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21वीं सदी के इस ग्लोबल वर्क लैंडस्केप में सफलता का मंत्र है ‘CESS’
भविष्य में काम के लिए ऐसे नेता और कर्मचारी चाहिए जो बदलने में सक्षम, सहानुभूतिपूर्ण, कुशल और लगातार आत्म-सुधार के लिए प्रतिबद्ध हों.
बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 1 year ago
दुनिया में कामकाज का स्वरूप तेजी से बदल रहा है, जिसे तकनीकी प्रगति, समाज की बदलती अपेक्षाएं, और पेशेवर जीवन में नए उद्देश्यों ने प्रेरित किया है. आज यह स्पष्ट हो गया है कि सफल होने के लिए संगठनों को पारंपरिक विशेषज्ञता से आगे बढ़कर कुछ नए गुण अपनाने होंगे. ये हैं 21वीं सदी के चार ज़रूरी CESS, कुशलता (Competencies), सहानुभूति (Empathy), कौशल (Skills), और आत्म-विकास (Self-Development). ये चार आपस में जुड़े हुए तत्व आज के समय की ज़रूरत को समझने का एक नया नजरिया देते हैं और संगठनों व कर्मचारियों को एक स्थायी भविष्य की ओर ले जाने के लिए बेहद महत्वपूर्ण हैं.
क्षमता (Competencies): किसी भी सफल करियर और संगठन की नींव क्षमताओं पर आधारित होती है. जैसे तकनीकी विशेषज्ञता, रणनीतिक सोच, और समस्या सुलझाने की क्षमता, लेकिन आज के समय में ये कुशलताएं बुनियादी स्तर से आगे बढ़नी चाहिए. तकनीकी बदलाव की तेज़ गति और वैश्विक बाज़ार की जटिलता के कारण कर्मचारियों और नेताओं को अनुकूलन क्षमता, लचीलापन, और अनिश्चितता का सामना करने की क्षमता होनी चाहिए.
पारंपरिक ज्ञान या अनुभव पर ही निर्भर रहना अब काफी नहीं है. बदलती मांगों के अनुसार खुद को ढालने की क्षमता और नई तकनीकों को अपनाने की फुर्ती ज़रूरी है. नई तकनीकों और बाज़ार में बदलाव से जो अनिश्चितताएं आती हैं, उनका सामना करने के लिए टीमों को लचीलापन और फुर्ती विकसित करनी होगी. नेताओं को ऐसी संस्कृति को बढ़ावा देना चाहिए जो अनुकूलता का जश्न मनाए, ताकि उनकी टीमें हर परिस्थिति में मजबूती से खड़ी रह सकें.
सहानुभूति (Empathy): सहानुभूति अब एक "सॉफ्ट स्किल" से आगे बढ़कर एक रणनीतिक कौशल बन गई है. यह समावेशी और लचीले कार्यस्थलों को बनाने में बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है. डिजिटल संचार के बढ़ते प्रभाव ने आधुनिक कार्यस्थल को काफी बदल दिया है, लेकिन इसमें भावनात्मक जुड़ाव की कमी हो सकती है. ऐसे में, सहानुभूति – दूसरों को समझने, उनसे जुड़ने और उनका समर्थन करने की क्षमता – प्रभावी नेतृत्व का एक खास गुण बन गई है.
सहानुभूतिपूर्ण नेता विश्वास, जुड़ाव और निष्ठा का माहौल बनाते हैं, जो टीमों को अधिक उत्पादक और सामंजस्यपूर्ण बनाता है. कोविड-19 महामारी से लेकर मानसिक स्वास्थ्य संकट जैसी वैश्विक चुनौतियों के बीच, सहानुभूति एक महत्वपूर्ण कौशल बनकर उभरी है. यह न केवल कार्यस्थल के आंतरिक माहौल को संभालने में मदद करती है, बल्कि बाहरी समस्याओं का सामना करने में भी सहायक है.
संगठनों के लिए यह समझना बहुत ज़रूरी हो गया है कि कर्मचारी किन चिंताओं से गुजर रहे हैं – चाहे वह नौकरी की सुरक्षा हो, स्वास्थ्य से जुड़ी परेशानियां, या काम और जीवन के बीच संतुलन. इससे उच्च मनोबल बनाए रखना और कर्मचारियों को रोक पाना संभव हो पाता है. सहानुभूति समावेशी माहौल बनाने में अहम भूमिका निभाती है, जहां हर कर्मचारी को उनके अनुभव और पृष्ठभूमि से परे मूल्यवान और सम्मानित महसूस होता है. यह संगठनों के उद्देश्यों को मानवीय भावना के साथ जोड़ती है, ऐसे माहौल को पोषित करती है जहां कर्मचारी व्यक्तिगत और पेशेवर दोनों रूप से आगे बढ़ते हैं.
कौशल (Skill): संगठनों को लगातार कौशल विकास के लिए रास्ते बनाने चाहिए, जबकि कर्मचारियों को अपने पेशेवर विकास की जिम्मेदारी खुद लेनी चाहिए. यह आपसी संबंध सुनिश्चित करता है कि दोनों पक्ष तेजी से बदलते माहौल में प्रासंगिक बने रहें. कौशल पर ध्यान केंद्रित करने से संगठन अपने कर्मचारियों की पूरी क्षमता का उपयोग कर सकते हैं, नवाचार को बढ़ावा दे सकते हैं और प्रतिस्पर्धात्मक बढ़त बना सकते हैं. योग्यता नींव तैयार करती है, लेकिन कौशल इसे प्रभावशाली तरीके से जीवन में लाते हैं.
आधुनिक नेताओं को तकनीकी और सॉफ्ट स्किल्स दोनों में माहिर होना चाहिए. भारत में, जहां डिजिटल अर्थव्यवस्था तेजी से बढ़ रही है, डेटा एनालिटिक्स, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और डिजिटल मार्केटिंग जैसे क्षेत्रों में विशेषज्ञता की मांग बढ़ रही है. हालांकि, जब संगठन विशेष कौशल वाले कर्मचारियों की तलाश कर रहे हैं, उन्हें सॉफ्ट स्किल्स जैसे कि संवाद, भावनात्मक समझ और टीमवर्क के महत्व को भी समझना चाहिए. ये मानवीय क्षमताएं संगठनों को मजबूत संबंध बनाने, रचनात्मकता को प्रेरित करने और नवाचार को बढ़ावा देने में मदद करती हैं. संगठनों को अपने कर्मचारियों के लिए निरंतर सीखने और अपस्किलिंग पर जोर देना चाहिए; इसी तरह, कर्मचारियों को भी अपने करियर को बेहतर बनाने की जिम्मेदारी लेनी चाहिए.
आत्म-विकास (Self-development): आज के समय में, सार्थक करियर की बढ़ती मांग इस बात पर जोर देती है कि संगठनों को व्यक्तिगत विकास और सामाजिक योगदान के अवसर देने चाहिए, ताकि वे युवा पेशेवरों की इच्छाओं के साथ तालमेल बिठा सकें. मेंटरशिप प्रोग्राम, नेतृत्व प्रशिक्षण और कोचिंग जैसी पहलें कर्मचारियों के व्यक्तिगत और पेशेवर विकास में महत्वपूर्ण निवेश हैं. ये पहल उन्हें अस्थिर, अनिश्चित, जटिल और अस्पष्ट (VUCA) माहौल की चुनौतियों का सामना करने के लिए तैयार करती हैं.
ऐसे समय में, जब बदलाव ही एकमात्र स्थिर चीज है, निरंतर सीखना, बढ़ना और खुद को नया रूप देना प्रासंगिक बने रहने के लिए जरूरी है. जैसे-जैसे ऑटोमेशन और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस सामान्य कार्यों को संभाल रहे हैं, मानवीय कौशल जैसे रचनात्मकता, भावनात्मक समझ और रणनीतिक सोच का महत्व और भी बढ़ गया है.
नेताओं और कर्मचारियों को आजीवन सीखने की आदत डालनी चाहिए, ताकि वे तकनीकी प्रगति से आगे रह सकें और तेजी से बदलती दुनिया में नेतृत्व करने के लिए सही सोच और क्षमताओं का विकास कर सकें. युवा पेशेवर ऐसे करियर की तलाश में हैं जो न केवल वित्तीय लाभ दें बल्कि व्यक्तिगत विकास और सामाजिक योगदान के अवसर भी प्रदान करें. जो संगठन आत्म-विकास की पहल जैसे मेंटरशिप, नेतृत्व प्रशिक्षण और व्यक्तिगत कोचिंग में निवेश करेंगे, वे मजबूत टीमें बनाएंगे और VUCA दुनिया की चुनौतियों का बेहतर सामना कर पाएंगे.
जैसे-जैसे संगठन एक वैश्वीकृत दुनिया की जटिलताओं को नेविगेट कर रहे हैं, उन्हें अपनी विकास रणनीतियों, कर्मचारी जुड़ाव और संगठनात्मक संस्कृति में इन मूल सिद्धांतों को शामिल करना चाहिए. भविष्य का कार्यक्षेत्र ऐसे नेताओं और कर्मचारियों की मांग करता है जो अनुकूल, सहानुभूतिपूर्ण, कुशल और निरंतर आत्म-सुधार के लिए प्रतिबद्ध हों.
जो संगठन और व्यक्ति इस चुनौती का सामना करेंगे, वे CESS ढांचे को अपनाएंगे – इसे अलग-अलग गुणों के रूप में नहीं, बल्कि अनिश्चितता में आगे बढ़ने के लिए एक समग्र दृष्टिकोण के रूप में, Competencies (क्षमताएं) हमें आधार देती हैं. Empathy (सहानुभूति) हमें जोड़ती है, Skills (कौशल) हमें सशक्त बनाती हैं, और Self-development (आत्म-विकास) हमें आगे बढ़ने की प्रेरणा देती है. यह सब मिलकर एक ऐसा मार्गदर्शक बनाते हैं, जो काम को सिर्फ जीवन जीने का साधन नहीं, बल्कि उद्देश्य, प्रगति और संभावनाओं का एक मंच बनाता है.
(लेखक- श्रीनाथ श्रीधरन, 27 वर्षों से विभिन्न क्षेत्रों में अग्रणी कॉरपोरेट्स को रणनीतिक मार्गदर्शन देने का अनुभव. कई क्षेत्रों में इंडिपेंडेंट डायरेक्टर के रूप में कार्यरत, संगठनों को वित्त, डिजिटल, उपभोक्ता अर्थव्यवस्था, GEMZ (गिग इकॉनमी, मिलेनियल्स, जेन Z) और ESG के मेल पर सलाह देते हैं. सीनियर लीडर्स को कोचिंग और मेंटरशिप देते हैं. उद्योग-विकास नीति और सार्वजनिक नीति के मुद्दों पर सक्रिय रूप से भाग लेते हैं. कई प्रबंधन संस्थानों और रेगुलेटरी शिक्षण केंद्रों में विजिटिंग फैकल्टी हैं. जिन विषयों पर काम करते हैं, उन पर नियमित रूप से मीडिया में लेख लिखते हैं. इसके साथ ही, वे ‘Time for Bharat’ के संपादक और सह-लेखक भी हैं.)
(लेखक- स्टीव कोरेया, एक एग्जीक्यूटिव कोच और OD (ऑर्गेनाइजेशनल डेवलपमेंट) कंसल्टेंट हैं.)
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