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अब समय आ गया है कि हम भी ग्लोबल B स्कूलों को रैंकिंग दें: प्रोफेसर भास्कर

IIM अहमदाबाद के निदेशक प्रोफेसर भारत भास्कर ने BW बिजनेसवर्ल्ड द्वारा आयोजित इवेंट में अपने विचार व्यक्त किए.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 2 years ago

BW Businessworld द्वारा दिल्ली में Business School Summit And Awards 2023 आयोजित किए जा रहे हैं. एजुकेशन इंडस्ट्री से जुड़े दिग्गज इसमें शिरकत कर रहे हैं और अपने विचार व्यक्त कर रहे हैं. इसी क्रम में IIM अहमदाबाद के निदेशक प्रोफेसर भारत भास्कर ने बताया कि पिछले कुछ सालों में किस तरह बिजनेस सेक्टर में बदलाव आया है और किस तरह बिजनेस स्कूलों को उसके अनुसार बदलना पड़ा है. अपनी बात समझाते हुए उन्होंने कहा कि बिजनेस स्कूल वो होते हैं जिन्हें लगातार रीइन्वेंट होना होता है. क्योंकि बिजनेस एजुकेशन दुनियाभर की इंडस्ट्री में जो कुछ हो रहा है उसका रिफ्लेक्शन है. मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर कैसे बदल रहा है, सर्विस सेक्टर कैसे बदल रहा है, ये सबकुछ इसमें शामिल होना चाहिए.

बीते कुछ सालों में बहुत कुछ बदला
प्रोफेसर भारत भास्कर ने कहा कि टेक्नोलॉजी ने मैन्युफैक्चरिंग और सर्विस सेक्टर को उन्नत बनाया है, इसी तरह मैनेजमेंट एजुकेशन को उन्नत होना होगा. ये एक अच्छी तरह से कोरियोग्राफ किया गया डांस है. यदि आप पिछले कुछ दशकों के मैनेजमेंट और बिजनेस एजुकेशन पर नजर डालेंगे तो पायेंगे कि कभी इंडस्ट्री लीड करती है और कभी एजुकेशन एवं मैनेजमेंट एजुकेशन सेक्टर लीड करता है, और इस अच्छी तरह से कोरियोग्राफ डांस में इंडस्ट्री और एकेडमिया प्रासंगिक बनने में सक्षम हैं, वो सोसाइटी, और अर्थव्यवथा को आगे बढ़ाते हैं. इसी तरह, अगर मैं 20 या 30 साल पहले की बात करूं, तो सर्विस और इंडस्ट्रियल परिदृश्य ट्रांसफॉर्मेशन से गुजरा है. आप खुद से पूछें कि 2007 में डिजिटल नेचर वाली कितनी कंपनियां टॉप-10 मार्किट कैपटलाइज में कहां थीं? इसका जवाब होगा जीरो. और यदि आप 2019 में पूछते कि कितनी कंपनियां डिजिटल नेचर या डिजिटल प्रोवाइडर हैं और टॉप 10 मार्किट कैपटलाइज में हैं, तो जवाब होता 7. जिसका मतलब है कि 70% डिजिटल एरीना से सम्बन्ध रखती हैं, मैनेजमेंट एजुकेशन को रियलिटी को रिफ्लेक्ट करना चाहिए.

मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में फंडामेंटल बदले
मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर की बात करें, तो इसके फंडामेंटल बदले हैं. कुछ साल पहले हम कस्टम प्रोडक्ट मैन्युफैक्चरिंग की बात करते थे. फिर मास मैन्युफैक्चरिंग के लिए असेंबली लाइन का अविष्कार हुआ, जिससे कास्ट कम हुई. आज प्रोडक्ट बनाया जाता है और कस्टमर को उसमें फिट किया जाता है. उदाहरण के लिए आज 32, 34, 36 साइज मिलता है, आप भले ही आपकी कमर 31 हो, लेकिन आपको 30 या 32 में फिट होना पड़ेगा. हम हमेशा से कस्टम प्रोडक्ट चाहते थे, लेकिन उस समय कस्टम प्रोडक्ट काफी महंगे थे. इसलिए मास, मास मैन्युफैक्चरिंग प्रोडक्ट को अफोर्ड कर सकता है. 50, 60 के दशक के बाद सभी मैनेजमेंट संस्थान इस पर बात करने लगे कि असेंबली लाइन को कैसे ऑप्टिमाइज किया जाए. इसमें डिजिटल टेक्नोलॉजी ने क्या काम किया? इसने लैंडस्केप को संशोधित किया. फिक्स रोबोट अस्तित्व में आए, लेकिन काम उसी असेंबली लाइन पर हुआ. रोबोट ने ऐसे काम ले लिए जो ज्यादा जोखिम वाले थे. मानव एक अलग असेंबली लाइन में आ गए और रोबोट एक अलग फिक्स असेंबली लाइन में. 

आज सेंसर ओरिएंटेड रोबोट हैं मौजूद 
प्रोफेसर भास्कर ने अपनी बात आगे बढ़ाते हुए कहा कि आज यदि आप मर्सडीज जैसी कंपनियों की असेंबली लाइन देखेंगे ओत पता चलागे कि मनुष्य और रोबोट मिलकर काम कर रहे हैं. आज सेंसर ओरिएंटेड रोबोट हैं, जो ह्यूमन प्रिजेंस को सेंसिटाइज करते हैं. उदाहरण के लिए यदि एक असेंबली लाइन में गियर बॉक्स बनाये जा रहे हैं, जहां केसिंग और लोडिंग इंसानों द्वारा की जाती है. वहां रोबोट सेन्स कर लेता है कि उसे कौनसा गियर उठाकर केस में लगाना है. यदि मनुष्य की गति धीमी है, तो रोबोट भी उसी अनुपात में धीमा हो जायेगा और यदि मनुष्य फास्ट है तो रोबोट उसकी स्पीड मैच कर लेगा. इसने एक नई असेंबली लाइन बनाई है, जो कस्टमाइज प्रोडक्ट तैयार कर रही है. इसलिए मैनेजमेंट एजुकेशन को यह सब रिफ्लेक्ट करना चाहिए. 

FT रैंकिंग को बताया पक्षपाती
बिजनेस वर्ल्‍ड समूह के चेयरमैन, एडिटर-इन-चीफ और एक्‍सचेंज4मीडिया के संस्‍थापक डॉ. अनुराग बत्रा ने प्रोफेसर भास्कर से दो सवाल पूछे 1 यदि आप पिछले 5-6 सालों की FT रैंकिंग देखें तो दो विदेशी स्कूलों ने काफी बेहतर किया है. तो हम इन यूरोपीयन बिजनेस स्कूल से क्या सीख सकते हैं? 2. आईआईएम अहमदाबाद से फुल टाइम MBA करने वाला और ऑनलाइन MBA करने वाला, दोनों यही कहेंगे कि हम आईआईएम अहमदाबाद एलुमनाई हैं, तो आप इससे कैसे निपटते हैं? प्रोफेसर भारत भास्कर ने FT रैंकिंग के बारे में बताते हुए कहा कि ये कुछ हद तक भारत के प्रति पक्षपाती है. ये अपने मानदंडों के आधार पर रैंकिंग देती है, जबकि हमारे अपने कुछ मानदंड हैं. हमारी कुछ सीमाएं भी हैं, जैसे कि इंटरनेशनलाइजेशन. देश में हमारे पास काफी छात्र हैं, हमें ज्यादा विदेशी छात्रों को आकर्षित करने की जरूरत नहीं है. और हम आकर्षित कर भी नहीं सकते, क्योंकि हमारी कुछ सीमाएं हैं. मुझे लगता है कि अब समय आ गया है कि हमारी बिजनेस पत्रिकाओं को भी ग्लोबल स्कूलों को रैंकिंग देनी चाहिए. हमें उन्हें बताना चाहिए कि हमारे पैरामीटर वो कहां फिट बैठते हैं. इसके बाद उन्होंने डॉ. बत्रा के दूसरे सवाल का जवाब देते हुए ऑफलाइन और ऑनलाइन MBA के महत्व पर प्रकाश डाला.


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