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समाजिक बदलाव के लिए दया और करूणा की नहीं, एक्शन की होती है जरूरत, जानिए कैसे?

बदलाव का सपना देखना मदद करने की ओर पहला कदम है, इसके लिए पीड़ा को कम करने और न्याय को बढ़ावा देने के लिए ठोस कदम उठाने की आवश्यकता होती है.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 2 years ago

अफ्रीका में मुझे एक बच्चे के रोने की आवाज़ सुनाई दी. कांगो के लोकतांत्रिक गणराज्य की खानों (Mines) में बच्चे हर दिन खतरनाक और अमानवीय हालात में खनिज निकालते हैं. उनकी चीखें सुनकर मुझसे रहा नहीं गया, इसलिए मैंने उनकी मदद करने के लिए उड़ान भरी. मैं दिल में दृढ़ संकल्प लेकर पहुंचा, लेकिन हकीकत बहुत कठिन थी. खान विशाल थी और शोषण गहरा था. मेरी कोशिश समुद्र में एक बूंद जैसी लगीं. मैंने समर्थन जुटाया, बचाव अभियान आयोजित किए और बच्चों के लिए शिक्षा और सुरक्षित ठिकाने प्रदान किए. उनके चेहरों पर मुस्कान लौट आई, जिससे मुझे खुशी महसूस हुई.

लेकिन फिर मैं जाग गई. वास्तव में कुछ भी नहीं हुआ था. मैंने केवल उन बच्चों की मदद करने का सपना देखा था. इस सपने ने मुझे एक सवाल दिया: क्या केवल दया का सपना देखना मुझे दयालु बनाता है, या यह मेरी कायरता को उजागर करता है क्योंकि मैंने असल में कुछ नहीं किया?

इस आंतरिक संघर्ष ने मुझे उर्सुला के. ले गुइन की कहानी, "द वनस हू वॉक अवे फ्रॉम ओमेलास" की याद दिलाई. ओमेलास में पूरे समाज की खुशी एक अकेले बच्चे की यातना पर निर्भर होती है, एक ऐसा बच्चा जिसे हर दिन यातना दी जाती है. ज्यादातर नागरिक, यह जानते हुए भी, इनकार में जीते हैं या अपनी निष्क्रियता को सही ठहराते हैं, जबकि कुछ लोग यह स्वीकार नहीं कर पाते और चले जाते हैं. क्या बच्चे के लिए दुख महसूस करना काफी है? या सच्ची दया के लिए कार्रवाई आवश्यक है?

दयालुता एक ऐसा शब्द है जिसका हम उपयोग दूसरों के दुख को समझने और उसे कम करने के प्रयासों का वर्णन करने के लिए करते हैं. लेकिन सच्ची दया व्यवहार में कैसी दिखती है? क्या यह केवल सहानुभूति का भाव है, या वास्तविक फर्क लाने के लिए ठोस कदमों की आवश्यकता होती है?

कैलाश सत्यार्थी एक ऐसे व्यक्ति हैं जिन्होंने अपने जीवन में सच्ची दया का प्रदर्शन किया है. उनका सफर दशकों पहले शुरू हुआ जब उन्होंने एक इंजीनियर के रूप में अपना करियर छोड़ दिया और एक सामाजिक कार्यकर्ता बनने का निर्णय लिया. उन्होंने भारत में बचपन बचाओ आंदोलन की शुरूआत की, जिसने हजारों बच्चों को बंधुआ मजदूरी और गुलामी से बचाया है. अपनी लगातार वकालत के माध्यम से कैलाश सत्यार्थी ने शोषणकारी श्रम स्थितियों में फंसे लाखों बच्चों की दुर्दशा के बारे में वैश्विक जागरूकता बढ़ाई है.

लेकिन सत्यार्थी जी के बारे में जो मुझे वास्तव में प्रेरित करता है, वह सिर्फ उनके बचाव मिशन नहीं हैं, बल्कि अन्याय के प्रति उनकी सच्ची चिंता है. यह उनकी सहानुभूति और मानवता है जिससे वे अपना काम करते हैं. वह पीड़ितों की कहानियों को सुनते हैं, उनकी आवाज़ को बढ़ाते हैं और उन्हें उनके समुदायों में परिवर्तन का एजेंट बनने के लिए सशक्त करते हैं. उनकी विनम्रता, ईमानदारी और हर बच्चे की अंतर्निहित गरिमा में अटूट विश्वास दूसरों को न्याय के लिए उनकी लड़ाई में शामिल होने के लिए प्रेरित करता है.

वह समझते हैं कि सच्चा परिवर्तन बाल श्रम के मूल कारणों को संबोधित करने और सिस्टमैटिक रिफॉर्म के लिए वकालत करने की आवश्यकता है. उन्होंने बच्चों के अधिकारों की रक्षा कानून के लिए अभियान चलाने और सरकारों और कंपनियों को उनके कार्यों के लिए जिम्मेदार ठहराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है. उनके प्रयासों के कारण महत्वपूर्ण उपलब्धियां हासिल हुई हैं, जिनमें अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन के समझौतों को अपनाना और उन्हें 2014 में नोबेल शांति पुरस्कार मिलना शामिल है.

कैलाश सत्यार्थी चिल्ड्रन फाउंडेशन में इंटर्नशिप के दौरान मुझे कैलाश सत्यार्थी की करुणा का प्रत्यक्ष अनुभव करने का सौभाग्य मिला है. बाल श्रम मुक्त दुनिया की उनकी दृष्टि उनके साथ काम करने वाले सभी लोगों के दिल में गहराई से गूंजती है, जो एक अधिक न्यायपूर्ण और करुणामय समाज बनाने के हमारे सामूहिक प्रयासों को प्रोत्साहित करती है.

एक और उदाहरण एक दयालु और निःस्वार्थ नेता मदर टेरेसा का है. मुझे यकीन है कि हम सभी ने किसी न किसी तरह से मदर टेरेसा के बारे में सुना है. 1910 में स्कोप्जे में जन्मी अगनेस गोंझा बोयाजियु, मदर टेरेसा ने कम उम्र से ही दूसरों की सेवा करने की प्रेरणा महसूस की. 18 साल की उम्र में, उन्होंने मिशनरी बनने के इरादे से अंग्रेजी सीखने के लिए आयरलैंड में लोरेटो की सिस्टर्स में शामिल होने के लिए अपना घर छोड़ दिया. 1929 में, वह भारत पहुंचीं और कलकत्ता में एक शिक्षक के रूप में अपना काम शुरू किया, जहां उन्होंने 1950 में मिशनरीज ऑफ चैरिटी की स्थापना की.

मदर टेरेसा का मिशन सरल लेकिन गहरा था. गरीबों को प्यार, देखभाल और गरिमा प्रदान करना, विशेष रूप से उन लोगों को जो बीमार, परित्यक्त या सड़कों पर मर रहे थे. विनम्रता और करुणा को अपने मार्गदर्शक सिद्धांतों के रूप में मानते हुए, मदर टेरेसा और उनकी बहनों ने अनगिनत व्यक्तियों की शारीरिक, भावनात्मक और आध्यात्मिक जरूरतों को पूरा किया, चाहे उनका धर्म या पृष्ठभूमि कुछ भी हो, जो उस समय सामान्य नहीं था.

मदर टेरेसा को वास्तव में जो अलग बनाता है, वह है उनके कार्यों में करुणा का अवतार. उन्होंने केवल प्यार और दया के बारे में प्रचार नहीं किया, उन्होंने इसे हर दिन दूसरों की निःस्वार्थ सेवा के माध्यम से जिया. चाहे वह बेघर लोगों को नहलाना और खाना खिलाना हो, बीमार और मरते हुए लोगों को सांत्वना देना हो, या हाशिए पर पड़े लोगों की वकालत करना हो, मदर टेरेसा का जीवन करुणा की परिवर्तनकारी शक्ति का प्रमाण था.

मदर टेरेसा और कैलाश सत्यार्थी में एक समानता है कि उनका हर व्यक्ति की अंतर्निहित गरिमा और मूल्य में उनका अटूट विश्वास, चाहे उनकी सामाजिक स्थिति, जाती या पृष्ठभूमि कुछ भी हो. दोनों यह समझते हैं कि हर व्यक्ति के साथ सम्मान, दया और सहानुभूति से पेश आना महत्वपूर्ण है और उन्होंने इन मूल्यों को अपने काम में बनाए रखने के लिए अपने जीवन को समर्पित कर दिया है. वे यह भी समझते हैं कि सच्ची करुणा केवल भौतिक सहायता प्रदान करने से परे है, इसमें पीड़ा के मूल कारणों का समाधान करना और प्रणालीगत परिवर्तन के लिए वकालत करना भी शामिल है. चाहे बच्चों को शोषण से मुक्त जीवन जीने के अधिकार की वकालत करना हो या बीमार और बेसहारा लोगों की देखभाल करना हो. वे यह मानते हैं कि तत्काल जरूरतों और गरीबी और असमानता को बनाए रखने वाले अंतर्निहित मुद्दों दोनों को संबोधित करना महत्वपूर्ण है. 

शुरुआती सवाल पर लौटते हैं, क्या मैं केवल ऐसे बदलाव का सपना देखने के लिए कायर हूं? क्या यह वास्तव में संभव है कि मेरे हाथ बंधे हुए हों, या यह केवल एक झूठ है जो हम अपनी आलस्य से निपटने के लिए खुद को बताते हैं? हम उन लोगों की ओर से आंखें मूंद लेते हैं जिन्हें हमारी सबसे ज्यादा जरूरत होती है, जिससे कभी-कभी स्थिति और भी बदतर हो जाती है. हम कहते हैं कि हम अपना हिस्सा कर रहे हैं, लेकिन क्या यह सच नहीं है कि हम और अधिक कर सकते हैं? क्या वास्तव में हमारा यह कर्तव्य नहीं है कि हम और अधिक करें? क्या हमसे कम भाग्यशाली लोगों के लिए हम जिम्मेदार नहीं हैं? ओमेलास के नागरिक जो बच्चे की भयानक पीड़ा से मुंह मोड़ लेते हैं, क्या वे इसके लिए जिम्मेदार नहीं हैं? 

बदलाव का सपना देखना मदद करने की ओर पहला कदम है, लेकिन सच्ची करुणा के लिए केवल विचार या इरादे से अधिक की आवश्यकता होती है; इसके लिए पीड़ा को कम करने और न्याय को बढ़ावा देने के लिए ठोस कदम उठाने की आवश्यकता होती है. हालाँकि, यह मानना महत्वपूर्ण है कि अक्सर ऐसी सिस्टमैटिक बाधाएं होती हैं जो हमारे तात्कालिक कार्रवाई करने की क्षमता को सीमित कर सकती हैं. इनमें संरचनात्मक असमानताएं, संसाधनों की सीमाएं, या व्यक्तिगत परिस्थितियां शामिल हो सकती हैं जो सार्थक बदलाव लाने में चुनौतीपूर्ण हो सकती हैं.

लेकिन सवाल यह है कि एक ऐसी दुनिया में जहां पीड़ा व्यापक है और हमारे बदलाव की क्षमता अक्सर सीमित महसूस होती है, क्या हम इस असहज सच्चाई का सामना करने की हिम्मत करते हैं कि हमारा कुछ न कर पाना शायद उन्हीं अन्यायों को बनाए रख सकती है जिनसे हम नफरत करते हैं?

 

लेखक- अवंतिका जैन कुमार
(अवंतिका जैन कुमार नई दिल्ली के संस्कृति स्कूल में बारहवीं कक्षा की छात्रा हैं और वर्तमान में कैलाश सत्यार्थी चिल्ड्रन फाउंडेशन के सत्यार्थी मूवमेंट फॉर ग्लोबल कंपैशन में इंटर्नशिप कर रही हैं. वह "द टेल्स ऑफ़ ज़ारिया" नामक पुस्तक की लेखिका भी हैं).

 


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