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राजनीतिक जवाबदेही या कानूनी भेदभाव? दो मामलों पर एक नजदीकी नजर

अभिषेक तिवारी का कहना है कि केवल निष्पक्ष और समय पर कानूनी कार्रवाई से ही न्याय व्यवस्था की साख को वापस पाया और मजबूत किया जा सकता है.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 1 year ago

भारत में यह उम्मीद की जाती है कि न्याय सबके लिए बराबर और निष्पक्ष होगा, जो हमारे लोकतंत्र की बुनियाद है. लेकिन हाल ही में कुछ बड़े नेताओं के खिलाफ कानूनी मामलों ने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या सच में कानून सब पर एक जैसा लागू होता है. 2022 में आम आदमी पार्टी (AAP) के नेताओं के खिलाफ हुई कार्रवाई और लंबे समय से चल रहे नेशनल हेराल्ड केस की तुलना से यह बात सामने आती है कि राजनीतिक जवाबदेही का मामला कितना जटिल है. अब सवाल यह है — क्या ये मामले सच में न्याय के लिए उठाए गए हैं, या फिर ऐसा लगता है कि कानून ताकतवर लोगों के लिए अलग तरह से काम करता है?

आप का मामला: गिरफ्तारी और अधूरे सबूतों की कहानी

2022 में आम आदमी पार्टी (AAP) के कई बड़े नेताओं पर केस दर्ज हुआ, जिनमें दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल, मनीष सिसोदिया और संजय सिंह शामिल थे. इन पर सरकारी कामकाज में भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप लगे और इन्हें गिरफ्तार कर लिया गया. जांच एजेंसियों ने इनके घरों और बैंक लॉकरों पर कई छापे मारे, लेकिन कोई बड़ा पैसा या पक्का सबूत नहीं मिला. जब आरोप इतने गंभीर थे, तो फिर कोई बड़ा सबूत क्यों नहीं मिला? इससे सवाल उठता है कि क्या ये गिरफ्तारियां सच में न्याय के लिए थीं या फिर राजनीति से प्रेरित थीं?

AAP नेताओं का कहना है कि ये मामला पूरी तरह से राजनीति से जुड़ा है और भारतीय जनता पार्टी (BJP) कानून का इस्तेमाल करके विपक्षी नेताओं को निशाना बना रही है. आलोचकों का भी कहना है कि इन गिरफ्तारियों की तेजी और तरीका, दूसरे मामलों की तुलना में, दिखाता है कि कानून का इस्तेमाल सभी पर एक जैसा नहीं हो रहा. हालांकि कोई ठोस सबूत नहीं मिला, फिर भी इन गिरफ्तारियों को मीडिया में खूब दिखाया गया, जिससे कई लोग मानते हैं कि इसका मकसद पार्टी की छवि खराब करना हो सकता है.

नेशनल हेराल्ड केस: दस साल पुरानी जांच, लेकिन कम कार्रवाई

इसके उलट, नेशनल हेराल्ड केस 2012 में शुरू हुआ था, लेकिन इसमें अब तक कोई खास कार्रवाई नहीं हुई है. यह केस कांग्रेस पार्टी के कुछ बड़े नेताओं से जुड़ा है. इसमें आरोप है कि नेशनल हेराल्ड अखबार की संपत्तियों को यंग इंडिया नाम की कंपनी ने बहुत कम कीमत पर हासिल किया, जबकि उनकी असली कीमत करीब 2,000 करोड़ रुपये बताई जाती है. लेकिन फिर भी, अब तक न कोई गिरफ्तारी हुई है और न ही कोई बड़ी कानूनी कार्रवाई.

इतने बड़े मामले में इतने सालों से कोई ठोस कदम न उठाया जाना ये सवाल खड़ा करता है कि क्या इस केस को जानबूझकर धीमा रखा गया है? जब दूसरे मामलों में तुरंत कार्रवाई होती है, तो फिर इसमें इतनी देरी क्यों? कांग्रेस पार्टी ने भी इन आरोपों को राजनीति से प्रेरित बताया है और बीजेपी पर आरोप लगाया है कि वह कानून का इस्तेमाल कर विपक्ष को कमजोर करना चाहती है. लेकिन इतने लंबे समय तक कोई ठोस कदम न उठने से न्याय व्यवस्था की निष्पक्षता पर सवाल उठते हैं — खासकर तब, जब इसमें जनता की दिलचस्पी और करोड़ों रुपये की बात हो.

तुलनात्मक विश्लेषण: क्या न्याय सबके लिए बराबर है?

जब इन दोनों मामलों की तुलना की जाती है, तो साफ नजर आता है कि दोनों के पीछे राजनीति का असर है. बीजेपी और कांग्रेस दोनों ही एक-दूसरे पर आरोप लगा रही हैं कि वे कानून का इस्तेमाल राजनीतिक फायदे के लिए कर रहे हैं. सवाल यह है — क्या हमारी न्याय प्रणाली सच में निष्पक्ष है, या फिर इन मामलों को राजनीतिक फायदे के हिसाब से चलाया जा रहा है?

AAP नेताओं के मामले में देखा गया कि उन्हें बहुत जल्दी गिरफ्तार किया गया और मीडिया में इस पर खूब चर्चा हुई. जबकि उनके खिलाफ कोई ठोस सबूत नहीं मिला, फिर भी कार्रवाई तेज़ी से हुई, जिससे लगता है कि इसका मकसद राजनीतिक छवि को नुकसान पहुंचाना हो सकता है. वहीं दूसरी ओर, नेशनल हेराल्ड केस में बहुत बड़ा पैसों का मामला है, लेकिन इसमें अभी तक कोई गिरफ्तारी नहीं हुई और न ही तेज़ कार्रवाई दिखी. इतने गंभीर मामले में भी न्याय व्यवस्था ने इतनी देर क्यों लगाई?

इन दोनों मामलों में कार्रवाई की रफ्तार और तरीका अलग-अलग होने से ऐसा लगता है कि कानून सब पर एक जैसा लागू नहीं हो रहा. खासकर जब कांग्रेस नेताओं पर गंभीर आरोप होने के बावजूद कोई कार्रवाई नहीं हुई, तो न्याय प्रणाली की निष्पक्षता पर सवाल उठने लगते हैं.

चुनिंदा न्याय का जनता के विश्वास पर असर

इन दोनों मामलों में जो फर्क देखने को मिला, उससे लोगों का न्याय प्रणाली पर भरोसा कमजोर होता है. एक लोकतंत्र तभी ठीक से काम करता है जब कानून सभी लोगों पर एक जैसा लागू हो — चाहे वे किसी भी पार्टी के हों. लेकिन जब ऐसा लगता है कि कानून पर राजनीतिक ताकत का असर है, तो लोकतंत्र की नींव हिलने लगती है. लोग सोचने लगते हैं कि न्याय सच में निष्पक्ष है या नहीं, और अदालतों के फैसलों पर भरोसा कम हो जाता है.

इसके अलावा, जब नेताओं को लगता है कि वे अपनी राजनीतिक ताकत के सहारे सजा से बच सकते हैं, तो जवाबदेही (accountability) भी कमजोर हो जाती है. इससे कानून की ताकत घटती है और यह सोच बन जाती है कि कुछ लोग कानून से ऊपर हैं. धीरे-धीरे, इससे कानून के सामने सभी के बराबर होने का सिद्धांत कमजोर पड़ता है — जो किसी भी लोकतंत्र के लिए बहुत जरूरी है.

सुधार और बराबर जवाबदेही की ज़रूरत

AAP नेताओं और नेशनल हेराल्ड केस से यह साफ होता है कि हमारी न्याय व्यवस्था में और ज्यादा पारदर्शिता (transparency) और निष्पक्षता (fairness) की जरूरत है. भ्रष्टाचार और पैसों की गड़बड़ी की जांच जरूरी है, लेकिन ये जांच बिना किसी राजनीतिक दबाव के होनी चाहिए. लोगों को यह भरोसा होना चाहिए कि कानून का इस्तेमाल राजनीति करने के लिए नहीं, बल्कि सभी को जवाबदेह बनाने के लिए किया जाता है.

श्यामा प्रसाद मुखर्जी के विचार — “एक देश, एक कानून, एक निशान” — के अनुसार, कानून सभी पर एक जैसा लागू होना चाहिए, चाहे वह किसी भी पार्टी या पद का व्यक्ति हो. अगर भारत को सच में न्याय और लोकतंत्र के मूल्यों को बनाए रखना है, तो सत्ता में बैठे लोगों और विपक्ष — दोनों को यह सुनिश्चित करना होगा कि कानून लोगों के भले के लिए हो, न कि उनके खिलाफ. सिर्फ निष्पक्ष और समय पर कानूनी कार्रवाई से ही न्याय व्यवस्था पर लोगों का भरोसा वापस लाया जा सकता है और उसे और मजबूत किया जा सकता है.

डिस्क्लेमर: इस लेख में व्यक्त विचार लेखक के अपने हैं और जरूरी नहीं कि यह प्रकाशन के विचारों से मेल खाते हों.

(गेस्ट लेखक- अभिषेक तिवारी, आम आदमी पार्टी (AAP) के प्रवक्ता हैं.)
 


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