठाया, जिन्हें शायद बड़ी विधानसभा की बहसों में इतनी आसानी से नहीं उठाया जा सकता था. जी. दुर्गाबाई, अम्मू स्वामिनाथन, अमृत कौर, और दक्षायणी वेलायुधन, हंसा मेहता जैसी गिनती की 15 आम महिलाओं ने संविधान पर हस्ताक्षर किए. ये महिलाएँ न केवल अपने लिंग की प्रतिनिधि थीं बल्कि मौलिक अधिकारों, धर्मनिरपेक्षता और शासन पर चर्चा में महत्वपूर्ण योगदानकर्ता थीं.

मौलिक अधिकार और समानता की परिभाषा  
महिलाओं का एक महत्वपूर्ण योगदान उनका मौलिक अधिकार अनुभाग के निर्माण में था. अमृत कौर ने धारा 15 में "लिंग" शब्द के समावेश को सुनिश्चित किया, जो लिंग के आधार पर भेदभाव को प्रतिबंधित करता है. यह प्रावधान आज भी लिंग-आधारित मुद्दों को हल करने में महत्वपूर्ण है, जैसे कि नेशनल लीगल सर्विसेज अथॉरिटी बनाम यूनियन ऑफ इंडिया (2014) में महत्वपूर्ण निर्णय, धारा 15(3), जिसे डॉ. बी.आर. अंबेडकर और महिला सदस्यों के समर्थन से पेश किया गया, राज्य को महिलाओं के कल्याण के लिए प्रावधान बनाने की शक्ति प्रदान करता है, जिससे पंचायती राज में आरक्षण जैसी पहलों और घरेलू हिंसा से महिलाओं की सुरक्षा अधिनियम जैसे कानूनों का मार्ग प्रशस्त हुआ.

धर्मनिरपेक्षता और सामाजिक सुधार की वकालत  
हंसा मेहता और अमृत कौर जैसी महिलाओं ने धार्मिक स्वतंत्रता की आवश्यकता पर बल दिया, जबकि धर्म में निहित पिछड़ी प्रथाओं जैसे बाल विवाह और पर्दा प्रथा के खिलाफ सुधार की वकालत की. ऐजाज रसूल ने धार्मिक आरक्षण का विरोध किया, इसकी विभाजनकारी संभावनाओं पर चेतावनी दी. इन दृष्टिकोणों ने भारत के धर्मनिरपेक्ष ढांचे को आकार देने में मदद की, जिससे राज्य को धर्म से नैतिक रूप से दूरी बनाए रखने की आवश्यकता सुनिश्चित हुई. हाल के कानून और निर्णय, जैसे ट्रिपल तलाक पर प्रतिबंध और सबरीमाला फैसला, इस दूरदर्शी दृष्टिकोण को दर्शाते हैं.  

राज्य नीति के निर्देशात्मक सिद्धांतों पर प्रभाव 
राज्य नीति के निर्देशात्मक सिद्धांत (DPSPs) को महिलाओं की वकालत से बहुत कुछ मिला है. अमृत कौर ने इनकी महत्वता को शासन के मूलभूत तत्व के रूप में रेखांकित किया. वर्षों से, इन सिद्धांतों ने न्यायिक व्याख्याओं और विधायी विकास को प्रभावित किया है, जैसे कि अनुच्छेद 21ए के तहत शिक्षा के अधिकार की मान्यता और मातृत्व लाभ अधिनियम, 2017 का निर्माण.

निष्कर्ष  
जब हम भारतीय गणराज्य के 75 वर्षों का जश्न मना रहे हैं, तो यह आवश्यक है कि हम 'संस्थापक माताओं' के योगदान को भी स्वीकारें. उनका दृष्टिकोण आज भी भारत के संविधानिक ढांचे और सामाजिक प्रगति को आकार दे रहा है. आच्युत चेतन ने "द फाउंडिंग मदर्स ऑफ द इंडियन रिपब्लिक" में यह जोर दिया है कि ऐतिहासिक पूर्वाग्रहों को तोड़ना जरूरी है जो महिलाओं की भूमिका को राष्ट्र निर्माण में अस्पष्ट करते हैं. यह लेख इन अद्वितीय महिलाओं के दृष्टिकोण और योगदानों की पुनर्निर्माण करने की कोशिश करता है, ताकि उनकी भूमिकाएं पुरुषों के साथ समान रूप से स्वीकार की जा सकें.

(डिस्क्लेमर- इस लेख में व्यक्त विचार लेखक के खुद के विचार हैं और यह जरूरी नहीं कि यह प्रकाशन के दृष्टिकोणों को दर्शाते हों.) 

डॉ. फौजिया खान, अतिथि लेखक  व राज्य सभा सांसद 


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