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आने वाला समय डराने वाला! इनपर काम करना सरकार के लिए अब बहुत जरूरी

दूसरी तरफ अर्थशास्त्रियों का मानना है कि नकदी की कमी के कारण ही सरकार ने देश को कैशलेस इकोनॉमी की तरफ तेजी से बढ़ाना शुरू किया है.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 3 years ago

अजय शुक्ला
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)

नई दिल्ली: जब दुनिया मंदी के मुहाने पर खड़ी हो, उस वक्त भारत उससे अछूता कैसे रह सकता है. जहां कांग्रेस पार्टी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सरकार की नीतियों पर सवाल खड़े कर रही है, वहीं उनके मंत्री मंदी को महंगाई की वजह बता रहे हैं. हाल ही में केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी ने कहा कि भारतीय अर्थव्यवस्था चुनौतीपूर्ण दौर से गुजर रही है. देश की बैंके इस समय नकदी की कमी से जूझ रही हैं. इस बारे में नीतिगत फैसले लेने की जरूरत है.

अर्थशास्त्रियों का क्या मानना
दूसरी तरफ अर्थशास्त्रियों का मानना है कि नकदी की कमी के कारण ही सरकार ने देश को कैशलेस इकोनॉमी की तरफ तेजी से बढ़ाना शुरू किया है. साल की दूसरी तिमाही (अप्रैल-जून) में 20.57 अरब रुपये का डिजिटल लेनदेन हुआ. इनमें से 83 फीसदी यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस (UPI) के जरिए. वॉल्यूम के हिसाब से बीती तिमाही में कुल 36.08 लाख करोड़ रुपए का लेनदेन हुआ. इसमें UPI की हिस्सेदारी 84 फीसदी रही.

दुनिया की पांचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था भारत
जहां हम दुनिया की पांचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था होने से खुश हैं, वहीं इस साल मार्च के अंत में भारत की अर्थव्यवस्था 854.7 अरब डॉलर की थी, जबकि ब्रिटेन की अर्थव्यवस्था 816 अरब डॉलर की थी. वजह यह नहीं कि ब्रिटेन पीछे छूट गया बल्कि समृद्धि के मामले में भारत अभी भी ब्रिटेन से 20 गुना पीछे है. भारत की आबादी 138 करोड़ है जबकि ब्रिटेन की पौने सात करोड़. वहां, न नकदी की कमी है और न संसाधनों की. यही नहीं, वहां सामाजिक-आर्थिक असमानता भी भारत के मुकाबले नगण्य है.

आरबीआई के आंकड़े
आरबीआई के ताजा आंकड़ों के मुताबिक 23 सितंबर को जहां भारत का विदेशी मुद्रा भंडार 537.52 अरब डॉलर था, जो 9 अक्तूबर को 532.66 अरब डॉलर रह गया. भारतीय रुपये का लगातार अवमूल्यन हो रहा है, जो 82.83 रुपये प्रति डॉलर पर पहुंच चुका है. रुपये का ऑल टाइम गिरना और व्यापार घाटे का लगातार बढ़ना और भी चिंताजनक है. अगस्त 2022 में देश का आयात 37.28 फीसदी बढ़कर 61.9 अरब डॉलर हो गया जबकि निर्यात 33.92 अरब डॉलर हो गया.

जाली नोटों की संख्या में बढ़ोतरी
इससे पहले आरबीआई ने भी सलाना रिपोर्ट में बताया है कि देश में 2021-22 में जाली नोटों की संख्या में 2020-21 के मुकाबले 10.7 फीसदी बढ़ चुकी है. 2021-22 में 500 रुपये के 101.9 फीसदी ज्यादा जाली नोट मिले हैं. वहीं 2,000 के रुपये जाली नोटों की संख्या में 54.16 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है. अभी हाल के दिनों में सिर्फ गुजरात में 337 करोड़ के नकली नोट अब तक बरामद हो चुके हैं. इससे साफ है कि देश की अर्थव्यवस्था में नकली नोट किस तरह से सेंध लगा रहे हैं.

हालात बहुत अच्छे नहीं माने जा सकते
प्रधानमंत्री के आर्थिक सलाहकार मानते हैं कि देश की अर्थव्यवस्था कोविड पूर्व के दौर में आ गई है. उनकी बात को अगर सही माना जाये तो फिर उस वक्त देश की विकास दर 4.5 फीसदी थी. ऐसे में तो हालात बहुत अच्छे नहीं माने जा सकते हैं. बुधवार को विश्व व्यापार संगठन ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि मंदी के चलते वैश्विक कारोबार में 1 फीसदी की गिरावट आएगी. इससे स्पष्ट है कि व्यापार 2.4 फीसदी रह जाएगा. इसका असर भारत के कारपोरेट जगत पर भी पड़ना तय है.

विश्व मुद्रा कोष का भारत को लेकर अनुमान
विश्व मुद्रा कोष ने भारत की विकास दर का अनुमान 6.5 फीसदी कर दिया है, जबिक प्रधानमंत्री के अर्थ सलाहकार का मानना है कि यह 7 फीसदी ही रहेगा. आईएमएफ का यह अनुमान इस आधार पर है कि मोदी सरकार पब्लिक फाइनेंस पर खर्च बढ़ाएगी. नकदी की कमी इसमें आड़े आ रहे हैं. खर्च और आमदनी में संतुलन बैठाना मुश्किल हो रहा है, जिससे कर्ज का बोझ लगातार बढ़ता जा रहा है. सरकार पहले ही इस साल की बजट योजनाओं में से 80 हजार करोड़ रुपये की कटौती करके बचाए हैं. सरकार एक तरफ तो नकदी बचा रही है मगर चुनावी कारणों से वह रेवड़ियां बांटने में जुटी है. देश के नागरिकों की आय कम होने या बहुत कम होने से पांच किलो मुफ्त अनाज को लगातार बढ़ाया जा रहा है. इसका अतिरिक्त बोझ खजाने पर पड़ रहा है, जो अर्थव्यवस्था के लिहाज से काफी चिंताजनक है.

गंभीर आर्थिक मंदी को लेकर चिंताएं
पिछले कई महीनों से दुनिया भर में गंभीर आर्थिक मंदी को लेकर चिंताएं व्यक्त की जा रही हैं. इसकी बड़ी वजह कोरोना के बाद दुनिया भर में लगे लॉकडाउन और फिर उद्योग-व्यापार को सही से संभाल न पाना माना जा रहा है. यूक्रेन पर रूस का हमला इसे और भी बढ़ा रहा है. बावजूद इसके, अर्थशास्त्री मानते हैं कि आर्थिक संकट की वजह इनमें नहीं बल्कि वो नीतियां हैं, जो समस्यायें पैदा करने वाला है. आपको 2008 की आर्थिक मंदी याद होगी, जिसने पूरी दुनिया की वित्तीय व्यवस्था को संकट में डाल दिया था. इस मंदी के दौर में हमने दुनिया के तमाम देशों की बेरोजगारी और आर्थिक संकट को महसूस किया था.

कोरोना काल में हालत और खराब हुई
दुनिया की सरकारों ने बाजारों को सुधारने और निर्माण क्षेत्र में सुधार पर काम किया, जिससे संकट लगातार कम होते गये मगर इस बार हालात काफी खराब हैं. जिन लोगों की जिंदगी पटरी से उतर गई थी और अब कोरोना काल में और भी खराब हुई, जो संकटों को बढ़ाने वाली है. वित्तीय वर्ष 2022 के अंतिम तिमाही में औद्योगिक उत्पादन में जो गिरावट देखने को मिली, वो बहुत सुधार की ओर नहीं है. आठ कोर सेक्टरों का उत्पादन अगस्त में 3.3 फीसदी की सुस्त रफ्तार से बढ़ा है. वहीं, अप्रैल-अगस्त की अवधि में भारत का राजकोषीय घाटा 5.42 लाख करोड़ रुपये था, जो पूरे साल के लक्ष्य का 32.6 प्रतिशत था, जो पिछले साल समान अवधि में 31.1 प्रतिशत पर था. राजकोषीय घाटा भी चिंताजनक है. इस वित्त वर्ष की शुरुआत से सितंबर तक केंद्र सरकार ने 13.9 लाख करोड़ रुपये खर्च किए हैं जो कि वित्त वर्ष 2022-23 के बजट अनुमान का 35.2 प्रतिशत है. ऐसे में सरकार ने अधिक से अधिक टैक्स लगाकर बजट नियंत्रित करने की कोशिश की है मगर महंगाई और बेरोजगारी ने इस संकट को काफी बढ़ा दिया है.

विश्व बैंक का क्या मानना है
विश्व बैंक का मानना है कि कई सालों तक प्रगतिशील विकास दर के बाद, भारत की अर्थव्यवस्था कोविड -19 महामारी की शुरुआत के पहले ही सुस्त होने लगी थी. वित्त वर्ष 2017 और वित्त वर्ष 2020 के बीच, वित्तीय क्षेत्र में कमजोरी के साथ ही निजी उपभोग की वृद्धि में गिरावट से विकास दर 8.3 फीसदी से गिरकर 4.0 फीसदी तक आ गई थी. वित्त वर्ष 2021 में, अर्थव्यवस्था में 7.3 फीसदी की गिरावट आई.

संकट गंभीर होते जा रहे
कोरोना महामारी के संकट के जवाब में, सरकार और भारतीय रिजर्व बैंक ने कमजोर कंपनियों और परिवारों का समर्थन करने, सेवा डिलीवरी का विस्तार (स्वास्थ्य और सामाजिक सुरक्षा पर वृद्धि हुई खर्च के साथ) करने और अर्थव्यवस्था पर संकट के असर को कम करने के लिए कई मौद्रिक और राजकोषीय नीति उपाय आंशिक रूप से थे. अब अगर सरकार सक्रिय उपाय करे तो अर्थव्यवस्था वर्ष 2022 में मजबूत हो सकती थी मगर कोर सेक्टर को संबल न मिलने और बेरोजगारी का कारगर उपाय न होने से संकट गंभीर होते जा रहे हैं.
 


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