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ग्लोबल साउथ में हीट संकट से निपटने का नया रास्ता: गवर्नेंस और सामूहिक प्रयास पर जोर

ग्लोबल साउथ में बढ़ते हीट संकट से निपटने के लिए अब पारंपरिक सोच से आगे बढ़ने की जरूरत है. विशेषज्ञों के अनुसार, बहु-क्षेत्रीय सहयोग. स्थानीय संदर्भ और मजबूत गवर्नेंस तंत्र ही इस चुनौती का प्रभावी समाधान दे सकते हैं.

रितु राणा 6 months ago

दुनिया भर में बढ़ती गर्मी अब केवल मौसम का मुद्दा नहीं रह गई है, बल्कि यह एक गंभीर सामाजिक, आर्थिक और स्वास्थ्य संकट बन चुकी है. नई दिल्ली स्थित भारत मंडपम में ग्लोबल हीट व कूलिंग फोरम के दौरान ग्लोबल हीट हेल्थ इंफॉर्मेशन नेटवर्क के सहयोग से आयोजित “ग्लोबल साउथ में हीट रेजिलिएंस को मजबूत करने के गवर्नेंस पाथवे” सत्र में विशेषज्ञों ने स्पष्ट किया कि हीट संकट से निपटने के लिए बहु-क्षेत्रीय और समन्वित दृष्टिकोण अनिवार्य है. सत्र का संचालन राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (NDMA) द्वारा किया गया.

एकल-क्षेत्रीय प्रयास क्यों हैं नाकाफी

सत्र में विशेषज्ञ के रूप में शामिल सिंगापुर स्वास्थ्य मंत्रालय में हीट स्ट्रेस गाइटलाइन्स एक्सपर्ट पैनल के सदस्य व  हीट रेजिलिएंस  एंड पर्फॉर्मेंस सेंटर के निदेशक डॉ. जेसन काई वेई ली (Jason Kw Lee) ने बताया कि विभिन्न देशों के हीट एक्शन प्लानों के आकलन से यह सामने आया है कि केवल एक विभाग या एजेंसी के भरोसे इस चुनौती से निपटना संभव नहीं है. उन्होंने कहा कि हीट का प्रभाव इतना व्यापक है कि यह परिवहन, स्वास्थ्य, श्रम, शिक्षा और शहरी विकास जैसे सभी क्षेत्रों को प्रभावित करता है. इसलिए. किसी एक क्षेत्र के नेतृत्व के बावजूद सभी क्षेत्रों की भागीदारी जरूरी है.

हीट गवर्नेंस: एक समन्वित प्रक्रिया

डॉ. जेसन के अनुसार, हीट गवर्नेंस एक ऐसी प्रक्रिया है जिसमें विभिन्न क्षेत्रों के लोग. संस्थाएं और संसाधन एक साथ लाए जाते हैं. इसका उद्देश्य समन्वित तरीके से कार्य कर गर्मी के प्रभाव को कम करना है. इसके लिए न केवल नीतियां बनानी होंगी. बल्कि उनके प्रभावी क्रियान्वयन के लिए मजबूत तंत्र भी विकसित करना होगा.

उन्होंने उदाहरण देते हुए बताया कि हीट का असर केवल स्वास्थ्य तक सीमित नहीं है. एक फिल्म निर्माता के अनुभव के जरिए यह समझाया गया कि अत्यधिक गर्मी के कारण शूटिंग के समय और उत्पादकता पर भी असर पड़ रहा है. यह साफ संकेत है कि हीट अर्थव्यवस्था और कामकाज के हर क्षेत्र को प्रभावित कर रही है.

स्थानीय संदर्भ के अनुसार बनें नीतियां

सत्र में जलवायु परिवर्तन के अनुकूलन हेतु नीति शोधकर्ता, किंग्स कॉलेज लंदन और सस्टेनेबल फ्यूचर्स कोलैबोरेटिव आदित्य पिल्लई ने जोर देकर कहा कि हीट से जुड़ी नीतियां बनाते समय “स्थान” सबसे महत्वपूर्ण कारक होता है. उन्होंने कहा, “विज्ञान और ज्ञान राजा हैं. लेकिन संदर्भ रानी है. दोनों के संतुलन से ही प्रभावी हीट नीति तैयार होती है.” इसलिए, हर क्षेत्र की स्थानीय परिस्थितियों को समझकर ही रणनीति बनानी चाहिए.

हीट: सिर्फ स्वास्थ्य नहीं. विकास का भी मुद्दा

आदित्य ने यह भी स्पष्ट किया कि हीट को केवल मृत्यु और बीमारी से जोड़कर देखना अधूरा दृष्टिकोण है. यह मानव जीवन के हर पहलू, खानपान, आराम, शारीरिक गतिविधि और कार्यक्षमता को प्रभावित करता है. सही निवेश और रणनीति के जरिए हीट स्ट्रेस को कम कर पूरी आबादी की उत्पादकता बढ़ाई जा सकती है.

सरकारों के लिए अवसर भी है यह संकट

आदित्य ने अपने अनुभव साझा करते हुए बताया कि पहले सरकारें हीट को सीमित क्षेत्रों की समस्या मानती थीं. लेकिन अब इसे एक बड़े अवसर के रूप में देखा जा रहा है. उन्होंने कहा कि जैसे कोविड-19 ने डिजिटलाइजेशन को बढ़ावा दिया. वैसे ही मौजूदा संकट स्वच्छ ऊर्जा और बेहतर नीतियों को आगे बढ़ा सकता है.

बेहतर नीति के लिए टूलकिट और आकलन

सत्र में एक विशेष टूलकिट और “मैच्योरिटी मॉडल” भी प्रस्तुत किया गया. जिसमें छह सवालों के जरिए यह आकलन किया जाता है कि किसी क्षेत्र में हीट गवर्नेंस कितना प्रभावी है. इसका उद्देश्य नीति-निर्माताओं और विशेषज्ञों को बेहतर समन्वय और ठोस कदम उठाने में मदद करना है.

ग्लोबल साउथ में बढ़ते हीट संकट से निपटने के लिए अब पारंपरिक सोच से आगे बढ़ने की जरूरत है. विशेषज्ञों के अनुसार. बहु-क्षेत्रीय सहयोग. स्थानीय संदर्भ और मजबूत गवर्नेंस तंत्र ही इस चुनौती का प्रभावी समाधान दे सकते हैं. यह संकट केवल खतरा नहीं. बल्कि एक ऐसा अवसर भी है. जो सही रणनीति के जरिए समाज और अर्थव्यवस्था दोनों को मजबूत बना सकता है.
 


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