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रीसाइक्लिंग बनेगा MSME विकास का नया इंजन: मंत्री जितेंद्र सिंह
केंद्र सरकार में स्वतंत्र राज्य मंत्री जितेंद्र सिंह ने कहा, कचरे को धन में बदलने की पहल से स्टार्टअप्स और छोटे व्यवसायों के लिए नए अवसर खुलेंगे.
बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 1 hour ago
भारत सरकार सर्कुलर इकोनॉमी (परिपत्र अर्थव्यवस्था) की रणनीति में रीसाइक्लिंग और संसाधन दक्षता को एक केंद्रीय स्तंभ के रूप में स्थापित कर रही है. वरिष्ठ सरकारी अधिकारियों के अनुसार अब वेस्ट मैनेजमेंट केवल बड़े औद्योगिक समूहों तक सीमित नहीं रहा बल्कि यह स्टार्टअप्स और सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यमों (MSMEs) के लिए एक संगठित आर्थिक अवसर के रूप में उभर रहा है.
सरकार बन रही है फैसिलिटेटर
केंद्रीय विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी, पृथ्वी विज्ञान, प्रधानमंत्री कार्यालय, परमाणु ऊर्जा विभाग, अंतरिक्ष विभाग तथा कार्मिक, लोक शिकायत और पेंशन मामलों के राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा कि रीसाइक्लिंग अब विभिन्न क्षेत्रों में एक महत्वपूर्ण आर्थिक चालक बनती जा रही है. उन्होंने वैश्विक संसाधन दक्षता और सर्कुलर इकोनॉमी पर आयोजित एक संगोष्ठी में कहा कि भारत उन क्षेत्रों में भी निजी भागीदारी बढ़ा रहा है जो पहले बड़े उद्योगों के नियंत्रण में थे.
उन्होंने कहा कि सरकार अब मुख्य रूप से एक “सुविधाकर्ता” (facilitator) की भूमिका निभा रही है और उभरते हरित बाजारों में उद्योग आधारित नवाचार को बढ़ावा दे रही है. उन्होंने यह भी उल्लेख किया कि अंतरिक्ष और परमाणु ऊर्जा जैसे क्षेत्रों में भी निजी क्षेत्र की भागीदारी के लिए नीतिगत सुधार किए गए हैं.
कचरे से कमाई: 4,000 करोड़ रुपये का राजस्व
RECEIC ग्लोबल संगोष्ठी में बोलते हुए उन्होंने बताया कि अब कचरे को आर्थिक संपत्ति के रूप में देखा जा रहा है. उन्होंने कहा कि अक्टूबर 2021 में शुरू किए गए राष्ट्रीय स्वच्छता अभियान के तहत पिछले पाँच वर्षों में इलेक्ट्रॉनिक कचरे सहित स्क्रैप के व्यवस्थित निपटान से 4,000 करोड़ रुपये से अधिक का राजस्व प्राप्त हुआ है. यह भारत में बेकार सामग्री के मुद्रीकरण (monetisation) की दिशा में एक संरचनात्मक बदलाव को दर्शाता है.
रीसाइक्लिंग के नए मॉडल: कचरे से बन रहे मूल्य श्रृंखला
उन्होंने यह भी बताया कि प्लास्टिक कचरे और स्टील स्लैग का उपयोग सड़क निर्माण में तथा प्रयुक्त खाना पकाने के तेल को बायोफ्यूल में बदलने जैसे उदाहरण यह दिखाते हैं कि कैसे एक ही कचरे की धारा से कई मूल्य श्रृंखलाएँ (value chains) बनाई जा सकती हैं जिससे पर्यावरणीय और आर्थिक दोनों लाभ मिलते हैं.
EPR और नियमों में सुधार: डिजिटल निगरानी पर जोर
पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के अधिकारियों ने बताया कि इस बदलाव को समर्थन देने के लिए नियामकीय ढांचे को मजबूत किया जा रहा है. मंत्रालय के संयुक्त सचिव नीलेश साह ने कहा कि 2016 में शुरू और 2022-23 में डिजिटलाइज किए गए एक्सटेंडेड प्रोड्यूसर रिस्पॉन्सिबिलिटी (EPR) ढांचे ने भागीदारी को काफी बढ़ाया है. इसके तहत लगभग 75,000 उत्पादक, आयातक और ब्रांड मालिक तथा लगभग 5,000 रीसाइक्लर पंजीकृत हैं.
उन्होंने यह भी बताया कि जनवरी 2026 में अधिसूचित और 1 अप्रैल 2026 से प्रभावी संशोधित ठोस अपशिष्ट प्रबंधन नियमों में डिजिटल मॉनिटरिंग और सर्कुलर इकोनॉमी के सिद्धांतों को शामिल किया गया है. इसके साथ ही इको-लेबलिंग और LiFE (Lifestyle for Environment) अभियान से जुड़े सतत उपभोग कार्यक्रम भी व्यवहार परिवर्तन को बढ़ावा दे रहे हैं.
बायोटेक और सस्टेनेबिलिटी: विकास का नया मॉडल
जैव प्रौद्योगिकी क्षेत्र से जुड़े विशेषज्ञ जितेंद्र कुमार ने कहा कि भारत की पारंपरिक जीवनशैली में पहले से ही सर्कुलर इकोनॉमी के तत्व मौजूद थे लेकिन औद्योगीकरण ने इन्हें कमजोर किया. उन्होंने विकास को पुनः परिभाषित करते हुए इसे स्थिरता और सर्कुलरिटी के साथ जोड़ने की आवश्यकता पर बल दिया.
उन्होंने “पॉल्यूटर पेज प्रिंसिपल” (प्रदूषक भुगतान सिद्धांत) को मजबूत करने और अनुपालन के लिए बेहतर तंत्र विकसित करने की आवश्यकता बताई. साथ ही उन्होंने BioE3 नीति के तहत रासायनिक-आधारित प्रक्रियाओं की जगह जैव-आधारित विकल्पों को बढ़ावा देने की बात कही जो अर्थव्यवस्था, पर्यावरण और रोजगार, तीनों को जोड़ती है. उन्होंने कार्बन क्रेडिट ट्रेडिंग सिस्टम विकसित करने की भी वकालत की.
उद्योग की भागीदारी: 60 सदस्यीय गठबंधन सक्रिय
उद्योग जगत के प्रतिनिधियों ने भी अपने प्रयास साझा किए. RECEIC स्टीयरिंग कमेटी के अध्यक्ष मनीष शर्मा ने बताया कि 60 सदस्यीय उद्योग गठबंधन पांच प्रमुख क्षेत्रों पैकेजिंग, सामग्री परिवर्तन, उपयोग किए गए तेल की सर्कुलैरिटी, टेक्सटाइल्स एवं परिधान, तथा ड्राई सेल बैटरियों, पर काम कर रहा है. इन क्षेत्रों में पायलट प्रोजेक्ट्स के जरिए सर्कुलर इकोनॉमी के व्यवहारिक और स्केलेबल समाधान विकसित किए जा रहे हैं.
कुल मिलाकर ये सभी पहलें भारत में एक समन्वित नीति और उद्योग आधारित प्रयास की ओर इशारा करती हैं जहां रीसाइक्लिंग को केवल पर्यावरणीय आवश्यकता ही नहीं बल्कि स्टार्टअप्स और MSMEs के लिए एक बड़े व्यावसायिक अवसर के रूप में भी देखा जा रहा है.
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